लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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-बीनू भटनागर-  western thoughts

संवेदनशीलता होना अर्थात किसी के परेशानी मे कष्ट होना अच्छी बात है, पर कोरी  संवेदनशीलता  से  किसी को  लाभ नहीं होता, कोरी  सवेदनशीलता से मेरा तात्पर्य है कि किसी की परेशानी मे आप कुछ न करें या न पा रहे हों तो भी दुखी बने रहें। आप किसी से जितना जुड़े होते हैं उतना ही उसका कष्ट बड़ा लगता है , उतने ही आप संवेदनशील होते हैं, परन्तु कहीं कोई दुर्धटना, प्राकृतिक आपदा या आतंकवाद घटता है तो वह हमारी संवेदनाओं को छूकर निकल जाता है, हम फिर सामान्य हो जाते हैं। और ऐसा होना भी चाहिये, क्योंकि हमारी सीमायें हैं जिनके बाहर जाकर हम हरेक की मदद तो कर नहीं सकते।इस दुनिया में रोज़ कुछ अच्छा, कुछ बुरा होता रहता है, सुख-दुख आते जाते हैं। कुछ लोग ये बात नहीं समझते और कही भी कुछ भी ग़लत होता है तो दुखी हो जाते हैं, सामान्य रहने में उन्हें ग्लानि होती है, ऐसी संवेदनशीलता को अतिसंवेदनशीलता कहते हैं जिसके कारण ऐसे लोगों को चारों ओर निराशा और अंधकार नज़र आने लगता है। यह स्थिति धीरे-धीरे अवसाद (depression) का रूप ले लकती है।

एक नेक इंसान को उतना ही संवेदनशील होना चाहिये कि वह कष्ट की घड़ी में यथासंभव किसी की मदद करे परन्तु ऐसा करना यदि उनके वश में न हो तो उसके बारे में सोच-सोच कर दुखी या उदास न हों। संवेदनशील इंसान दुर्घटना के समय उपस्थित होगा तो वह मदद करेगा, अनदेखा करके वहां से नहीं जायेगा। हम जानते हैं कि देश में ग़रीबी है, कुछ लोगों को भूखे सोना पड़ता है, बहुत से बेघर हैं, यही सोच-सोच कर हम दुखी नहीं हो सकते। ख़ुद को जीवन की ख़ुशियों से वंचित नहीं कर सकते, क्योंकि ग़रीबी दूर करना हमारे वश में नहीं है। हां, किसी ख़ास अवसर पर किसी ग़रीब की मदद कर सकते हैं पर इससे उसकी ग़रीबी दूर नहीं होगी।

अक्सर लोग कहते हैं कि जिस देश में बहुत से लोग एक समय भी भर पेट भोजन नहीं कर पाते फिर भी यहां बड़ी धूम धाम से विवाह होते हैं, बड़ी-बड़ी दावतें होती हैं, ये सही नहीं है। खाद्य पदार्थों की बर्बादी तो नहीं होनी चाहिये पर संवेदनशीलता के नाम पर किसी को ख़ुशी मनाने से रोकना भी सही नहीं है। होना यह चाहिये कि ख़ुशी के अवसरों पर लोग स्वेच्छा से कुछ धन किसी स्वंसेवी संस्था को दान में दे दें।हम यह भी नहीं भूल सकते कि इन  बड़ी-बड़ी शादियों के कारण बहुत से लोग रोटी रोज़ी भी कमा रहे हैं। एक समय था जब देश में बहस छिड़ी थी कि भारत जैसे ग़रीब देश मे रंगीन टीवी लाया जाये या नहीं, पर वो लाया गया। और लाना भी चाहिये था क्योंकि समय के साथ चलना  ज़रूरी है। मंगलयान भेजने को भी ऐसी ही असंवेदनशीलता का नाम दिया जा रहा है। यदि हम वैज्ञानिक अनुसंधान नहीं करेंगे तो पिछड़ जायेंगे, कोई भी परीक्षण सफल हो ज़रूरी नहीं है, पर परीक्षण करते रहना, नई खोज करते रहना ज़रूरी है।ऐसा नहीं होता तो अभी हम पाषाण युग में ही जी रहे होते।

अति संवेदनशीलताका एक कारण डर भी होता है। किसी भी दुर्घटना को देखकर, किसी को विपत्ति में देखकर मन में विचार आने लगते हैं कि कहीं हमारे साथ या हमारे किसी प्रिय के साथ ऐसा न हो जाये। हमारी व्याकुलता बढ़ने लगती है, ऐसे में व्याकुलता विकार (anxiety disorder) होने की संभावना बढ़ जाती है। किसी के दुख में संवेदना के दो बोल कहने से उसका दुख भले ही कम न हो पर सांत्वना मिलती है पर हम उस दुख की चादर को ख़ुद ही ओढ़ लें, ये भी ज़रूरी नहीं है। हमने संवेदना प्रकट की, कुछ मदद कर सकें तो वह भी कर दी, फिर अपने काम में लग गये, ये कोई नाटक, अभिनय या दिखावा नहीं है जीने का सही तरीका है, सामान्य व्यवहार है।

अतिसंवेदनशील व्यक्ति घर परिवार में या दफ्तर में किसी भी मामूली सी बात को मन से लगाकर बैठ जाता और वह बात उसके दिमाग़ से निकलती ही नहीं, परेशान करती रहती है। बहुत सी बातों को अनदेखा-अनसुना करके भूल जाने में ही सबकी भलाई होती है, पर अतिसंवेदनशील व्यक्ति ऐसा नहीं कर पाता जिसके कारण वह तनाव में रहता है। इस तनाव के कारण क्रोध बढ़ सकता है, जो मानसिक स्वास्थ पर विपरीत प्रभाव डालता है। छोटी-छोटी बातें आत्मसम्मान का प्रश्न बन जाती हैं वो भी सही नहीं है।

संवेदनहीन व्यक्ति बहुत स्वार्थी होता है, उसे कोई पसन्द नहीं करता। संवेदनशीलता का व्यक्ति के व्यवसाय से भी संबंध होता है। हमेशा नहीं पर जेल और पुलिस के कर्मचारी अपराधियों के संपर्क में आने से संवेदनहीन हो सकते हैं। एक ही व्यक्ति की संवेदनशीलता अलग अलग परिस्थितियों में अलग-अलग होती है। कोई पुलिसकर्मी अपने काम के समय अपनी संवेदनशीलता को नियंत्रित कर सकता है। डॉक्टर अपनी संवेदनशीलता के कारण किसी भी आकस्मिक चिकित्सा के लिये तत्पर रहते हैं, पर  इस संवेदनशीलता के साथ अपने घर नहीं जाते। यदि वो मरीज़ो के दुखों में खुद को डुबों देंगे तो न किसी का इलाज कर पायेंगे न अपना जीवन जी पायेंगे।

व्यक्तित्व के गुणदोषों का समन्वय जीवन में ठहराव लाता है। कोई व्यक्ति अगर अपनी संवेदनशीलता को पहाचान कर उसे सही स्तर पर लाना चाहे तो वह ऐसा कर सकता है, कोशिश करे कि जब लगे अतिसंवेदनशील हो रहा है तो स्यंय को निर्देश (auto suggestion) दे कि नहीं इस बात पर ध्यान नहीं देना है, ख़ुद को दूसरे कामो में व्यस्त करले।संवेदनहीन व्यक्ति अपने को निर्देश (auto suggestion) दे कि किसी को कष्ट में देखेगा तो वह उसकी मदद अवश्य करेगा, मौके से भागेगा नहीं। अपनी संवेदनशीलता को व्यक्ति पहचान सके, यह लेख लिखने का यही उद्देश्य है। अपनी संवेदनशीलता को सही स्तर पर लाना इतना सरल भी नहीं है, इसके लिये किसी मनोवैज्ञानिक की मदद ली जा सकती है। अति संवेदनशीलता अनिन्द्रा (insomnia), तनाव (stress), अवसाद (depression) व्याकुलता (anxiety)  का कारण बन सकती है।

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