लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

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हिमांशु शेखर
नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यकाल के शुरुआती दिनों में ही विदेश नीति के मोर्चे पर इतनी हाई-प्रोफाइल घटनाएं हो रही हैं कि कई विदेशी मंचों पर होने वाली कुछ अहम घटनाओं की ओर लोगों का ध्यान काफी कम जा पा रहा है। जिन दिनों चीन के राष्ट्रपति शी चिनपिंग भारत की यात्रा पर आने वाले थे, उसके कुछ ही दिनों पहले यानी सितंबर के दूसरे हफ्ते में तजाकिस्तान के दुशांबे शहर में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई। यह बैठक थी शांघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की। इसमें खुद चीनी राष्ट्रपति भी शामिल हुए। भारत की ओर से इस बैठक में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज शामिल हुईं। भारत के लिहाज से इस बैठक की अहमियत यह रही कि इस मंच की पूर्ण सदस्यता के लिए भारत का रास्ता साफ हो गया है। एससीओ की पूर्ण सदस्यता का भारत के लिए क्या मतलब है, इसे समझने से पहले एससीओ के बारे में कुछ बुनियादी बातों को जानना जरूरी है।
एससीओ की शुरुआत 2001 में एक ऐसे संगठन के तौर पर हुई जहां विभिन्न देशों की सरकारें आपसी सहयोग के साथ आगे बढ़ने की योजना तैयार कर सकें। उस वक्त इस संगठन के सदस्य बने कजाकिस्तान, चीन, किर्गीस्तान, रूस और तजाकिस्तान। इसके कुछ ही दिनों बाद इस संगठन में उजबेकिस्तान को भी शामिल किया गया। इसके पांच शुरुआती सदस्यों के बीच 1996 से ही एक साथ बैठकर बातचीत करने का सिलसिला शुरू हुआ था। इसे शांघाई फाइव के नाम से जाना जाता था। पहली बैठक शांघाई में हुई थी इसलिए इसके नाम के साथ शांघाई जुड़ गया। जब 2001 में शांघाई फाइव को और व्यापक बनाने के मकसद से इसे शांघाई सहयोग संगठन में तब्दील कर दिया गया और नाम के साथ शांघाई जुड़ा रहा। लेकिन नाम में शांघाई होने का मतलब यह नहीं है कि यह चीन का कोई संगठन है। हां, एक वैश्विक शक्ति के तौर पर चीन के उभार और बीच में रूस की कमजोर हुई स्थिति की वजह से यह स्वाभाविक ही है कि एससीओ के मंच पर चीन अधिक प्रभावशाली दिखता है।
अब फिर से लौटते हैं एससीओ की हालिया बैठक पर। लंबे समय से भारत, पाकिस्तान और ईरान को इस संगठन की पूर्ण सदस्यता देने की मांग उठ रही थी। मालूम हो कि 2005 में जब संगठन की बैठक कजाकिस्तान की राजधानी अस्ताना में हुई थी तो उस बैठक में इन तीन देशों को संगठन में पर्यवेक्षक की हैसियत से शामिल किया गया था। बाद में मंगोलिया और अफगानिस्तान को भी यह दर्जा मिला। बेलारूस और तुर्की इस संगठन में डायलाॅग पार्टनर की हैसियत से जुड़े हुए हैं। इस संगठन ने अब तक दुनिया के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मंचों से अपने संबंध न सिर्फ स्थापित किए हैं बल्कि उन्हें मजबूत भी किया है। ऐसे में तीन नए पूर्णकालिक सदस्य बनाने का फैसला महत्वपूर्ण है। ऐसी उम्मीद की जा रही है कि जब अगले साल यानी 2015 में संगठन की बैठक रूस में होगी तो उसके पहले तीन नए सदस्यों को पूर्ण सदस्यता देने से संबंधित सभी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी।
आतंकवाद इस संगठन की बातचीत के केंद्र में शुरुआत से रहा है। सदस्य देशों के बीच इसके लिए बाकायदा एक क्षेत्रीय आतंकरोधी ढांचा भी तैयार किया गया है। इस बार की बैठक में भी इस मुद्दे पर विस्तार से चर्चा हुई। खास तौर पर अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति और इससे जुड़े खतरों पर। भारत की दृष्टि से एससीओ के आतंक विरोधी प्रयास कितने महत्वपूर्ण हैं, इसका अंदाजा सुषमा स्वराज के बयान से लगाया जा सकता है। उन्होंने दुशांबे की बैठक में कहा, ‘भारत लंबे समय से आतंकवाद से पीडि़त है। हमारी यह दृढ़ राय है कि इन नकारात्मक ताकतों से कारगर ढंग से निपटने में केवल बहुपक्षीय प्रयास एवं एकीकृत कार्रवाई ही मदद कर सकती है, जिसमें दवाओं के अवैध व्यापार एवं छोटे हथियारों के प्रसार से जुड़ी बुराइयां भी शामिल हैं। इस संदर्भ में, हम सामान्य रूप से एस सी ओ के साथ और विशेष रूप से क्षेत्रीय आतंकवाद रोधी संरचना के साथ अपने सुरक्षा संबद्ध सहयोग को गहन करने के लिए उत्सुक हैं।’ इसके अलावा सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने को लेकर भी विस्तार से बातचीत हुई। चीन ने अपने सिल्क रोड आर्थिक क्षेत्र परियोजना से सदस्यों को जोड़ने की इच्छा जताई।
अब इस बात को समझते हैं कि बैठक के बाद एससीओ का जो संभावित स्वरूप उभर रहा है, उसमें भारत कहां होगा। इस बारे में सुषमा स्वराज कहती हैं, ‘हमारी सरकार एससीओ के साथ अपनी भागीदारी बढ़ाने एवं इसकी गतिविधियों में अधिक सार्थक ढंग से योगदान करने के लिए तैयार है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए हमने एस सी ओ के वर्तमान अध्यक्ष को पूर्ण सदस्यता के लिए अपना औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया है।’ वे आगे कहती हैं, ‘भारत एससीओ के अनेक सदस्य देशों के साथ पहले से ही विविध क्षेत्रों में भागीदारी कर रहा है, जैसे कि क्षमता निर्माण एवं मानव संसाधन विकास, सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य देखरेख, लघु एवं मझोले उद्यम और उद्यमशीलता विकास आदि। हम अपनी तकनीकी विशेषज्ञता, बाजारों एवं वित्तीय प्रतिबद्धता का उल्लेख करना चाहते हैं। जो इस मंच में अपनी महान जिम्मेदारियों को पूरा करने में हमें समर्थ बनाते हैं। हम आर्थिक क्षेत्रों जैसे कि बैंकिंग, पूंजी बाजार एवं सूक्ष्म वित्त में अपने अनुभव को विशेष रूप से साझा करना चाहते हैं।’
सुषमा स्वराज जिन क्षेत्रों का उल्लेख कर रही हैं, उनके बाजार का आकार बहुत बड़ा है। यहीं से इस संगठन में भारत की पूर्ण सदस्यता का मतलब स्पष्ट तौर पर दिखने लगता है। इन क्षेत्रों में कारोबार को लेकर अगर भारत को इस संगठन के सदस्य देशों का बाजार मिलता है तो इससे भारत को स्वाभाविक तौर पर काफी फायदा होगा। एससीओ क्षेत्र की गिनती दुनिया में तेजी से विकास कर रहे क्षेत्र में हो रही है। ऐसे में इन देशों में मांग भी बढ़ेगी और बाजार भी बढ़ेगा। ऊर्जा के क्षेत्र में भारत को एससीओ की सदस्यता से कई फायदे मिलेंगे। पूर्ण सदस्यता के बाद भारत एससीओ ऊर्जा क्लब में और मजबूत होगा। इस समूह में कुछ ऐसे देश हैं जिनके साथ ऊर्जा के क्षेत्र में भारत काम कर रहा है लेकिन पूर्ण सदस्यता से इसमें और गति आने की उम्मीद है।
पूर्ण सदस्यता के कई रणनीतिक फायदे हैं। पहली बात अफगानिस्तान से जुड़ी हुई है। 2001 के बाद भारत ने अफगानिस्तान में काफी निवेश किया है। इसलिए भारत के लिहाज से यह जरूरी है कि अफगानिस्तान में स्थायित्व बना रहे। ऐसे में अगर अफगानिस्तान की मौजूदा स्थिति ठीक नहीं होती तो भारत को नुकसान होगा। जब भारत को एससीओ की पूर्ण सदस्यता मिल जाएगी तो इस मंच इस्तेमाल अपने फायदे के लिए हो सकेगा। अब तक चीन ने ऐसा किया है। मौजूदा वैश्विक राजनीति ऐसी है कि किसी भी ऐसे मंच पर जहां आपका प्रतिद्वंदी मौजूद हो, वहां से आपका दूर रहना संभव नहीं है। भारत का संगठन में होना पाकिस्तान को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत से जुड़े अपने मामले को अपने हिसाब से रखने से रोकेगा।

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