लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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‘बारामासा’, नवभारत टाइम्स और सरिता प्रेमियों समेत तमाम नेटवर्गीय सेकुलर बौद्धिकों का भारत विरोधी राग तीव्र हो गया है। भारत विरोधी इसलिए क्योंकि जिसे यह हिंदू धर्म की सीमाओं में कैद करने का दुस्साहस कर रहे हैं वह संस्कृति और संस्कार ही भारत को व्याख्यायित करते हैं। इनका उत्तर दिया जाना ही समय का वास्तविक बौद्धिक धर्म है। भारतीय किंवा हिंदू धर्म, संस्कृति और सभ्यता को लेकर जो टीका-टिप्पणियां की और दी जा रही हैं वह हमारे कथित बौद्धिक मित्रों के बौद्धिक दिवालिएपन की अजब-गजब मिसाले हैं।

यूरण्डपंथियों (यूरोपीय-इण्डियन सेकुलर) की बुद्धि पर हमें तरस आता है। छोटी सी बात है कि अपनी परंपरा, संस्कृति, समाज और पुरखों को यूं ही गाली मत दो, उनकी बेवजह अवहेलना और आलोचना न करो, लेकिन कुतर्क करने वाले कुतर्क पर कुतर्क दिए जा रहे हैं। कोई सलाह तक देने लगा है कि ‘सरिता’ पढ़िए मानो ‘सरिता’ में ही भारतीय तत्वज्ञान की सरिता बह रही है। हिंदू धर्म-संस्कृति के बारे में साधारण समाज को दिग्भ्रमित करने में किसी एक सेकुलर हिंदी पत्रिका का सर्वाधिक योगदान यदि माना जाए तो उसमें सरिता का सानी मिलना कठिन है। कैसे-कैसे कुतर्क दिए जाते हैं उसी की एक बानगी है सोमनाथ मंदिर के ध्वंस का एक मनगढंत किस्सा कि वह तो धर्माचार्यों की इस सनक के कारण ध्वस्त हुआ कि गजनवी के मंदिर में प्रवेश करते ही वह शिव प्रताप से जलकर राख हो जाएगा। प्रवक्ता डाट काम पर किसी सज्जन ने इसे उद्धृत भी किया है।

उन्हें अपना ज्ञान दुरुस्त कर लेना चाहिए। सोमनाथ मंदिर किसी पंडित के उपदेश से नहीं वरन् भारत के राजाओं की राजनीतिक अदूरदर्शिता और परस्पर ईर्ष्या-द्वेष की राजनीति से ध्वस्त हुआ। इतिहास बताता है कि गुजरात के महाराजा भीमदेव ने मंदिर की रक्षा के लिए वीरतापूर्वक युद्ध किया लेकिन अपने लोगों के धोखे के कारण वह परास्त हुए। सवाल है कि ग्यारहवीं सदी में सारे राजपुताने को लांघता हुआ गजनवी सोमनाथ तक पहुंच कैसे गया। उसे राजस्थान के रेगिस्तान में रोकने के लिए भारतीय धुरंधर राजनीतिक छत्रप एकजुट क्यों नहीं हुए? इस बारे में विस्तार से जय सोमनाथ नामक ऐतिहासिक कृति में वर्णन आया है। ‘सरिता’ समर्थकों को इसे पढ़ना चाहिए। न कि बेसिरपैर की ऊट-पटांग बातों का प्रचार करना चाहिए। दूसरे गजनवी और उसके गज़नी के पतन की कहानी भी पढ़नी चाहिए और कैसे सोमनाथ मंदिर फिर अपने खंडहरों से उठ खड़ा हुआ, इसे भी बताना चाहिए।

और क्या सिर्फ सोमनाथ देव ही पुनर्स्थापित हुए? भारतीय विरासत का नवोत्थान तो अब शुरू हुआ है। इन कथित बौद्धिक टिप्पणीकारों को तो यह भी पसंद नहीं कि हज़ारों साल के बाद दिल्ली की धरती पर भारत के इतिहास की कीर्ति पताका को और समुन्नत करता हुआ महान मंदिर ‘अक्षरधाम’ कैसे प्रतिस्थापित हो गया? संयोग ही है कि यह कार्य भी प्रमुख रूप से उन्हीं गुजरातियों ने साकार किया है जिनके सोमनाथ देव को कुचलने के लिए कभी दिल्ली सल्तनत और उनसे जुड़े विदेशी हुक्मरां बारंबार आतुर रहा करते थे।

इन्होंने कभी मंगल पर नासा के जीवन खोजी अभियान पर सवाल नहीं खड़े किए। यहां धरती पर करोड़ों जिंदगियां एक वक्त की रोटी और दो आखर शिक्षा के लिए तड़प रही हैं वहां हजारो करोड़ रूपये स्वाहा कर मंगल पर जीवन खोजा जा रहा है? आख़िर किसके लिए? इतने रूपयों से सारी दुनिया के गरीब देशों और विकासशील देशों का कायाकल्प किया जा सकता है। लेकिन वहां तक दिमाग नहीं जा पा रहा है। दिमाग वहां नहीं जा रहा है कि कैसे युरण्डपंथियों(यूरोपीय-इण्डियन) ने भारत की पीढ़ी दर पीढ़ी में भारत विरोधी विचार पनपाये हैं। इस एक तथ्य पर कलम नहीं चलती है कि किस प्रकार भारत सहित तमाम तीसरी दुनिया के देशों का भयानक आर्थिक शोषण कर पश्चिम ने अपनी अमीरी का महल खड़ा किया और आज भी उसे बरकरार रखने के लिए तमाम षड्यंत्रों को बुनने में लगा हुआ है।

इन्हें यह भी समझ नहीं है कि दुनिया के 80 प्रतिशत संसाधनों पर किस प्रकार अमेरिका और यूरोप ने अपना कब्जा जमाया हुआ है। इनके जितना शोषण कर भारत और अन्य विकासशील देश भी अमीर बनने का स्वप्न देखें तो बात हो, और तब इस धरती जितनी दर्जनों धरती की जरूरत पड़ेगी। धरती के संसाधन चुक चले हैं, यह संसार का वर्तमान सत्य है और इसीलिए मंगल व अन्य ग्रहों पर जीवन की खोज के लिए पश्चिमी वैज्ञानिक और राजनीतिक जगत बेताब है। लाखों-करोड़ स्वाहा किए जा रहे हैं इन विकसित देशों के द्वारा और वह भी इस चेतावनी के साथ की धरती पर शीघ्र भुखमरी का भयानक दौर प्रारंभ होगा।

आजादी के बाद से हमने अपने देश के संपूर्ण विकास पर जितना खर्च किया है उतना तो अमेरिका ने सिर्फ अपने स्पेस कार्यक्रम पर खर्च कर दिया है। कहां से ले लाए ये लोग इतना पैसा? ये उपदेश तो संसार हितैषी बनने का देते हैं लेकिन इतने बेशर्म हैं कि दुनिया को लूट-लूट कर पूरी तीव्रता से ‘मंगल अभियान’ चला रहे हैं। ऊपर से हमारे बौद्धिकदां हैं कि जिस सभ्यता ने धरती को चूसा और खतरे में डाला वह बेहतरीन और इसके विपरीत जो सभ्यता सादगी पूर्ण रही उसे बेकार बताया जा रहा है। ये किसके इशारे पर खेल रहे हैं, सहज समझा जा सकता है। अच्छा सिला मिल रहा है। खैर प्रकृति सबको औकात में लाकर ही रहेगी। ग्लोबल वार्मिंग और विकराल प्रदूषण शीघ्र ही सभी को इस वास्तविकता से दो-चार करा देगा कि दुनिया को किस संस्कृति और सभ्यता और विकास पथ का अनुकरण करना चाहिए।

मूल मुद्दे की बात तो यह है कि पश्चिम में सूरज जब अस्त होगा तभी पूरब में उजाला फैलेगा। यह किसी दार्शनिक की बकवास नहीं वरन् सृष्टि और संसार का चिरकालीन, सनातन सत्य है। आज पश्चिम आर्थिक समृद्धि के चरम पर है, अब उसका सूरज ढलना है। अब बारी हमारी है, हमें उठना है। लेकिन पश्चिम की जूठन और उसके फेंके गए कूड़े से हम अपना भविष्य नहीं सवार सकते, हमें अपना विचार, अपनी थाती आगे बढ़ानी होगी। हम अंधेरे में बहुत जी लिए, अब हमें उजाले में चलना है। जब हम अंधेरे में थे तो दुनिया ने धरती और प्रकृति को कहीं का नहीं छोड़ा, इसे बेतरतीब लूटा और बरबाद किया लेकिन हमारी संस्कृति ने हमें ऐसा करना नहीं सिखाया। हमारे लिए धरती माता है और हम उसके पुत्र हैं। माता पृथ्विः पुत्रो अहम् पृथिव्याः।। हम दुनिया को आश्वस्त कर सकते हैं कि जब हम उजाले में होंगे, दुनिया को भूखा नहीं रखेंगे, धरती का शोषण नहीं करेंगे, सारे संसार की बेहतरी और सुख-शांति के लिए काम करेंगे।

पर यहां लाख टके का सवाल है कि दुनिया की राजनीति का धुरा हिंदुस्तान कैसे बन सकेगा। जब उसके अपने बेटे इतने ज्यादा दिग्भ्रमित हो चुके हैं कि उन्हें अपना कुछ सुहाता नहीं, किसी वैकल्पिक विकास माडल के बारे में जब वे सोच ही नहीं सकते, दुनिया को कैसे राजनीतिक रूप से भारत की छतरी के नीचे खड़ा किया जा सके, कैसे विकल्प बना जा सके, दुनिया एक ओर और हम एक ओर, इस लिहाज से ताकत कैसै जुटाई जा सकेगी, इन प्रश्नों के समाधान के बिना आज सारी बातें बेमानी हैं।

सवाल धार्मिक , सांस्कृतिक या सभ्यता गत श्रेष्ठता का है ही नहीं, सवाल है कि कैसे सुख-शांति पूर्वक, प्रकृति के साथ समन्वय रखते हुए हम जिंदगी को खुशहाल बना सकें। और यह सवाल राजनीतिक है। इसका उत्तर भी राजनीतिक रूप से ही देना होगा। लेकिन हमारे राजनीतिक दल तो सेकुलरियाए हुए हैं। अमेरिका और यूरोप की चकाचौंध ने उनका दिमाग कुंठित और कुंद बना दिया है। ऐसे में परिवर्तन की आस किससे की जाए।

-राकेश कुमार

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