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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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डॉ.शिवानी शर्मा

कहते हैं कि मन जीते जग जीत।
प्रायः सभी दर्शन, सभी धर्म, नीति-वाक्य ‘स्व’ में परिवर्तन की ओर ही संकेत करते है। शायद मनुष्य की अपने में श्रेष्ठता का अनुभव करने की भारतीय परम्परा स्व उत्थान की अपेक्षा भी रखती और इसे अपना चरम ध्येय भी मानती है। यूँ भी कहा जा सकता है कि दूसरों से अपेक्षा करना प्रायः एक नए दुःख का ही कारण बन जाता है, इसलिए भी मनुष्य का लक्ष्य वह स्वयं ही होना चाहिए। अपने में ‘स्थिरता’ व ‘एकाग्रता’ का संचार करना ही अपना विकास करना भी है और ‘स्व’ को परिभाषित करना भी।
हैरत की बात न होगी यदि नीति-शास्त्रों मे बताए गए मूल्य व नैतिक शिक्षाएं एक प्रयोगात्मक विधि सदृश समझे जाएं जिसमें अपना ही प्रक्षालन अपने को प्रयोगशाला में परिवर्तित करने का प्रयोग है । यह प्रयोग एक समुद्र मंथन है जिसमें से निकलने वाला गरल भी मैं, अमृत-कलश भी मैं, पर्वत भी मैं ही वासुकी भी मैं और देव-दैत्य भी मैं। यह अभेद की स्थिति, भारतीय दर्शनिक परम्परा का वैशिष्ट भी रहा है और इस अभेद अनुभूति में ‘दूसरा’ कोई रहता ही नहीं। इसी स्व’ के विस्तार के चलते कभी संत हिम-शिखाओं पर तो कभी कन्दराओं की ओर जाते मिलते है।
भीखा केवल एक है किरतिम भया अनन्त ।
एकै आतम सकल घट यह गती जानहि संत ॥
बहुत सरलता से हम मनुष्य जीवन का प्राकृतिक जगत से यह कहकर भेद ही नहीं करते अपितु मनुष्य की श्रेष्ठता भी स्थापित करने का प्रयास करते हैं कि मनुष्य एकमात्र प्राणी है जिसमें बुद्धि व चयन-शक्ति रहती है। किन्तु ऐसी श्रेष्ठता के लिए दिए गए तर्कों की अर्थवत्ता सदा प्रश्न का विषय है। बुद्धि-प्रयोगी होना यदि मानव को इस अभिमान से भरने लगे कि वह प्रकृति का अंश नही अपितु प्रकृति का स्वामी है, तो वह केवल लकीर के फकीर के समान ही आचरण नहीं करता अपितु एक पक्षीय सिद्धान्त को स्थापित करता है। मानव जगत के कई ऐसे रहस्य हमारे सामने खुले पन्नों की तरह उपस्थित रहते हैं फिर भी हमारे बौद्धिक नियम उन्हें न जोड़ पाते हैं न ही समझ पाते हैं । कोई भी वैज्ञानिक व दार्शनिक सिद्धान्त उनके स्पष्टीकरण के लिए पर्याप्त नहीं बनता।
वस्तुओं को उनके स्वरूप में देखना और समझना हमारी वैचारिक दृष्टि को स्पष्ट तो करता ही है और साथ में करुणामय मानसिकता के उत्पादन में सहायक भी है। वस्तुओं व घटनाओं को उनके स्वरूप में समझने से अभिप्राय क्या है और यह क्यों आवश्यक है और क्या यह दृष्टिकोण केवल सांसारिक वस्तुओं तक ही सीमित रहना चाहिए या फिर हमें अपने जीवन में उपयुक्त होने वाले सिद्धान्तों को भी इसी दृष्टि के चलते परखते रहना चाहिए ? सबसे कठिन तो है अपने को एक अलमारी की तरह खोलना और फिर उसी अलमारी में पड़ी वस्तुओं की जाँच करना और उस उपलब्ध सामान में क्या वांछनीय है और क्या नहीं, इस पर विशेष चिन्तन करना। जो उपयुक्त है उसे संजोना और थोड़ा हो सके तो खाद-पानी डालना और जो अनुपयुक्त है उसे अलमारी से यदि बाहर न भी निकाल सके तो कम से कम ऐसे कोने में दबाना जहां से वह अपना न्यूनतम प्रभाव हम पर छोड़े।
मानव जीवन का नितान्त सौन्दर्य इसी बात पर आश्रित है कि वह सही-गलत के निर्णयों से उठकर बातों व उनके संदर्भों को बिना किसी पूर्वाग्रह से देख व समझ सके। किन्तु यह तथ्य भी पर्याप्त मात्रा मे विचलित करता है कि मनुष्य का आधे से ज़्यादा जीवन सही-गलत का निर्णय करने में ही निकल जाता है। एक प्राथमिक शिक्षा ही हमारे लिए अन्तिम शिक्षा बनने लगती है। व्यक्ति में मनुष्यता के सभी गुण उपलब्ध होने पर भी हम उसे ‘एकमार्गी’ बना कर देखने के प्रयास में केवल अपने अहं को ही संतुष्ट करते हैं । व्यक्ति को उसकी सम्पूर्णता से खण्डित कर उसका आंकलन करने का प्रयास मानवता के आधार को खण्डित करने जैसा है।
यह बहुत ही रोचक है कि प्रकृति में नियम तो है किन्तु नियन्ता नहीं। क्या मनुष्य इस आंकलन गतिविधि में अपने की नियन्ता-स्वरूप तो नहीं मानने लगता, यह सदा विचारणीय प्रश्न रहेगा। इसीलिए शायद वस्तु, व्यक्ति व परिस्थितियों को उनके अपने स्वरूप में चाहे हम न भी समझ सकें किन्तु इस दिशा में निरन्तर प्रयास हमें दृष्टीहीन होने से बनाने में सहायक हो सकता है।

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