लेखक परिचय

एल. आर गान्धी

एल. आर गान्धी

अर्से से पत्रकारिता से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में जुड़ा रहा हूँ … हिंदी व् पत्रकारिता में स्नातकोत्तर किया है । सरकारी सेवा से अवकाश के बाद अनेक वेबसाईट्स के लिए विभिन्न विषयों पर ब्लॉग लेखन … मुख्यत व्यंग ,राजनीतिक ,समाजिक , धार्मिक व् पौराणिक . बेबाक ! … जो है सो है … सत्य -तथ्य से इतर कुछ भी नहीं .... अंतर्मन की आवाज़ को निर्भीक अभिव्यक्ति सत्य पर निजी विचारों और पारम्परिक सामाजिक कुंठाओं के लिए कोई स्थान नहीं .... उस सुदूर आकाश में उड़ रहे … बाज़ … की मानिंद जो एक निश्चित ऊंचाई पर बिना पंख हिलाए … उस बुलंदी पर है …स्थितप्रज्ञ … उतिष्ठकौन्तेय

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एल.आर.गाँधी

सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर से देश की न्याय प्रणाली को ‘धनशक्ति’ के बल पर मूक-बधिर बनाने के विदेशी षड्यंत्र पर अंकुश लगा दिया. माननीय न्यायधीशों ने केरल उच्च न्यायालय के उस निर्णय को भी भ्रामक करार दिया जिसमें मृतक मछ्वारों के परिवारवालों और इटली सरकार के नुमैन्दों के बीच कोर्ट के बाहर ले-दे कर समझौते को जायज़ ठहराया.

इटली की सरकार ने अपने जहाज के दो सुरक्षा कर्मचारिओं को छुड़ाने के लिए पहले तो राजनैतिक दवाब बनाया फिर कानूनी प्रक्रिया को परास्त करने के हथकंडे अपनाने शुरू कर दिए.मृत मछ्वारो के परिवारों को १-१ करोड़ रुँप्या दे कर उनके मुंह बंद कर दिए और कश्ती के मालिक को १७ लाख देकर अपने पहले के बयानों से मुकरने को राज़ी कर लिया. इटली की सरकार की इस कार्रवाही के पीछे भारतीय न्याय व्यवस्था और राजनैतिक माहौल को पडोसी देश पाकिस्तान के समान समझाने की मानसिकता ही माना जायेगा फिलहाल तो.

जिस प्रकार दो पाक नागरिकों की हत्या के दोषी अमेरिकन एजेंट रेमंड डेविस को अमेरिका , मृतकों के वारिसों को भारी भरकम ‘दियत ‘ ब्लड मनी दे कर , कोर्ट के बाहर ही ‘शरियंत’ के इस्लामिक कानून के तहत छुड़ा ले गया था, उसी तुफैल में इटली की सरकार ने भी कोर्ट के बाहर मृतक के परिजनों के साथ समझौता कर लिया और केरल हाई कोर्ट ने भी इस पर मोहर लगा दी. … मानों भारत जैसे सेकुलर देश में भी इस्लामिक शरिया कानून की ‘दियत ‘ ब्लड मनी का निजाम चलता है. विदेशियों की इस मानसिकता के पीछे हमारी सेकुलर सरकार की दोहरी न्याय प्रणाली ही काफी हद तक एक कारन है. हमारे यहाँ मुस्लिम समाज के लिए अलग से ‘शरिया’ के इस्लामिक कायदे-क़ानून लागु हैं ..यहाँ तक की कश्मीर जैसे मुस्लिम बहुल राज्यों में तो शरिया अदालतों के मौलवी भी सरकारी वेतन पर अपनी इस्लामिक अदालतें लगाते और फैसले सुनाते हैं. निकाह- तलाक और चार-चार शादियों के इस्लामिक नियम-कायदे का तो समाज के अन्य वर्ग भी धर्म परिवर्तन की आड़ में खूब फायदा उठाते हैं और ‘शरियत’ के आगे देश की कानून व्यवस्था महज़ मूंह ताकती रह जाती है.

इस्लामिक देशों में ‘शरियत’ क़ानून की आड में गैर मुस्लिम रियाया के मानवाधिकारों का खुल्लम खुल्ला उल्लंघन होता है. शरिया के तहत अरब देशों में हत्या के दोषी मुसलमानों और अन्य के लिए कानून अलग अलग है. एक मुस्लमान की हत्या पर ‘दियत ‘ ब्लड मनी एक लाख रियाद निश्चित है और मुस्लिम औरत पर इस से आधी ५० हजार रियाद. ईसाई पुरुष और महिला की हत्या पर क्रमशय ५० व् २५ हजार रियाद जबकि एक हिन्दू पुरष की हत्या का दोषी महज़ ६६६६ रियाद ब्लड मणि दे कर छूट सकता है और बेचारी हिन्दू अबला पर तो यह राशी सिर्फ ३३३३ रियाद ही है. इस्लाम में बहाई सम्प्रदाय के लोगों की हत्या पर बिना किसी प्रकार की ‘दियत ‘ या ब्लड मणि अदा किये ही दोषी को आज़ाद कर दिया जाता है.

सारे विश्व में इस्लाम के इस शरिया निजाम को नासिर करने के लिए ‘जेहाद’ जारी है… और भारत जैसे बनाना स्टेट में तो यह एक तरहं से लागू ही है … जब केरल हाई कोर्ट तक ने कोर्ट के बाहर ‘ब्लड मणि’ के समझौते को मान्यता देदी ….. फिर मरने वाला तो मर गया या मार दिया गया ….उसका परिवार तो ‘ब्लड मणि’ से अपना गुज़र बसर ढंग से कर पाए ….अल्लाह बहुत दयावान है.

 

 

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