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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-श्याम नारायण रंगा

भारत एक लोकतांत्रिक देश है। विश्‍व के सबसे बड़े इस लोकतंत्र मे तंत्र का निर्माण लोक द्वारा किया जाता है और जनता का जनता के द्वारा जनता के लिए शासन का निर्माण होता है। परन्तु वर्तमान में जो तस्वीर नजर आती है उससे ये लगता है कि लोक अपने तंत्र का निर्माण तो करता है परन्तु निर्माण के बाद यही लोक इस तंत्र में इतना उलझ जाता है कि अपने ही बनाए जनप्रतितिनिधियों से मुलाकात तक वो नहीं कर पाता।

मेरे दादाजी आज इस संसार में नहीं है लेकिन मैंने उनके मुंह से सुना था कि एक समय वो था जब देश के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री या किसी कैबिनेट मंत्री से मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी। यह वह दौर था जब आजादी नई नई आई थी दादाजी बताया करते थे कि राष्ट्रपति भवन के गलियारे में, संसद के गलियारे में आदि ऐसे स्थानों पर भारत भर से आए लोगों का तांता लगा रहता था और उस समय प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति महोदय अपनी देश की जनता से मिलने आते थे और उनके सुख दुख की सुनते थे। परन्तु वर्तमान हालात देखकर मन द्रवित हो जाता है कि इस देश का भाग्य विधाता आम जन, अपने ही एमएलए या एमपी तक से मिलने के लिए तरस जाता है और जीतने के बाद ये जनता से इतने दूर हो जाते हैं कि आम जन को इनसे मिलने के लिए किसी खास का सहारा लेना पड़ता है। बात कहने कि यह है कि यह कैसी विडम्बना है कि एमएलए एमपी को एमएलए एमपी बनाने वाली जनता ही इनसे दूर हो जाती है। आज लोकतंत्र में तंत्र लोक से दूर हो गया है। जब आमजन का काम इन हुक्मरानों से पड़ता है तो यह आम आदमी किसी की सिफारिश भिड़ाने की जुगत लगाता है, किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढता है जो नेताजी का खास हो जिसकी नेताजी के सामने चलती हो जिसकी नेताजी मानते हो और फिर वह नेताजी के सामने इस तरह से पेश आता है जैसे कोई गुनहगार अपने गुनाह की माफी मांग रहा हो और नेता इस आम आदमी के सामने ‘हाँ देख लूंगा’ की ऐसी वाणी निकालता है जैसे उसने कोई बहुत बड़ा उपकार कर दिया हो। आम जन से दूर होता यह नेता वह दिन भूल जाता है कि वह कैसे वोट मांगने इस आम आदमी के द्वार पर गया था और किस प्रकार एक याचक की तरह वोट की भीख मांगी थी और बेचारा आम आदमी अपने द्वार आए इस खास अतिथि की सेवा में लग गया था और अतिथि को भगवान का रूप समझ कर उसने इस भगवान को सिंहासन पर बैठा दिया था। नेताजी भूल जाते हैं कि यह वहीं आम आदमी है जिसने चुनाव के दौरान नेताजी को सिक्कों से, गुड़ से, केलों से और अपने खूने से तौला था और चाहे उस दिन इस आदमी ने खुद ने कोई कमाई न की हो परन्तु घर आए नेताजी को नोटों की माला पहनाई थी और आज जब चुनाव जीत कर नेताजी मंत्री बन गए या विधान सभा या संसद में चले गए तो अपने ही इस आदमी से इतने दूर हो गए कि यह आदमी सोचता है क्या मैंने माला पहना कर, सिक्कों से तौल कर कोई गलती तो नहीं कर दी। जनता से दूर होता यह राज जनता का राज नहीं रह गया है। आज राज कहने को तो आम आदमी का है लेकिन वास्तव में राज मंत्रियों का हे, अफसरों का है।

मैं आपको इस लेख के माध्यम से कहना चाहता हूँ कि आप आज ही प्रयास करो और सोचो कि आपको अपने देश के प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह से मिलना है या महामहिम माननीया राष्ट्रपति महोदया से मिलना है या सोनिया गाँधी से मिलना है या लालकृष्ण आडवाणी से मिलना है। पहले पहल तो इस देश के आम आदमी के दिमाग में यह एक बहुत बड़ा काम है और ऐसा करना उसके लिए असंभव है और वह यह सोच कर खुश है कि यार मुझे क्या काम इनसे मैं क्यूं मिलूं। हालात यह है कि सोनिया गाँधी या मनमोहन सिंह या लालकृष्ण आडवाणी अपनी ही पार्टी के एमएलए और एमपी तक से नहीं मिलते। ये एमएलए और एमपी भी इन लोगों के खास आदममियों से या इनके दरबार के दरबारियों से मिल कर खुश हो जाते है तो आम जन से मिलने की बात तो छोड़ ही दी जाए। और अगर कोई भावुक आम आदमी इनसे मिलने का प्रयास करे भी तो शायद उसे एक बहुत बड़ा समय लग जाएगा और वह इन लोगों से मिल ही नहीं पाएगा।

मेरा कहने का मतलब यह है कि भारत के ये खास लोग जो संसद में बैठते हैं जो लालबत्तियों में घूमते है आखिर इनको किस बात का डर है कि आम जन से ही दूर भागते फिरते है। सुरक्षा के नाम पर इनके चारों और एक ऐसा घेरा बना दिया गया है कि इस घेरे ने इन तथाकथित जन प्रतिनिधियों को आम जन से दूर कर दिया है। और बाकी इनके आस पास इनके दरबारियों की ऐसी भीड़ जमा हो गई है जिन्होंने इनके दरबार में स्थान पाकर अपने आप को तो बड़ा बना लिया है लेकिन इन लोगों को आम आदमी की पहुँच से बहुत दूर कर दिया है। आम आदमी के लिए ये भारत के खास विषिष्ट लोग चॉद हो गए हैं जिन्हें धरती के लोग देख तो सकते हैं लेकिन प्राप्त नहीं कर सकते।

अब अगर हम इसके कारणो में जाए तो कईं बाते सामने आती है। समस्या यह है कि जहाँ एमएलए एमपी मंत्री बनने के बाद नेता अपने को खास समझने लगता है वहीं भारत की जनता की मानसिकता ने उसे ऐसा गुलाम बना रखा है कि वह आज भी सामंतशाही की अपनी समझ से छुटकारा नहीं पा पाई है। आज इस देश का आम नागरिक नेता मंत्री एमएलए एमपी को इतना बड़ा समझता है जैसे कोई भगवान का अवतार हो गया हो। वह अपने छोटे से छोटे से कार्यक्रम से लेकर बड़े से बड़े कार्यक्रम में नेताजी को बुलाकर अपने को भाग्यवान समझता है और अपनी सामाजिक प्रतिष्ठा बढी हुई मानता है। आम आदमी ने आज यह मान लिया है कि साहब ये तो बड़े आदमी है। यह आम आदमी यह भूल गया है कि इस खास को खास आदमी आम आदमी ने ही बनाया है और अगर यह न चाहे तो यह खास आज भी आम बन जाए। आम आदमी यह भूल गया है कि राज जनता का है और इस तंत्र का निर्माण भारत की जनता ने ही किया है। इस देश की जनता की इसी समझ का फायदा इस देश के नेता उठा रहे है। इस देश का नेता जानता है कि भारत की जनता इतनी महान् है कि वह पाँच साल में सारे दु:ख भूल जाएगी और वह फिर से जाकर इस जनता को मुर्ख बना देगा। मुझे किसी विद्वान व्यक्ति की कही पंक्तियाँ याद आ रही है कि ‘जिस देश के नेता धूर्त होते है, उस देश की जनता मूर्ख होती है।’ मैं आगे यह बात जोड़ना चाहूँगा कि इन धूर्तों ने इन मुर्खों को सुधारने का कभी प्रयास नहीं किया और न करेंगे। इन मुर्खों में से ही कोई धूर्त और निकलेगा जो भोली भाली जनता पर राज करेगा। हम सब ने यह मान लिया है कि यह व्यवस्था ऐसी ही है और ऐसी ही रहेगी। आज भारत का आम आदमी स्वयं अपने को लाचार, कमजोर, बेचारा समझता है। वह अपने को दबा हुआ रखने का आदि हो गया है। हम अपने परिवार में खुश है, हम अपने बच्चों की प्रगति चाहते हैं और बच्चों की प्रगति में खुश हैं। हमारी सोचने की शक्ति ने बहुत सी बातों के साथ समझौता कर लिया है। इस तरह आज लोकतंत्र में लोक ही तंत्र से दूर हो गया है और जनता के राज में राज बनाने वाली जनता ही अपने राज से अनभिज्ञ है।

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