लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा 

(कुरुक्षेत्र में नियम विरुद्ध प्रथम रात्रि-युद्ध)

 जयद्रथ-वध से द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, दुर्योधन आदि समस्त कौरव योद्धा क्षुब्ध हो उठे। द्रोणाचार्य ने प्रतिक्रिया में रात्रि-युद्ध की घोषणा कर दी। सूर्योदय के पश्चात युद्ध-विराम का नियम उन्हीं की उपस्थिति में बनाया गया था। लेकिन आज सभी कौरव योद्धा विक्षिप्तों जैसा आचरण कर रहे थे। हमारे प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा किए बिना आचार्य ने राजा शिवि पर आक्रमण कर दिया। उनके हाथों राजा शिवि वीरगति को प्राप्त हुए।

कौरव सेना का हमलोगों पर यह अप्रत्याशित हमला था। हम असावधान थे, अतः प्रथम आक्रमण में हमें अधिक क्षति उठानी पड़ी। प्रत्याक्रमण करने के पूर्व हमने ऊंची-उंची मशालें प्रज्ज्वलित की। युद्धभूमि में प्रकाश की उचित व्यवस्था होने के पश्चात हमने भीषण आक्रमण किया। महाराज युधिष्ठिर ने अद्भुत पराक्रम का प्रदर्शन करते हुए दुर्योधन के मर्मस्थलों को तीखे बाणों से बींध दिया। चोट से उसे मूर्च्छा आ गई और वह रथ की बैठक पर लुढ़क गया। दोनों योद्धाओं के बीच आचार्य द्रोण ने अपना रथ खड़ा कर दुर्योधन की प्राण-रक्षा की। लेकिन भीम तो तूफान की भांति शत्रु-सेना को ध्वस्त कर रहे थे। बात-की-बात में उन्होंने दुर्योधन के दो भ्राता – दुर्मद और दुष्कर्ण को यमलोक का अतिथि बना दिया। कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य मूक दर्शक बने रहे।

भ्राताओं की मृत्यु की सूचना पाते ही दुर्योधन पुनः कर्ण की शरण में आया। मेरे द्वारा जयद्रथ और भीम द्वारा अपनी एक चौथाई भ्राताओं के वध से छटपटाते हुए दुर्योधन को सांत्वना देते हुए कर्ण बोला –

“राजन! आज की रात्रि युद्ध की अन्तिम रात्रि होगी। आज अर्जुन मेरे हाथों मत्यु को प्राप्त होगा। अब अपनी सेना की और दुर्दशा मुझसे देखी नहीं जा रही है। मैं आज अर्जुन पर देवराज इन्द्र द्वारा प्रदत्त अमोघ शक्ति का प्रयोग कर उसकी इहलीला समाप्त कर दूंगा। अर्जुन के बिना पाण्डव मणिरहित नाग की भांति हो जाएंगे। आज अर्जुन को श्रीकृष्ण भी नहीं बचा सकते।”

कृपाचार्य वहीं खड़े थे। कर्ण के बड़बोलेपन पर चुटकी लेते हुए व्यंग्यात्मक मुस्कान के साथ बोले –

“बड़बोले कर्ण! आज ही जयद्रथ-वध के पूर्व तेरी भिड़न्त अर्जुन से हुई थी, उस समय तेरी अमोघ शक्ति कहां थी? विराट नगर के युद्ध में चार बार अर्जुन के बाणों से आहत हो तुमने युद्धक्षेत्र से पलायन किया था, उस समय तेरी अमोघ शक्ति कहां थी? अर्जुन ने तुझे मूर्च्छित कर, मात्र अधोवस्त्र छोड़कर जब तेरे सारे वस्त्र उतार लिए थे, तब तेरी अमोघ शक्ति कहां थी?”

“उस समय मुझे अर्जुन के शर-संधान, प्रहार कौशल और चपलता का प्रत्यक्ष अनुभव नही था। वह इतनी शीघ्रता और फुर्ती से बाण छोड़ता है कि सामने युद्धरत योद्धा सम्मोहित हो जाता है। अपनी सुरक्षा के अतिरिक्त वह सारी बातें भूल जाता है। यही अबतक मेरे साथ भी हुआ है। लेकिन अब मुझे उससे प्रत्यक्ष युद्ध का अनुभव हो चुका है। मैं उसकी त्रुटियों से भी अवगत हो चुका हूं। आज मैं दृढ़ संकल्प के साथ उसका सामना करूंगा और उसका वध करके ही अपने शिविर में लौटूंगा।” कर्ण ने हुंकार भरी।

कृपाचार्य की मुस्कान ने अब उपहास का रूप ले लिया। उपेक्षा से हंसते हुए पुनः बोले –

“सूतपुत्र! तुम डींग बहुत हांकते हो। बिना कहे ही पराक्रम दिखाया जाय, यही सत्पुरुषों का व्रत है। क्षत्रिय बाहुबल में शूर होते हैं, ब्राह्मण वाणी में शूर होते हैं, अर्जुन धनुष चलाने में शूर है लेकिन तुम सिर्फ डींग हांकने में शूर हो। अपने अद्भुत पराक्रम से किरातरूपधारी भगवान शंकर को संतुष्ट करने वाले अतुल सामर्थ्यवान तथा श्रीकृष्ण जैसे सहायक प्राप्त अर्जुन को जीतने की शक्ति इस पृथ्वी पर किसी के पास नहीं है। जबतक उसके बाणों के प्रहार से बचे हो, तभी तक गरज रहे हो। उसके मर्मभेदी बाण जब तुम्हारे वक्षस्थल में प्रवेश करेंगे तब सारी गर्जना भूल जाओगे।”

कृपाचार्य का कटु सत्य भला कर्ण कैसे सह पाता। अपमान की ज्वाला में आपदमस्तक जल उठा। विवेक ने साथ छोड़ दिया। हाथ में खड्ग लेकर कृपाचार्य की ओर चिल्लाते हुए दौड़ा –

“राजकीय भिक्षा पर जीवन-यापन करने वाले, नीच ब्राह्मण! तूने पग-पग पर मेरा अपमान किया है। मुझे सूतपूत्र कहकर रंगभूमि में अर्जुन के साथ द्वन्द्वयुद्ध से वंचित किया, भरी सभा में मेरे कुल का कई बार अपमान किया आज रणभूमि में तुम मेरे पौरुष को धिक्कार रहे हो। सदैव कटुवचन बोलने वाली जिस जिह्वा से तूने जीवन भर मुझे प्रताड़ित किया है, आज उसीको काटकर तेरी हथेली पर रख दूंगा।”

दुर्योधन अगर बीच में नहीं आता, तो कुछ अनिष्ट हो ही जाता। उसने किसी प्रकार कर्ण को शान्त किया। अश्वत्थामा ने अपने मातुल का अपमान अपनी आंखों से देखा। उसकी सहन शक्ति जाती रही। हाथ में नंगी तलवार ले कर्ण पर झपटा। कर्ण ने दुर्योधन की ओट ले ली। भीषण क्रोध में भरा हुआ अश्वत्थामा ऊंचे स्वर में कर्ण को फटकार रहा था –

“अरे अधम! तेरा काल निकट आ गया है, इसलिए तूने मेरे मातुल का मेरे समक्ष अपमान किया है। मेरे मामा सच्चे शूरवीर हैं। एक सच्चा वीर अपने शत्रु के गुणों की भी प्रशंसा करता है। अपनी महानता के कारण वे अर्जुन के सच्चे गुणों का वर्णन कर रहे हैं। तू सदैव अपनी शूरता का डींग हांका करता है, लेकिन जब तुझे पराजित कर अर्जुन ने तेरे देखते-ही-देखते जयद्रथ का वध किया, उस समय कहां था तेरा पराक्रम और कहां गए थे तेरे अस्त्र-शस्त्र? नराधम! दुर्योधन की ओट छोड़कर सामने आ, अभी तेरा सिर धड़ से अलग करता हूं।”

जयद्रथ के आकस्मिक वध ने समस्त कौरवों में बौखलाहट उत्पन्न कर दी थी। कर्ण, अश्वत्थामा और कृपाचार्य उसकी रक्षा में प्रभात से ही प्राणपण से जुटे थे। लेकिन असफल रहे। इन तीनों के परस्पर वाक्युद्ध उनकी खीझ का ही परिणाम था। दुर्योधन ने असाधारण मानसिक परिपक्वता का परिचय देते हुए कर्ण और अश्वत्थामा, दोनों को शान्त किया।

गुप्तचरों ने सूचना दी कि कर्ण आज रात्रि में मुझपर अमोघ शक्ति का प्रयोग करेगा। श्रीकृष्ण के माथे पर हल्के बल पड़े लेकिन मैं निश्चिन्त था। मैंने अबतक सदैव उसे रक्षात्मक युद्ध लड़ने के लिए वाध्य किया था। फिर मेरे पास दिव्यास्त्र थे। आपात स्थिति उपस्थित होने पर मैं उनका प्रयोग कर सकता था लेकिन मेरे प्रति अत्यधिक स्नेह के कारण श्रीकृष्ण मुझे कर्ण के सम्मुख आने नहीं दे रहे थे। कर्ण उस रात्रि-युद्ध में अद्भुत पराक्रम दिखा रहा था। उसे भीमसेन ने रोका। अपनी वीरता से न सिर्फ कर्ण को पीछे हटने के लिए विवश किया, बल्कि उसके सामने ही कई धृतराष्ट्र पुत्रों को काल का ग्रास बनाया।

युद्ध के दूसरे मोर्चे पर आचार्य द्रोण ने प्रलय मचा रखा था। राजा सोमदत्त की रक्षा हेतु वे सात्यकि से भिड़े। सात्यकि को घायल देख धृष्टद्युम्न, युधिष्ठिर, नकुल, सहदेव और शिखण्डी ने आचार्य पर आक्रमण किया। लेकिन आचार्य आज किसी के वश में नहीं आने वाले थे। उन्होंने सारे प्रतिद्वन्द्वी महारथियों को अपने प्रहार से अत्यन्त पीड़ित किया। न चाहते हुए भी अपनी भागती सेना में उत्साह संचार करने हेतु मुझे उनके सामने आना पड़ा। रक्षात्मक युद्ध करके मैंने आचार्य के प्रवाह को विराम दिया। पिता के मार्ग को प्रशस्त करने अश्वत्थामा आगे आया। उसे घटोत्कच ने रोका। दोनों में भयानक युद्ध हुआ। अश्वत्थामा ने अभूतपूर्व युद्ध कौशल का प्रदर्शन करते हुए घटोत्कच की समस्त माया का उत्तर दिया और उसे रथहीन कर दिया। घटोत्कच दूसरे रथ में बैठकर रणभूमि से अलग हुआ। अश्वत्थामा के प्रहार से वह अचेत हो चुका था।

भीमसेन के नेतृत्व में कर्ण अचानक पाण्डवों और पांचाल वीरों से चारों ओर से घिर गया। हमारे पक्ष के असंख्य क्षत्रिय वीर कर्ण का वध करने के लिए उस पर टूट पड़े। एक बार ऐसा लगा कि उसके प्राण संकट में पड़ गए। लेकिन पलक झपकते ही विद्युत गति से कर्ण ने प्रत्याक्रमण किया। हमारी सेना अब पिछले पैर पर थी। उसके बाणों के प्रहार से असंख्य शव धरती पर लोट गए। भागती सेना आर्त्तनाद करते हुए कातर नेत्रों से मुझे देख रही थी। अपनी आंखों के सामने अपनी सेना की दुर्दशा मुझसे कैसे देखी जाती? मैंने श्रीकृष्ण से कर्ण के सम्मुख चलने का आग्रह किया। इस बार उन्होंने ‘ना’ नहीं किया।

मैं पूरी योजना के साथ कर्ण के सम्मुख आया। मुझे ज्ञात था – उसने इस रात्रि युद्ध में मुझपर अमोघ शक्ति प्रहार करने का दुर्योधन को वचन दिया था। मैं उसे कोई अवसर ही नहीं देना चाहता था। उसकी दृष्टि मुझपर पड़े, इसके पूर्व ही, आते ही मैंने क्षण भर में उसके ऊपर तीन सौ बाणों का प्रहार किया। उसके बाएं हाथ को एक तीक्ष्ण सायक से बींध डाला। परिणाम सामने था – उसका धनुष उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ा। अत्यन्त चपलता के साथ कब उसने दूसरा धनुष उठाया और बाणों से मुझे ढंक दिया, मुझे ज्ञात नहीं। मैंने शीघ्र उसके बाणों के जाल को काटकर पुनः उसके धनुष को लक्ष्य करके एक बाण छोड़ा। धनुष कटकर भूमि पर गिर पड़ा। मैंने उसे किसी प्रकार काअवसर न देते हुए चार मर्मभेदी बाण उसके सीने में मारे। वह पीड़ा से कराह उठा। रथ का दण्ड पकड़ लंबी सासें लेने लगा। मैंने उसपर आगे प्रहार नहीं किया लेकिन उसके घोड़ों को मार उसके सारथि का सिर अवश्य उतार लिया। रथहीन कर्ण कूदकर कृपाचार्य के रथ पर सवार हुआ जिसका कुछ देर पूर्व ही उसने घोर अपमान किया था। सबकुछ भूलकर अपनी बाणवर्षा से ओट देते हुए कृपाचार्य ने उसकी प्राणरक्षा की। वह कंटकों से भरी साही की तरह दृष्टिगत हो रहा था।

जैसे-जैसे रात्रि का अंधकार गहरा हो रहा था, वैसे-वैसे युद्ध की विभीषिका गहराती जा रही थी। मैं किसी एक महारथी से लगातार युद्ध नहीं कर रहा था। रणक्षेत्र में उन्मुक्त विचरण करते हुए जहां भी आवश्यकता पड़ती थी, अपने योद्धाओं को सहायता पहुंचा रहा था। इसी क्रम में आचार्य द्रोण और कर्ण से मेरा सामना हुआ था। उस रात्रि-युद्ध में आचार्य द्रोण और अश्वत्थामा ने हमारी सेना का भीषण संहार किया। हमारी ओर से भीमसेन, घटोत्कच और सात्यकि ने कौरव महारथियों को लोहे के चने चबाने पर विवश कर दिया। अर्द्ध रात्रि के बाद अपने घावों की प्राथमिक चिकित्सा करा कर्ण भी प्रलय बन हमारी सेना पर टूट पड़ा। हमारी सेना के पांव उखड़ गए। मुझे ऐसा लग रहा था कि कर्ण ने रात्रि-युद्ध का विशेष पूर्वाभ्यास किया था। पांचाल और सृंजय वीरों के साथ धृष्टद्युम्न और सहदेव ने उसे रोकने का प्रयास किया लेकिन असफल रहे। शीघ्र ही दोनों को युद्धभूमि छोड़नी पड़ी।

महाराज युधिष्ठिर अत्यन्त चिन्तित और व्यग्र हो उठे – श्रीकृष्ण से रक्षा की गुहार की। श्रीकृष्ण की दृष्टि में कर्ण के प्रहार को रोकने में सिर्फ मैं और घटोत्कच ही सक्षम थे। निशा काल में राक्षसों की शक्ति बढ़ जाती है, अतः कर्ण को रोकने का दायित्व घटोत्कच को सौंपा गया।

क्रमशः

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