लेखक परिचय

विपिन किशोर सिन्हा

विपिन किशोर सिन्हा

जन्मस्थान - ग्राम-बाल बंगरा, पो.-महाराज गंज, जिला-सिवान,बिहार. वर्तमान पता - लेन नं. ८सी, प्लाट नं. ७८, महामनापुरी, वाराणसी. शिक्षा - बी.टेक इन मेकेनिकल इंजीनियरिंग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय. व्यवसाय - अधिशासी अभियन्ता, उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी. साहित्यिक कृतियां - कहो कौन्तेय, शेष कथित रामकथा, स्मृति, क्या खोया क्या पाया (सभी उपन्यास), फ़ैसला (कहानी संग्रह), राम ने सीता परित्याग कभी किया ही नहीं (शोध पत्र), संदर्भ, अमराई एवं अभिव्यक्ति (कविता संग्रह)

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विपिन किशोर सिन्हा

मूलत: बिहार के रहनेवाले व पेशे से उ.प्र.पावर कारपोरेशन लि., वाराणसी में अधिशासी अभियंता विपिन किशोर सिन्हा जी ने पौराणिक आख्यानों पर कई उपन्‍यास लिखकर विमर्श किया है। ‘कहो कौन्तेय’ उनका पहला उपन्यास है। इसकी प्रशंसा पूर्व उपराष्ट्रपति स्व. भैरो सिंह शेखावत ने भी की थी। संजय प्रकाशन, दिल्ली से प्रकाशित इस उपन्यास को हमने प्रवक्‍ता डॉट कॉम के पाठकों के लिए धारावाहिक रूप में प्रस्‍तुत करने का तय किया है। प्रस्‍तुत है पहली किश्‍त : 

रक्त संबंधियों की चिताओं में अग्नि प्रज्ज्वलित करते-करते, युधिष्ठिर के हाथ थक गये थे, मन सुन्न हो गया था. क्या शत्रु, क्या मित्र, क्या अपना, क्या पराया, सब एक समान हो गए थे. दाह संस्कार के समय न दुर्योधन के शव ने प्रतिकार किया और न ही द्रौपदी पुत्रों के शवों ने. जीवन यात्रा के बीच में ही सब साथ छोड़कर चले गए. क्या है जीवन का अर्थ? केवल दो घड़ी का खेल? बार-बार यही प्रश्न सामने आकर खड़ा हो जाता था. कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था, कुछ भी सूझ नहीं रहा था धर्मराज युधिष्ठिर को. अभिमन्यु की स्मृति मात्र से दोनों नयनों से अश्रु भरकर गिरने लग जाते थे. विवेक के उत्तरीय से पोंछ वे संभलने का प्रयास करते थे कि द्रौपदी-पुत्रों की स्मृति अनायास ही विह्वल कर देती थी.

नेत्र कोरों को उत्तरीय से पोंछते हुए भ्राताओं समेत युधिष्ठिर ने गंगा में प्रवेश किया — सभी मृत संबंधियों को जलांजलि जो देनी थी. दुर्योधन, दुःशासन, अभिमन्यु, घटोत्कच — एक-एक वीर का नाम लेकर उसकी आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना जो करनी थी. किनारे रेत पर बैठी राजमाता कुन्ती कब तक स्वयं को रोकतीं — भावना के आवेग में सुबकते हुए बोल पड़ीं —

“पुत्र युधिष्ठिर! तुमने महापराक्रमी कर्ण का श्राद्ध कर्म नहीं किया. वह वीर भी इस महासंग्राम में वीरगति को प्राप्त हुआ है. वह भी श्राद्ध और श्रद्धांजलि का अधिकारी है. हृदय के समस्त राग-द्वेष मिटाकर शुद्ध मन से उस महारथी को भी जलांजलि अर्पित करो.”

कर्ण को जलांजलि? एक सूतपुत्र को जलांजलि, राजपुत्रों के साथ? कैसे संभव था यह? भयंकर महाविनाश ने कही माता के मस्तिष्क का सन्तुलन अस्त-व्यस्त तो नहीं कर दिया? सभी पांडवों ने पीछे मुड़कर आश्चर्य से राजमाता के मुख पर दृष्टि गड़ा दी. कुन्ती निर्विकार और अविचल थीं.

“माते! कर्ण सूतपुत्र था. रक्त संबंधी राजपुत्रों के साथ हम उसे जलांजलि कैसे दे सकते हैं? वह हमारी जलांजलि का पात्र नहीं है,” युधिष्ठिर ने स्पष्ट किया.

कैसे समझाती युधिष्ठिर को कि उसकी जलांजलि का प्रथम पात्र कर्ण ही था. वह सूतपुत्र नहीं उसका ज्येष्ठ भ्राता था. एक बार दृढ़ निश्चय के भाव आए थे कुन्ती के मुखमंडल पर लेकिन दूसरे ही पल भावनाओं को विवेक के चाबुक से नियंत्रित किया. कुरुकुल की इतनी स्त्रियों और अपने पुत्रों के समक्ष कर्ण-जन्म का रहस्योद्घाटन करना क्या उचित रहेगा? कुन्ती सोच में पड़ गईं लेकिन मन के एक कोने में हूक उठती रही — स्वजनों की तिलांजलि और श्रद्धांजलि के बिना कर्ण की आत्मा तृप्त कैसे होगी, उसे शान्ति कैसे मिलेगी? पहचान के लिए संघर्ष करता हुआ वह दानवीर जीवन भर अशान्त और अतृप्त रहा. — “आह मेरे प्रथम पुत्र, तूने कितना कष्ट झेला — सोचते ही कलेजा टूक-टूक हो जाता है. न्याय तो मिलना ही चाहिए पुत्र तुझे. मृत्यु पर्यन्त ही सही.” कुन्ती के मन का द्वन्द्व, सच कहने का साहस जुटाने का विलंब, वृहत समाज के सामने छोटा हो जाने की आशंका, सबने मिलकर उनके मुख को मेघाछन्न आकाश-सा कर दिया. कण्ठ में कुछ कठिन सा फंसा हो जैसे, छाती में लहक रही ममता को विवेक और साहस का बाना पहनाऊं कौसे? पछाड़ खाती लहरों को चट्टान से टकराते देखती रहीं कुन्ती.

दक्षिण की ओर मुंह करके युधिष्ठिर गंगा की धारा में खड़े थे. पुरोहित धौम्य मंत्रों का उच्चारण करते और पांचों भ्राता समवेत स्वर में उसे दुहराते. इधर संध्या का आगमन हो रहा था, उधर जलांजलि कार्यक्रम समाप्ति की ओर बढ़ रहा था. मर्यादा, संकोच और लज्जा की बेड़ियों में जकड़ी कुन्ती निरीह नेत्रों से कार्यक्रम का अवलोकन कर रही थीं. भगवान भास्कर से कुन्ती की विवशता देखी नहीं गई. वे भी इस मेघाछन्न आकाश के सामने टिक न सके, जाने लगे पश्चिम की ओर — कुन्ती का सामना करना संभव नहीं था — एक वही थे जो जान रहे थे कुन्ती का द्वन्द्व — था तो उनका ही प्रसाद वह दानवीर कर्ण! संवेग ने सूर्य की किरणों की प्रखरता हर ली. गंगा धाराओं पर रश्मियां अब तिरछी पड़ रही थीं. छाया की लंबाई अब महत्तम सीमा पर थी. अब और कुन्ती के सामने ठहरने का साहस नहीं — अस्त हो जाना ही श्रेयस्कर समझा सूर्य ने.

जलांजलि कार्यक्रम संपन्न हो चुका था. युधिष्ठिर के उत्तरीय संभालते हुए गंगा से बाहर आने को उद्यत पगों को माता कुन्ती के स्वर ने स्तंभित कर दिया — “रुको पुत्र !” कुन्ती का स्वर जैसे तीनों लोकों के पार से आ रहा हो. युधिष्ठिर को स्वर परिचित होते हुए भी अपरिचित सा लगा. माँ, यह माँ की ध्वनि थी, उनके वाग्यंत्र से निकली हुई, जन्म से सुनी हुई, किन्तु फिर भी अपरिचित, जिसने क्षण भर के लिए आश्चर्य मिश्रित भय से भर दिया. कुन्ती का दृढ़ स्वर पुनः सुनाई पड़ा —

“कर्ण को जलांजलि दो पुत्र. वह सूतपुत्र नहीं सूर्यपुत्र था. जिसे तुम राधेय कहते हो, वह तुम्हारा ज्येष्ठ भ्राता कौन्तेय था. वह तुम्हारी जलांजलि का सबसे उपयुक्त पात्र है. सूर्यास्त के पूर्व बिना कोई प्रश्न किए उसे जलांजलि दो पुत्र. उसकी भटकती हुई आत्मा को ठौर दो. प्यासे को पानी पिलाना पुण्य कार्य है. उसकी आत्मा को तृप्त करो.”

गंगा के शान्त तट पर उपस्थित जनसमूह में आलोड़न की लहर सी उठ गई. सभी नर-नारियों के मुंह आश्चर्य से खुले रह गए. भौंचक हो सबने पहले कुन्ती को देखा, फिर युधिष्ठिर को और अन्त में एक-दूसरे को. प्रश्न पूछने का साहस भला कौन कर सकता था? लेकिन दृष्टियां प्रश्नवाचक हो गई थीं.

युधिष्ठिर ने पुनः दक्षिण दिशा की ओर मुंह किया. पुरोहित धौम्य ने कर्ण का नाम ले मंत्रोच्चार किया. पंच पांडवों ने मंत्र दुहराते हुए अंजलि का जल कर्ण को अर्पित किया. कुन्ती के मन पर अब संतोष का भाव था.

धीमे कदमों से युधिष्ठिर तट पर आए. ऐसा लग रहा था, मनों बोझ उनके पैरों में बांध दिया गया हो. कुन्ती के पास आ समीप ही बैठ गए रेत पर. माँ की आज्ञा शिरोधार्य कर भी संदेह मुक्त कहां हो पाए धर्मराज? कातर नेत्रों से माँ की ओर देखते हुए टूटे स्वर में बोले —

“ऐसा कैसे हो सकता है माँ? मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा है. एक बार कह दो माँ, बस एक बार कह दो — तुमने जो कहा है, वह सच नहीं है. कर्ण राधेय ही था, कौन्तेय नहीं.”

“सत्य सुनने का साहस रखो पुत्र ! जीवन में मैंने कभी मिथ्यावाचन नहीं किया. हाँ, सत्य को आवरण में रखने का पाप अवश्य किया है. फिर अपने आप से बोलती सी लगीं — और कौन बताएगा, पाप किया या पुण्य, निर्णयकर्ता कौन है? कर्ण का कौन्तेय होना उतना ही सत्य है जितना सूर्योदय और सूर्यास्त का होना.” कुन्ती ने गंभीरता से दृढ़ स्वरों में उत्तर दिया.

“फिर तुमने आजतक हमें अंधकार में क्यों रखा, इस सत्य से अवगत कराया क्यों नहीं? क्यों कराया हमलोगों से अपने ही सहोदर भ्राता का वध? काश, तुमने इस रहस्य से यवनिका उन्नीस दिन पूर्व उठाई होती. यह महासमर नहीं होता, महाविनाश रुक जाता.” अश्रुओं ने वागेन्द्रियों को अवरुद्ध कर दिया. युधिष्ठिर मौन हो गए.

“हाँ वत्स! कर्ण का जन्म-रहस्य एक शिला बन वर्षों से मेरी आत्मा को दबाए रहा, कुचल गई मेरी आत्मा. महासमर के मूल में एक कारण तो मैं भी हूँ न. कितने तूफानी मोड़ आए मेरे जीवन में, गणना नहीं कर सकती. क्या उद्देश्य है मेरे जीवन का, मुझे मालूम नहीं. क्या चाहती है नियति मुझसे, आज तक समझ नहीं पाई. कर्ण-जन्म का रहस्य क्यों अबतक अपनी छाती से चिपकाए रही, इसका सटीक अपष्टीकरण आज भी नहीं दे सकती. आज कर्ण चला गया है उस पार. जन्म-मृत्यु-युद्ध-विवाद से परे — मुक्ति पा गया है — छोड़ गया है मुझे अपनी ग्लानि की आग में जलने के लिए. देख सकते हो, तो देखो पुत्र, वह इस महासमर के परे आकाशगंगा का पथिक बन मुस्कुरा रहा है — जिसे मैंने कभी पहचान नहीं दी, वही कर्ण मुझे माँ कहकर पुकार रहा है, बांहें फैलाकर बुला रहा है.”

युधिष्ठिर की आंखों से बहती अश्रुधारा माँ की व्यथा की प्रत्यक्ष अनुभूति थी.

“माँ,” इतना ही कह सके वे.

“न, अब और नहीं, अब और चुप नहीं रहा जाता युधिष्ठिर. आज इस श्राद्ध सभा में, मैं जो कुछ भी कहने जा रही हूं, वह मेरा अतीत — जीवन के कुछ पन्ने जिनकी स्याही धुंधली हो चुकी है — अंधेरे तलघट से उन्हें निकाल तुम्हें सुनाऊंगी, वह सब जो तुम जानते हो और नहीं जानते. मेरी प्रथम सन्तान का तर्पण इसी से पूरा होगा पुत्र ! तुम्हारी कई जिज्ञासाओं का समाधान इन्हीं पन्नों पर लिखा है.” (क्रमश:)

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1 Comment on "कहो कौन्तेय (महाभारत पर आधारित उपन्यास)"

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Satyarthi
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प्रवक्ता संपादक मंडली का इस उपन्यास को धारावाहिक रूप में प्रकाशित करने का निर्णय प्रशंसनीय है. पहला भाग बहुत अच्छा लगा. दूसरे भाग की प्रतीक्षा है

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