लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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-आलोक कुमार-   politics

पिछले कुछ वर्षों से घोटालों की रफ़्तार “राजधानी एक्सप्रेस” से भी तेज होती जा रही है। हालात ये हैं कि अगर घोटालों की लिस्ट बनाकर पेश की जाए तो खत्म होने का नाम ही नहीं लेगी। आलम यह है कि आज एक लिस्ट बनाओ, कल चार नाम और जुड़े जाते हैं। एक नाम अपनी सफ़ाई में जब तक कुछ कह रहा ही होता है कि कुछ और नए नामों की लिस्टिंग हो जाती है। ऐसा प्रतीत होता है कि घोटालों की सुनामी आ गयी हो। गंगा की गंगोत्री तो सूख रही है लेकिन घोटालों (भ्रष्टाचार) की गंगोत्री अपने उफ़ान पर है। अब तक घोटालों के छोटे-छोटे ‘पावर स्टेशनों’ को ही ‘फ्यूज’ किया जाता था लेकिन अब तो सीधे-सीधे “पावर ग्रिड“ पर हमले हो रहे हैं। शायद पहले ऐसे हमलों की कोई हिम्मत नहीं जुटा पाता था या मीडिया घोटालों का आज के जैसा “बाजारीकरण ” करने की विधा से अनभिज्ञ था !

पहले लगता था कि घोटालों में नाम जुड़ने से बदनामी होती है, पर अब लगता है कि इससे एक किस्म की मान्यता मिलती है कि आदमी काम का है। “जितनी बड़ी पेंच ; उतनी ऊंची पंतग”। राजनीति के कोयले की कोठरी का रंग चाहे कितना भी लगता रहे फ़र्क नहीं पड़ता इन “विशिष्ठ मानुषों ( अमानुषों ) ” पर। जनता के सामने संदेश देता नजर आ रहा है ये “विशिष्ठ वर्ग” कि “हम (वे) सब चोर हैं; तुम्हारा (जनता) क्या जाता है?” अब इन “महा-निर्लज्जों” को कौन समझाए कि सब कुछ हमारा ही जा रहा है। इन घोटालों के पर्दाफ़ाश होने से फ़ैले ‘संक्रमण’ से केवल राजनीति ही नहीं हमारी संवैधानिक संस्थाओं को भी ‘डेंगू’ होने का खतरा हो गया है। संसद के सत्र तो कराह रहे हैं, क्रन्दन कर रहे हैं। सीएजी की रपटें भी राजनीति के स्याह रंगों से रंगीं जा रही हैं। सरकार और राजनीति तो पहले से ही सी.ए.जी. जैसी संस्था पर दंश (डंक) मार रही है। हमारी न्याय व्यवस्था, सेना, वित्तीय संस्थान (रिजर्व बैंक इत्यादि), पुलिस- प्रशासन जैसी अन्य व्यवस्थाएं भी इन्हीं संवैधानिक संस्थाओं के ताने-बाने से जुड़ी हैं। इन सबों में भी संक्रमण (इन्फ़ेकशन) का प्रभाव दिखने लगा है। जाँच एजेन्सियाँ और पुलिस तो बिल्कुल शासन के बैसाखी बन चुके हैं। कुछ संस्थाओं, जैसे सीबीआई, को स्वतंत्र बनाने की प्रकिया को देख कर तो लगता है जैसे कोई अपाहिज बैसाखियों के सहारे मैराथन दौड़ में शामिल है। कमोबेश यही हाल चुनाव-सुधारों का भी है। पिछले दो दशकों से इसका (चुनाव-सुधार) इलाज जारी है, अनेकों “चिकित्सकों” को आजमाया गया जैसे 1990 में गोस्वामी समिति, 1993 में वोहरा समिति, सन 1998 में चुनाव के लिए सरकारी फंडिंग पर विचार के लिए इन्द्रजीत गुप्त समिति, 1999 में चुनाव सुधार पर विधि आयोग की रपट, सन 2001 में संविधान पुनरीक्षा आयोग की सिफारिशों, सन 2004 में चुनाव आयोग के प्रस्ताव और सन 2007 में द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग, परन्तु मर्ज ज्यों का त्यों है।

एक स्वस्थ व्यवस्था और सुदॄढ़ राष्ट्र का निर्माण इन संस्थाओं की सेहत पर ही निर्भर करता है। लोकतंत्र की “तंदुरुस्ती” उसकी सांविधानिक संस्थाओं की ताकत और उनकी प्रतिबद्धता पर ही आश्रित होती है। चुनाव आयोग की भूमिका इस का सबसे ‘स्वस्थ उदाहरण’ है। दूसरी ओर राज्यपालों के पद और संसद और विधानसभाओं के पीठासीन अधिकारियों की भूमिका एचआईवी वायरस से पीड़ित होते नजर आ रहे हैं। इनके इलाज का फॉर्मूला भी स्वस्थ सांविधानिक संस्थाओं से ही निकल कर आएगा। मेरा फ़ाईनल “डॉयग्नोसिस” कहता है कि अधिकांश बीमारियों (घोटालों और भ्रष्टाचारों) की जड़ (मूल) में सबसे बड़ा ‘वॉयरस’ राजनीतिक पार्टियों की फंडिंग है। दूसरा महत्वपूर्ण ‘वॉयरस’ राजनीतिज्ञों और उनके कुनबों के निजी हित हैं। बीमारी के इलाज व सुधार (बदलाव) की अभी भी काफी गुंजाइश मौजूद है, बशर्ते उपचार के सही तरीकों को अपनाया जाए। रोग (दोष) राजनीति में है, व्यवस्था में नहीं। हम घटिया इलाज (राजनीति) के सहारे स्वस्थ मरीज (उम्दा व्यवस्था) देखना चाहते हैं तो यह गलत है। इलाज की शुरूआत राजनीति से होनी चाहिए।

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