लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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varishthसंदर्भः- आडवाणी,जोशी,सिन्हा और शांताकुमार का मोदी-शाह पर हमला

प्रमोद भार्गव
बिहार चुनाव की हार के परिप्रेक्ष्य में भाजपा के हाशिए पर डाल दिए गए बुजुर्ग नेता हरकत में आ गए हैं। यह स्थिति किसी भी राजनीतिक दल के आंतरिक लोकतंत्र और देश के लिए महत्वपूर्ण है। लालकृष्ण आडवाणी, मुरलीमनोहर जोशी, यशवंत सिन्हा और शांताकुमार ने एक साझा बयान जारी करके प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह पर निशाना साधते हुए कहा है कि दिल्ली की हार से सबक नहीं लेने वाले नेताओं की बिहार की पराजय के क्रम में जिम्मेदारी निश्चित की होनी चाहिए। इन नेताओं ने दूसरी अहम् बात यह भी कही कि समीक्षा बैठक में उन नेताओं को शामिल नहीं किया जाना चाहिए, जो चुनाव में जिम्मेदारी संभाल रहे थे। बिहार चुनाव में हार का ठीकरा संगठन पर फोड़ देने पर भी इन नेताओं ने ऐतराज जताया है। सही भी है, जब नेतृत्व ने जिम्मेदारी साझा की ही नहीं थी, तो हार का ठीकरा संगठन पर फोड़ने का औचित्य ही कहां रह जाता है ? वरिष्ठ नेताओं को तो छोड़िए, बिहार की राजनीति में जो सक्रिय नेता हैं, उन्हें भी पार्टी नेतृत्व ने एक तरह से अपने घरों में नजरबंद रहने को बाध्य कर दिया। यही करनामे बिहार चुनाव में शर्मनाक दुष्परिणामों के रूप में देखने में आए हैं।
भाजपा परंपरा, संस्कृति, संस्कार और वसुधैव कुटुंबकम की ध्वजावाहक रही है। इन सनातन मूल्यों से पार्टी कार्यकर्ताओं को संस्कारित करने का काम संघ बखूबी करता रहा है। लेकिन पार्टी व सत्ता संचालन जिन दो व्यक्तियों, नरेंद्र मोदी और अमित शाह की मुठ्ठी में है, वे लोक और आम आदमी की बात तो छोड़िए,अपने ही दल के उन बुजुर्ग नेताओं को किनारे लगाने में लगे रहे हैं,जिनके कंधों पर सवार होकर वे केंद्र की सत्ता पर काबिज हुए हैं। ये वही आडवाणी हैं, जिन्होंने गोधरा-दंगों के बावजूद मोदी को मुख्यमंत्री बने रहने देने में पूरी शक्ति लगा दी थी। वरना,प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने तो राजधर्म का पालन नहीं करने का जुमला उछालकर एक तरह से मोदी को पदच्युत करने का संकेत दे दिया था। लेकिन मोदी ने न केवल आडवाणी को अपने ही घर में नजरबंद रहने का बाध्य किया, बल्कि दल के अन्य बुजुर्ग जोशी, यशवंत सिन्हा और शांताकुमार के साथ भी यही किया। कहने को आज ये नेता पार्टी के मार्गदर्शक मंडल में हैं, लेकिन इस मंडल का न तो कोई अस्तित्व है, न कोई कार्यशैली है और न ही इसके कोई लक्ष्य तय किए गए हैं। नतीजतन न इस मंडल की कभी कोई बैठक होती है और न ही पार्टी नेतृत्व इसका मार्गदर्शन लेने की जरूरत समझता है। मोदी-शाह के अंधभक्त इस परिप्रेक्ष्य में कह सकते हैं कि ये नेता बिहार की पराजय के बहाने अपनी खीझ निकाल रहे हैं। किंतु यदि उन्हें मुख्यधारा में बने रहने दिया जाता और चुनाव में टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार के अवसर दिए जाते तो न तो वे कुंठित होते और न ही हार की जिम्मेदारी व्यक्ति केंद्रित रह जाती ? हकीकत यह है कि दिल्ली की पराजय के बाद बिहार की पराजय में उन लक्षणों की विस्तार से पुष्टि हुई है, जो व्यक्तिवादी राजनीति के आधार रहे हैं।
राजनीति में मतभेद हमेशा रहते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक संस्था में इन मतभेदों का रहना जरूरी भी है। लेकिन भाजपा में मतभेद की जिस कटुता का चरम आज दिखाई दे रहा है,पहले कभी दिखाई नहीं दिया। अटलजी जब प्रधानमंत्री थे, तब उन्होंने बड़ी चतुराई से राष्ट्रिय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल 24 दलों का नेतृत्व किया था। ममता बनर्जी, जयललिता और नीतीश कुमार जैसे एकदम विपरीत विचारधारा के लोग भी कमोवेश उनसे संतुष्ट रहे, जबकि मोदी-शाह के नेतृत्व से आज भाजपा के सबसे पुराने सहयोगी अकाली दल और शिवसेना भी नाराज हैं। दरअसल किसी भी दल और गठबंधन में लोकतांत्रिक प्रक्रिया तब तक स्वस्थ्य, सहिश्णु और अधिकतम स्वीकार्य रहती है, जब तक उसमें विष्वास और संवाद की स्थितियां बनी रहती हैं। जब ये स्थितियां षंकाओं और संकीर्णताओं से घिरने लगती हैं तो फैसलों में किसी दूसरे की परामर्ष को नजरअंदाज करने का सिलसिला शुरू हो जाता है। नतीजतन निर्णय की सामूहिक प्रक्रिया एकतंत्री हुकूमत में तब्दील होने लगती है। अकसर एकतंत्री मानसिकता, असुरक्षा-बोध का कारण बन जाती है। तब सत्तारूढ़ या ताकतवर व्यक्ति सत्ता के औजारों का उपयोग अथवा दुरूपयोग स्वंय को बचाने और यथास्थिति में बनाए रखने के लिए करने लग जाते हैं। यह स्थिति सामूहिक सहभागिता का हश्र तो करती ही है,नागरिक अधिकारों के हनन और व्यक्ति के मूलभूत अधिकारों पर भी कुठारघात करती है।
यही वजह है कि पिछले डेढ़ साल के कार्यकाल में मोदी-सरकार ऐसा कोई नया विचार तो नहीं दे पाई, जिससे आमजन के आर्थिक हित मजबूती से सधते। अलबत्ता भूमि अधिग्रहण विधेयक को जरूर पूंजीपतियों के हित में कमजोर करने के प्रयास हो रहे हैं। आर्थिक सुधारों के लिए वेबजह विदेशी पूंजी निवेश को बढ़-चढ़कर प्रोत्साहित किया जा रहा है। यही वजह है कि सरकार ने बिहार की हार के नजरिए से 15 क्षेत्रों में आनन-फानन एफडीआई को तो आसान बना दिया, लेकिन सूखे के चलते देशभर में आत्महत्या कर रहे किसानों की परवाह कहीं दिखाई नहीं दी ? जबकि बिहार में भाजपा की करारी हार में किसान और कृषि मजदूरों की नाराजगी भी रही है। साफ है, सत्ता पक्ष का यदि विदेशी और अमीरी परस्त ही रूझान बना रहता है तो असम, पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी बिहार जैसा हश्र होना तय है।
भाजपा के वर्तमान नेतृत्व ने अपने पितृपुरुषों का बहिष्कार जिस तरह से केंद्रीय नंतृत्व में किया हुआ है, उसी तर्ज पर बिहार के प्रभावशाली नेतृत्व को भी दरकिनार किया। गोया बिहार से लेकर दिल्ली तक बवाल मचा है। शत्रुधन सिन्हा, आरके सिंह, कीर्ति आजाद, हुकूमदेव नारायण यादव के साथ-साथ बेगूसराय से सांसद भोला सिंह को भी पार्टी नेतृत्व ने निराश किया। जबकि भोला आठ बार विधायक रह चुके हैं। यदि इन्हें टिकट बंटवारें से लेकर अपने-अपने उम्मीदवरों को जिताने की जबाबदेही सौंपी जाती तो शायद भाजपा की यह दुर्गति नहीं हुई होती। दरअसल दिल्ली और बिहार में भाजपा ने संयुक्त नेतृत्व उभरने पर तो अंकुश लगाया, लेकिन संयुक्त असंतोष और अंतर्कलह नहीं रोक पाई ? किंतु अब दिल्ली की हार के बाद बिहार की हार ने तय कर दिया है कि लोकतंत्र से बड़ा, एकतंत्र नहीं हो सकता ? मोदी और शाह की जोड़ी को यह भ्रम कतई नहीं पालना चाहिए कि वे एक-एक कर सभी वरिष्ठों को दरकिनार करके चुनावी रण में जीत का अश्वमेध घोड़ा दौड़ाने में सफल होते रहेंगे।
जनसंघ से लेकर भारतीय जनता पार्टी तक इस दल में दो बातें अहम् और समानांतर रही हैं। एक पीढ़ीगत बदलता नेतृत्व और अनुशासन और दूसरे राष्ट्रिय मूल्यों से परिभाषित विचारधारा। किंतु पार्टी के लंबे इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बुजुर्ग नेताओं और परंपरागत विचारधारा को दरकिनार करके पूरा दल व्यक्ति केंद्रित हो गया। यहां तक कि जो आडवाणी मोदी के सुरक्षा कवच बने रहे, उन आडवाणी को भी बुजुर्ग की परिधि में लाकर कोने में बिठा दिया गया। देश तो देश, विदेश नीति भी प्रधानमंत्री के ईदगिर्द घूम रही है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की भूमिका गौण बनी हुई है। ये कार्यशैलियां इस बात को प्रमाणित करती हैं कि भाजपा दल की विधान-सम्मत मान्यताओं से किनारा करने में लगी है। उसका संस्थागत ढाचां व्यक्ति केंद्रित होता जा रहा है। तकनीक उस पर इतनी हावी हो गई है कि मिस्ड काॅल को पार्टी की सदस्यता का जरिया बना लिया है। यह जरिया पार्टी का फेसबुकिया मित्रों की तरह ऐसे आभासी सदस्यों में तब्दील कर रहा है, जिनकी यथार्थ में कोई क्षेत्रीय उपयोगिता नहीं है ? नए सदस्य बनाने का यह निर्णय भी पार्टी के संविधान के अनुरुप सर्व-सम्मति से नहीं लिया गया है। इसलिए इसे वैघ नहीं ठहराया जा सकता है। पार्टी को यह फैसला लेना ही था तो संविधान सभा की बैठक बुलाने की जरुरत थी। साफ है, पार्टी में संविधान को भी दरकिनार करके मनमर्जी से निर्णय लेने और उन्हें थोपने का सिलसिला चल पड़ा है। ऐसे फैसले उसी तरह से आत्मघाती हैं, जिस तरह से पार्टी बुजुर्गों की पूरी कतार को किनारे करके एकल नेतृत्व के स्वरुप में संकीर्ण होती जा रही है। इस संकीर्णता को यदि जल्दी ही व्यापक विस्तार नहीं दिया गया तो न केवल पार्टी में असंतोष फूटेगा, बल्कि उपेक्षित नेता कल को पार्टी छोड़ने पर भी मजबूर हो सकते हैं ?

प्रमोद भार्गव

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