लेखक परिचय

डॉ. दीपक आचार्य

डॉ. दीपक आचार्य

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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 डॉ. दीपक आचार्य

मरीज से मिलने जाएं तब

आत्म-अनुशासन बरतें

जीवन के हर कर्म में अनुशासन का महत्त्व है और यह बाहर से नहीं आता बल्कि अपने अनुभवों और ज्ञान से आता है। अनुशासन स्वयं को गढ़ना पड़ता है और इसे ही आत्म-अनुशासन कहा गया है जो कि स्वयंस्फूर्त्त अर्थात स्वतःप्रेरित होता है। लेकिन यह उन्हीं लोगों में हो सकता है जिन्होंने मनुष्य जीवन के अर्थ को समझा हो और दूसरों के लिए, समाज के लिए, सेवा और परोपकार के लिए जीने का संकल्प लिया है।

जिन लोगों ने खुद का पेट और घर भरने को अपनी जिन्दगी का बड़ा और शाश्वत लक्ष्य मान लिया है उनके लिए न जीवन के अनुशासन का मतलब है, न उनके अपने जीवन का, बल्कि ये लोग किसी बेजान यंत्र से कम नहीं होते, जहाँ न मानवीय संवेदनशीलता है न मूल्यों के प्राण तत्वों का संयोग।

आजकल मर्यादाओं और अनुशासन के बाँध टूटते जा रहे हैं, मनुष्य थोड़े ही दिन में पूरा प्रवाह पा जाने के फेर में अब ऐसा अधीर हो उठा है कि बेसब्री उसके जीवन में कदम-कदम पर पसरी हुई है।

जीवन के और धर्म और कर्म की बात छोड़ भी दें तो आजकल मरीजों से मिलने जाने वाले लोगों में से अधिकतर में विवेकहीनता और जीवन में हल्केपन का बोध होने लगा है। किसी भी प्रकार के अस्वस्थ लोगों से घर में मिलने जाएं अथवा अस्पताल में, इस बात को हमेशा सामने रखें कि आप उनकी कुशलक्षेम पूछने जा रहे हैं और आपका पूरा व्यवहार इसी बात के इर्द-गिर्द होना चाहिए। लेकिन अधिकतर लोग कुशलक्षेम पूछने की बजाय ऐसा-ऐसा व्यवहार करने लगते हैं कि मरीज की मानसिक और शारीरिक हालत और अधिक बिगड़ जाती है और मिलने आने वाले लोगों की वजह से कई बार मरीज संकट में आ जाता है।

जब भी किसी मरीज से मिलने जाएं, उसके आत्मविश्वास को बढ़ाने वाली बातें कहें और इस प्रकार की चर्चा करें जिससे कि उसमें बीमारी से लड़ने की क्षमताओं में और अधिक अभिवृद्धि हो।

सभी लोगों को यह बात अच्छी तरह समझ लेनी चाहिए कि मनुष्य की सारी बीमारियों की जड़ मानसिक धरातल है और वह जितना मजबूत, स्वस्थ और स्वच्छ होगा, बीमारियों से लड़ने की क्षमताएँ उतनी ही अधिक होंगी। आत्मविश्वास और मानसिक मजबूती ही वे कारक हैं जिनकी बदौलत कितना ही बीमार व्यक्ति जल्द से जल्द स्वस्थ हो सकता है।

इस बुनियाद को मजबूत रखने की जिममेदारी स्वयं बीमार के साथ ही उन लोगों की भी है जो उनकी कुशलक्षेम पूछने जाते हैं। मरीज के हाल-चाल पूछने वालों लोगों का सकारात्मक सोच से भरा हुआ होना भी जरूरी है।

कई लोग ऐसे होते हैं जिनकी पूरी जिन्दगी नकारात्मकता से भरी होती है और ऐसे लोगों के जिस्म का आभामण्डल भी नकारात्मक ऊर्जाओं से भरा रहता है। ये लोग जहाँ कहीं जाते हैं वहाँ नकारात्मक माहौल अपने आप पसर जाता है। ऐसे कई लोग हैं जो किसी मरीज के पास जाते हैं तब उसकी बीमारी को लेकर बेवजह बढ़ा-चढ़ा कर इस प्रकार बातें करने लगते हैं जिससे कि मरीज को लगता है कि उसका रोग असाध्य और बहुत बड़ा है। यह वह स्थिति होती है जो मरीज के आत्मविश्वास का पारा धड़ाम से नीचे गिरा कर शून्य की ओर ले जाती है और मरीज की मानसिक स्थिति कमजोर होने के साथ ही बीमारियों से लड़ने की स्वाभाविक क्षमता पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

हमेशा यह ध्यान रखें कि कोई भी नकारात्मक और खूब बोलने वाला, बकवासी व्यक्ति मरीज के पास ज्यादा समय बैठा नहीं रहे। मरीजों से ऐसे नकारात्मक और काली जुबान वाले लोगों को जहाँ तक संभव हो दूर ही रखा जाना चाहिए। ऐसे दो-चार मिल जाने पर मरीज की सेहत को और अधिक खतरा पैदा हो जाता है।

घर पर अथवा अस्पताल में भरती मरीजों को मिलने जाएं तो उनसे उनकी बीमारी के कारणों और अब तक ईलाज का इतिहास न पूछें बल्कि सिर्फ कुशलक्षेम पूछें और आत्मविश्वास बढ़ाने वाली बात करते हुए जल्द ही ठीक हो जाने की कामना करने वाली चर्चा करें, लेकिन यह सब संक्षिप्त ही। ज्यादा देर तक मरीज के पास बैठे रहना भी ठीक नहीं।

ईलाज या दूसरी किसी बात के बारे में जानकारी देनी जरूरी ही हो तो वह मरीज के किसी सुलझे हुए और आत्मविश्वासी बुजुर्ग या बड़े लोगों से चर्चा कर दें लेकिन वह भी मरीज के सामने नहीं। मरीजों से मिलने जाएं तब अपनी व्यक्तिगत साफ-सफाई और शुद्धता का भी ख्याल रखें क्योंकि मिलने जाने वाले लोगों से भी संक्रमण का खतरा होता है। इसी प्रकार अस्पताल में मरीजों से मिलकर आने के बाद भी अपने वस्त्रों को धोने में डाल दें तथा संभव हो तो हाथ-पाँव-मुँह इत्यादि धो लें और शुद्ध हो लें।

जब किसी भी मरीज से मिलने जाएं, ध्यान रखें कि आप कुशलक्षेम पूछने जा रहे हैं, आतिथ्य का आनंद पाने नहीं। मरीजों से मिलने जाने पर किसी भी प्रकार का आतिथ्य स्वीकार न करें। यहाँ तक कि चाय-नाश्ता तक भी नहीं। फिर यदि मरीज अस्पताल में है तो वहां चाय-काफी तक भी स्वीकार न करें। मरीज कहीं भी हो, उससे मिलने जाने पर आतिथ्य की आशा नहीं की जानी चाहिए। एक तो पहले से ही मरीजों के परिजन बीमारी और ईलाज को लेकर परेशान रहते हैं दूसरी ओर कुशलक्षेम पूछने वालों का तांता बंधा रहता है। ऐसे में घरवाले आपको समय दें, मरीज की सेवा करें या चाय-नाश्ते और पानी के प्रबन्ध में लगे रहें। मरीजों के परिजनों की ओर से आतिथ्य का कितना ही प्रभावी आग्रह क्यों न हो, इसे विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दें, यही मानवता और समय का तकाजा है। दूसरा इससे मरीजों के परिजनों की आर्थिक स्थिति भी डांवाडोल हो जाती है। ईलाज से कहीं ज्यादा खर्च हो जाता है लोगों की आवभगत पर।

कई बार गंभीर और अंतिम समय के सामीप्य वाले मरीजों की सेवा में रहने वाले लोगों की नींद तक पूरी नहीं हो पाती है, ऐसे में मिलने वालो का तांता लग जाए तो मरीज के साथ घर वाले और परिजन भी बीमार होने से नहीं बच सकते। मरीजों से मिलने जाने का समय भी परिस्थितियों के अनुसार तय होना चाहिए। जिस समय मरीज सो रहा हो उस समय पहुंचकर उसे उठाना ठीक नहीं क्योंकि सामान्य तौर पर जब कोई भी व्यक्ति जब बीमार हो जाता है, उसे नींद कम आती है। ऐसे में नींद आना उसकी सेहत के लिए जरूरी होता है। फिर ऐसे समय मिलने जाने वाले लोग मरीज के शुभचिन्तक हैं या शत्रु, यह बात मरीज को नहीं हमें ही समझनी और स्वीकार करनी होगी। ऐसी कई बातें हैं जिन्हें हमें समझने और लोगों को समझाने की जरूरत है।

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