लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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भारतीय जनता पार्टी का ग्राफ जिस तेजी से उपर उठा था, पिछले एक दशक में उतनी ही तेजी से अब वह रसातल की ओर जाता प्रतीत हो रहा है। पार्टी का एजेंडा इन दिनों क्या रहा कोई भी ठीक तरीके से नहीं बता सकता है। इसका कारण भाजपा के दूसरी पंक्ति के नेताओं का सत्ता संघर्ष कहा जा सकता है। यह सच है कि किसी की छवि बनाने और बिगाडने में मीडिया की बडी भूमिका रहती है, और मीडिया को अपने निहित स्वार्थों के लिए साध साधकर भाजपाई नेताओं ने पार्टी के बजाए खुद को स्थापित करने के प्रयास किए हैं।

अब भाजपा की लगाम बहुत साधारण कार्यकर्ता रहे नितिन गडकरी के हाथों में सौंपी गई है। गडकरी की भविष्य की योजनाएं क्या हैं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने क्या रोडमेप तैयार किया है, यह तो भविष्य में ही साफ हो सकेगा, किन्तु अब भाजपा का नया एजेंडा राम मंदिर, गंगा शुध्दिकरण और कश्मीर जैसे मुद्दे पर आकर टिक गया है। राम के नाम को भुनाकर एक बार भाजपा सत्ता की मलाई चख चुकी है, किन्तु सत्ता में आने के बाद वह अपने मुद्दे से भटक गई थी। अब दुबारा राम नाम के सहारे भाजपा की हिचकोले खाती नैया से वेतरणी पार करने का प्रयास जारी है।

इंदौर में हुए तीन दिनी महाकुंभ में हुए मंथन के उपरांत जो तथ्य निकलकर आए हैं, उनसे यही समझा जा सकता है कि भाजपा किसी भी कीमत पर आम आदमी की परवाह के स्थान पर अब येन केन प्रकरणेन सत्ता हासिल करना चाह रही है। भाजपा के आला नेता भूल चुके हैं कि राम मंदिर का मुद्दा अब शायद प्रासंगिक ही नहीं बचा है। 1992 में बाबरी ढांचे के दौरान युवाओं ने जो जोश खरोश दिखाया था, वे अब 18 साल बाद अधेडावस्था को पा चुके हैं। उनके मानस पटल से बाबरी विध्वंस की यादें और उसके बाद भाजपा का यू टर्न विस्मृत नहीं हुआ होगा।

रही बात अब शिव की जटा से निकली गंगा मैया के शुध्दिकरण की तो भाजपा को देश की जनता को यह बताना ही होगा कि जब छ: साल वे सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर थे तब उन्होंने गंगा के लिए क्या किया। जनता यह सवाल अवश्य ही पूछेगी कि आखिर अब गंगा की याद कैसे आई और अब क्या यह राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के पीएम इन वेटिंग लाल कृष्ण आडवानी की जटा से निकलने वाली है। कश्मीर मुद्दा अवश्य ही प्रासंगिक माना जा सकता है। इस मामले में भी भाजपा का सत्ता में रहते हुए इतिहास मौन ही है। 2004 के बाद भाजपा विपक्ष में है, पर भाजपा के प्रदर्शन को देखकर कहा जा सकता है कि भाजपा एक कमजोर विपक्ष के तौर पर अपनी छवि बना सकी है।

तीन दिनी माथा फोडी के बाद एक तथ्य उभरकर साफ तौर पर सामने आया है कि इन तीन दिनों में भाजपा के आला नेताओं ने अपनी-अलग भाव-भंगिमाएं दिखाकर मीडिया की सुर्खियों में रहने का प्रयास तो अवश्य किया है, किन्तु अंतिम छोर के आम आदमी के लिए उसके जेहन में कितनी चिंता है, इस बारे में चर्चा की फुरसत भाजपा को नहीं मिल सकी, जो अपने आप में आश्चर्यजनक मानी जा सकती है।

भ्रष्टाचार, अनुशासनहीनता और वंशवाद के लिए कल तक कांग्रेस को ही पर्याय माना जाता रहा है, अब भाजपा भी उसी राह पर चली पडी है। भाजपा में भी इस तरह के गंभीर रोग लग चुके हैं, जिनके इलाज के प्रति भाजपा संजीदा नहीं दिखाई पड रही है, यही कारण है कि भाजपा को कांग्रेस का भगवा संस्करण भी माना जाने लगा है। नाराजगी के चलते भाजपा के अनेक नेताओं ने इंदौर सम्मेलन से किनारा करना ही उचित समझा।

उधर भाजपा के पितृ संगठन माने जाने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भाजपा के लिए जो कार्ययोजना तैयार की थी उसमें भी पलीता लगाने के प्रयास आरंभ हो गए हैं। माना जा रहा है कि संघ प्रमुख मोहन भागवत चाहते हैं कि टीम गडकरी में उन लोगों को शामिल किया जाए जो भाजपा में कायाकल्प करने का माद्दा रखते हों। संघ के उच्च पदस्थ सूत्रों की मानें तो संगठन में अंगद की तरह पांव जमाए बैठे कुछ आला नेताओं की छुट्टी के हिमायती हैं संघ प्रमुख।

होना यह चाहिए कि टीम गडकरी में भाजपा के वरिष्ठ नेता मुरलीमनोहर जोशी, राजनाथ सिंह, अनंत कुमार, वेंकैया नायडू अब मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाएं। इसके साथ ही साथ संगठन में उन चेहरों को तवज्जो दी जानी चाहिए जो कार्यकर्ताओं और जनता से बेहतर संवाद कायम कर सकें। गडकरी की ताजपोशी वैसे भी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र कुमार मोदी को रास नहीं आई है। यही कारण है कि उन्होंने गडकरी के अध्यक्ष बनने के बाद उनसे जाकर सौजन्य भेंट करना तक उचित नहीं समझा। संघ जिन नेताओं को टीम गडकरी का हिस्सा बनाना चाह रहा है, उनकी राह में भाजपा के आत्मकेंद्रित नेताओं द्वारा शूल बोने के काम भी किए जा रहे हैं।

कुल मिलाकर इंदौर के महाकुंभ के बाद यह साफ हो गया है कि भाजपा का एजेंडा अब सत्ता प्राप्ति ही रह गया है। भाजपा के दिग्भ्रमित आला नेता अपने घालमेल वाले एजेंडे को लेकर भविष्य की कार्ययोजनाएं बनाने में जुटे हुए हैं। यह सब देखकर भाजपा की आने दिनों वाली राह बहुत ही धुंधली ही नजर आ रही है।

-लिमटी खरे

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