लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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– हरिकृष्ण निगम

प्रत्येक साहित्यप्रेमी या कथा-साहित्य के अनुरागी के लिए एक सामान्य ज्ञान का विषय है कि चाहे औपन्यासिक कृतियां हों या कहानी लेखक की कोई भी विद्या उसमें कल्पना, भावोद्वेग, चमत्कारिक मोड़ वाले घटनाक्रम, यौनाचरण, हिंसा, उन्माद, अपराध, प्रतिशोध,र् ईष्या-द्वेष और षड़यंत्र आदि का मिश्रण उसे उत्तेजक, पठनीय और रोचक बनाते हैं। यही तत्व आजकल टी.वी. जैसे जनसंचार के माध्यमों की विविध चैनलों पर दिखाए जाने वाले हिंदी धारावाहिकों के लिए भी सामान्य बात है। पर आज सामान्य जनता को सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि इन सभी सीरियलों के पास दान-पुण्य, पूजा-पाठ, व्रत व अनुष्ठान करने वाले वे धर्मनिष्ठ हिंदू हैं जो कभी घोर अंधविश्वासी, कभी पारिवारिक षड़यंत्री, हिंसा प्रतारणा और कौटुंबिक अनाचार से लिप्त भी दिखाए जाते हैं। स्त्री पात्र तो दूराव-छिपाव, परिवार के अन्य लोगों से छिपाकर अपनी कथित खोजों की पहल या अपने निजी एजेंडा को किसी नैष्ठिक आयोजन की पर्तों में इस तरह छिपाती है जो धर्म का मखौल लगता है। सामान्य व्यक्ति के पास एक स्पष्ट संकेत है कि धर्मों के लोगों के बीच हिंदू-आस्था की यह प्रस्तुति इसे धूल-धुसरित करने का प्रच्छन्न उपकरण है। यदि इन धारावाहिकों, जिनका नाम लेना अनावश्यक है, के अंतर्निहित संदेशों पर जाए तो कोई भी स्तब्ध होगा कि हिंदू आस्था का पालन करने वाले, अन्धविश्वासी, दोहरे व्यक्ति वाले, कथनी-करनी में अंतर रखने वाले, नैतिकता की घोषणाओं के पीछे जघन्य कृत्य भी कर सकते हैं। पात्रों के चरित्र अथवा आचरण के विरोधाभास किसी भी सामान्य पात्र में दिखाया जा सकता था। पर उस परिवार में यह चित्रित किया जाता है जो यज्ञ, हवन, व्रतों और कर्मकांडों में लिप्त हैं। इसके निहित उद्देश्य बहुत गहरे हैं। धार्मिक परिवारों में अवैद्य संबंधों व विकृत आचरणों की जो बाढ़ सीरियलों में दिखाई दे रही है वह एकाएक नहीं आ गई। ये सीरियलों में हमारी छिपी वासनाओं को हवा देकर सांस्कृतिक सामाजिक जीवन के संस्कार बड़ी चालाकी से छीनते हैं। धर्म, कर्मकांडों और नीति की दुहाई देने वाले या परंपराओं की बात करने वाले सीरियल ही हमारे धर्म की दूसरों की नजर में छवि विकृत कर सकते हैं – इस पर विश्वास नहीं होता है। हाल में एक पश्चिमी लेखक ने इन टी.वी. धारावाहिकों पर टिप्पणी की है कि वे स्वयं संशयग्रस्त हैं कि कहीं वे हिंदू आचरण के दोहरे धन के तो नहीं प्रतिबिंबित करते हैं। गलत सामाजिक आचरण को तर्क का जामा पहनाने के कारण मध्यवर्ग में अनगिनत परिवार धारावाहिकों की नायिकाओं का अनुकरण कर अपने व्यवहार को खतरनाक ढंग से बदल सकते हैं। यह चिंताजनक मनोवैज्ञानिक प्रभाव है। किशोरों और युवाओं पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों के हाल के एक सर्वेक्षण में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं।निष्ठावान परिवारों में भी प्रदर्शित पूजा-पाठ, व्रत आदि के साथ अपसंस्कृति के प्रभाव के कारण दुराचरण भी दाम्य हो सकते हैं। आक्रामकता, अगम्यागमन, हिंसा, स्वार्थ या संकीर्णता को ये हिंदी धारावाहिक दिखावे की धार्मिकता की चाशनी के साथ परोस रहे हैं।

अधिकांश सामाजिक धारावाहिकों से हमारी संस्कृति, परंपरा और असली धार्मिक पहचान प्रभावित हो रही है। एवं उपभोक्तावाद, हिंसा, विकृत, यौनाचरणों तथा अश्लीलताओं को बढ़ावा मिल रहा है। मनोरंजन के नाम पर एक दृश्यरतिक के स्वच्छंद आचरण के लिए इन धारावाहिकों के माध्यम से विश्वसनीयता का कवच भी मिलता है। एक समय उत्तर-आधुनिकता के समर्थक और कथित प्रगतिशील कहलाने वाला मीडिया रामायण या महाभारत के बाद सीरियलों के बाद पौराणिक कथाओं और धार्मिक सीरियलों की बाढ़ पर विषाक्त टिप्पणियां करता था। पर लगता है कि वे लोग ही अपनी रणनीति की पुनर्व्याख्या करते हुए सास-बहू या अनेक लोकप्रिय पारिवारिक सीरियलों में सांस्कृतिक घुसपैठ कर इतर धर्मों के अनुयाइयों में एक धर्मनिष्ठ हिंदू की छवि धूल-धूसरित करने में फिर लगे हैं। अब अंधविश्वासों का प्रचार, आस्था और आचरण के खुले विरोधाभास को उछालने के लिए नई रणनीति अपनाई जा रही हैं। यह धर्म और जनसंचार के इस माध्यम के व्यापार का नया गठबंधन भी हो सकता है जिसमें हिंदू-विरोधी तत्वों को ही लाभ हो सकता है (इस नए सांस्कृतिक प्रदूषण के सामने मध्यवर्गीय परिवार स्वेच्छा से पराजित हो रहे हैं। हमारी आस्था के मूल व्यवहार से अलग एक सुनियोजित शब्द-छलना विकसित किया गया है और चित्रांकित बाह्य रीति-रिवाजों के पीछे अनीति और स्वच्छंदता को स्वीकृति दी जा रही है।

* लेखक स्तंभकार हैं।

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1 Comment on "धारावाहिकों की माया"

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श्रीराम तिवारी
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जिस राश्ते पर भारत के मनोरंजन चेनल चल रहे हैं वह निरापद और जनस्वीकार्य रास्ता बनता जा रहा है Try भी कुछ खास नहींकर प् रहा है .गलाकाट प्रतिद्वंदिता के मद्दे नज़र .सार्वजनिक क्षेत्र की स्थिति भी दयनीय बनकर रह गई है .

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