लेखक परिचय

सारदा बनर्जी

सारदा बनर्जी

लेखिका कलकत्ता विश्वविद्यालय में शोध-छात्रा हैं।

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हाल-फिलहाल यह देखा जा रहा है कि टी.वी. सीरियल के साथ स्त्रियों का गहरा संपर्क बन रहा है। चाहे वह लड़की हो, युवती हो, औरत हो या बुज़ुर्ग महिला, चाहे शिक्षित हो चाहे अशिक्षित। कुछ हिन्दी टी.वी. चैनलों जैसे स्टार प्लस, ज़ी टी.वी., सोनी टी.वी., आदि के साथ ही विभिन्न क्षेत्रिय चैनलों जैसे स्टार जलसा(बंगला) आदि में आधे घंटे के अंतराल में लगातार विभिन्न सीरियलों का प्रसारण होता रहता है। स्त्रियां अपने समयानुसार अपने पसंदीदा सीरियलों को बड़े मंत्रमुद्ध भाव से देखती हैं, उसे अनुभव करती हैं, सीरियलों के विषयों को निजी बातचीत में भी शामिल करती हैं। इससे भी रोचक है कि सीरियल देखते समय वे किसी भी प्रकार का विघ्न पसंद नहीं करतीं क्योंकि इससे ज़रुरी ‘सीन’ छूट जाने की गंभीर संभावना होती है। वे सीरियलों द्वारा प्रसारित परिवार की इन विभिन्न कहानियों को देख-देखकर कभी खुश होती हैं, कभी हताश, कभी उत्तेजित। सीरियल-कर्ताओं की ना-समझी(समझदारी) भी कमाल की होती है, ठीक रोचक सीन पर आकर अचानक सीरियल उस दिन के लिए खत्म ताकि दर्शक-वर्ग अगले दिन दोगुने चाव से सीरियल की प्रतिक्षा करें और सीरियल आने पर उसे खूब उपभोग करें। ठीक ऐसा ही होता है और देखा जा रहा है कि दिन-व-दिन स्त्रियों की सीरियल-उन्मादना उत्तरोत्तर बढ़ता ही जा रहा है।

इस संदर्भ में ध्यान देने वाली बात यह है कि ये विभिन्न किस्म के प्रायोजित सीरियल स्त्री के किस रुप को प्रधानता दे रहा है? क्या सीरियल के ये स्त्री- चरित्र आधुनिक है? क्या ये स्त्री-चरित्र आम(दर्शक) स्त्रियों में आत्माभिमान की भावना का संचार करने में सक्षम है? क्या ये स्त्री-चरित्र तथाकथित सामंती मानसिकता से स्त्री को उबारने में किसी तरह सहायक है? यदि आप इन सीरियलों पर गौर करें तो इसका जवाब नेगेटिव ही होगा। यह देखा गया है कि सीरियलों में छाए रहने वाले अधिकतर स्त्री-चरित्र पिछड़ी स्त्री की इमेज को पुख्ता करने में मददगार होता है। मसलन् प्रत्येक सीरियल में सीरियल हीरोइन या तो लव या एरेंज्ड मैरेज करती हैं, फिर कहानी का पूरा ताना-बाना शादीशुदा स्त्री की समस्याओं के इर्द-गिर्द घूमता रहता है। किंतु ध्यानतलब है कि अधिकतर कहानियों में नौकरीपेशा हीरोइन का रुप सामने नहीं आता। स्वतः निर्णय लेने वाली आधुनिक स्त्री का रुप सीरियलों में काफ़ी हद तक गायब है।

इन सीरियलों ने स्त्री के ट्रैडिशनल वेशभूषा और साजसज्जा को बड़े पैमाने पर लौंच किया है।अधिकतर सीरियलों में अधेड़ उम्र की साड़ी पहनी, घूंघट डाली(सामंती) स्त्री परम पति-परायण भाव में मिलेंगी। उनके द्वारा युवा पीढ़ी (स्त्रियों) को दी जाने वाली हिदायतें पुरानी रुढ़ियों को मज़बूत करने वाला होता है। हीरोइनें भी साड़ी और मंगलसूत्र पहने, सिंदूर लगाए पति के प्रति समर्पण भाव में लीन होती हैं। वो अधिकतर घरेलू किरदार में नज़र आती है, कामकाजी नहीं। वे घर में खाना बनाती हुई पति के ऑफिस से आने का इंतज़ार करती हैं।पति के आने पर टेस्टी खाना सर्व करती हैं, भगवान से पति के प्रमोशन की हर दिन कामना करती हैं। सवाल यह है कि इक्कीसवीं सदी में जहां स्त्रियां कुछ हद तक आज़ादी का, अपनी संवैधानिक अधिकारों का उपभोग कर रही हैं, स्वच्छंद कपड़े पहन रही हैं, जागरुक और सचेत बनी हैं वहां इन ट्रैडिशनल स्त्री-इमेजों को तवज्जो देने की क्या ज़रुरत आन पड़ी? साथ ही आज की स्त्री यानि आधुनिक स्त्री के इमेज को सीरियलों में उतारने में समस्या कहां है?

किसी-किसी सीरियल में शहर की सुशिक्षित लड़की शहर के ही किसी गुंडे से या किसी ग्रामीण लड़के से प्रेम-विवाह कर लेती है।फिर उसके दुख-दर्द की अनंत गाथा से सीरियल की कहानी आगे बढ़ती है।वह लड़की अपने ग्रामीण ससुरालवालों के अनुसार अपने को ढालने की अपार मेहनत करती रहती है, चाहे ससुरालवालों का दिल जीतने के लिए उसे ‘ओल्ड-फैशन्ड’ बहू ही होकर रहना पड़े। लेकिन उसका पति कितना ही अशिक्षित हो वह ठीक नौकरी जुगाड़ कर परंपरागत पुरुष की भूमिका अदा करने लगता है और स्त्री वही परंपरागत घरेलू भूमिका। सवाल है कि इन सीरियलों में स्त्री के कामकाजी रुप को क्यों सामने नहीं लाया जाता? क्यों स्त्रियों को ही त्याग की अनंत चक्रव्यूह से गुज़रते दिखाया जाता है? कभी किसी पुरुष किरदार को स्त्रियों के लिए अनंत त्याग करते क्यों नहीं दिखाया जाता? दिलचस्प है कि दर्शक स्त्रियां सीरियल हीरोइन की इस पुंसवादी पितृसत्ताक इमेज को देख-देखकर बड़ी आनंदित होती हैं।

मिथकीय सीरियल स्त्री को अपदस्थ करने में एक कदम और आगे है।मसलन् शिव-पार्वती पर आधारित सीरियलों में पार्वती शिव-प्राप्ति के लिए कठोर तपस्या में संलग्न रहती है, व्रत करती है, अंततः अनेको जद्दोजहद के बाद शिवजी प्रसन्न होते हैं और पार्वती को पति का सम्मान व मर्यादा देते हैं। इसका स्त्रियों के दिलोदिमाग में सीधा संदेश जाता है कि यदि पति पाना है तो त्याग करो, व्रत करो चूंकि तपस्या तो आजकल संभव नहीं। स्पष्ट है कि इक्कीसवीं सदी ने जहां स्त्रियों की त्यागी मानसिकता में थोड़ा फेर-बदल किया है, वह अपने अधिकार के प्रति सजग हुई है उसे भी ये सीरियल ध्वस्त करने में लगे हैं।

सीरियलों के प्रति दर्शकों का आकर्षण खत्म न हो इसके लिए सिनेमा के मनमोहक गाने भी सीरियल के बीच-बीच में सीन के हिसाब से जोड़ दिया जाता है।इस संदर्भ में एक मज़ेदार चीज़ यह घटती है कि जिन लड़कियों को पुराने फिल्मों के गाने अपील नहीं करते, जो पुराने गानों को देखकर या सुनकर नाक-भौं सिकुड़ती हैं वे ही बड़े चाव से सीरियल की घटनाओं को पुराने गानों के साथ उपभोग करती हैं।

सीरियल का सबसे नेगेटिव इमपैक्ट लोगों की संवेदनशीलता पर पड़ा है।यह देखा जा रहा है कि सीरियलों के प्रति स्त्रियों का रुझान इतना अधिक बढ़ रहा है कि वे ज्ञानशून्य होकर इसका मज़ा लेती हैं।उन्हें वास्तविक घटनाएं उतना प्रभावित नहीं करती जितना सीरियल की घटनाएं। मसलन् यदि कहीं किसी मोहल्ले में कत्ल या बलात्कार की घटना घटी हो तो सिर्फ निर्विकार श्रोता भाव से ये सीरियल-दर्शक स्त्रियां सुनती हैं या प्रतिक्रिया देती हैं लेकिन यदि यही घटना संबंधित सीरियल के हीरो या हीरोइन या किसी पसंदीदा किरदार के साथ हुआ या होने वाला हो तो वे सारे काम छोड़कर व्याकुल भाव से अंजाम देखने की प्रतिक्षा में रहती हैं कि किस तरह कत्ल या बलात्कार होने से वह किरदार बच जाए और उसके आगे क्या-क्या हो। इससे स्पष्ट होता है कि संवेदनहीनता को बढ़ावा देने में सीरियल की कितनी अहम भूमिका है। मिथ्या-जगत और मिथ्या-माहौल के निर्माण में टी.वी. सीरियल कितना सहयोगी है।

लेकिन हकीकत है कि स्त्रियां जमकर विभिन्न सीरियलों का उपभोग कर रही हैं। उनका यह सीरियल प्रेम क्रमशः ‘मैनिया’ में बदलता जा रहा है। सीरियलों के उपरोक्त नेगेटिव प्रभावों से बेखबर स्त्रियां एक के बाद एक सीरियलों का ज़ायका लेने में मग्न हैं। सचेत बोध के अभाव में उन्हें इस मैनिया से उबारना कठिन है।

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