लेखक परिचय

सिद्धार्थ शंकर गौतम

सिद्धार्थ शंकर गौतम

ललितपुर(उत्तरप्रदेश) में जन्‍मे सिद्धार्थजी ने स्कूली शिक्षा जामनगर (गुजरात) से प्राप्त की, ज़िन्दगी क्या है इसे पुणे (महाराष्ट्र) में जाना और जीना इंदौर/उज्जैन (मध्यप्रदेश) में सीखा। पढ़ाई-लिखाई से उन्‍हें छुटकारा मिला तो घुमक्कड़ी जीवन व्यतीत कर भारत को करीब से देखा। वर्तमान में उनका केन्‍द्र भोपाल (मध्यप्रदेश) है। पेशे से पत्रकार हैं, सो अपने आसपास जो भी घटित महसूसते हैं उसे कागज़ की कतरनों पर लेखन के माध्यम से उड़ेल देते हैं। राजनीति पसंदीदा विषय है किन्तु जब समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का भान होता है तो सामाजिक विषयों पर भी जमकर लिखते हैं। वर्तमान में दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर, हरिभूमि, पत्रिका, नवभारत, राज एक्सप्रेस, प्रदेश टुडे, राष्ट्रीय सहारा, जनसंदेश टाइम्स, डेली न्यूज़ एक्टिविस्ट, सन्मार्ग, दैनिक दबंग दुनिया, स्वदेश, आचरण (सभी समाचार पत्र), हमसमवेत, एक्सप्रेस न्यूज़ (हिंदी भाषी न्यूज़ एजेंसी) सहित कई वेबसाइटों के लिए लेखन कार्य कर रहे हैं और आज भी उन्‍हें अपनी लेखनी में धार का इंतज़ार है।

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सिद्धार्थ शंकर गौतम 

दिल्ली नगर निगम के चुनाव परिणाम जहां भारतीय जनता पार्टी के लिए काफी हद तक ख़ुशी का उत्सव लेकर आए हैं वहीं कांग्रेसी खेमे में सदमे सा माहौल पसरा है| यक़ीनन इस हार से कांग्रेस को दूरगामी परिणाम भुगतने होंगे| वह भी ऐसे मुश्किल वक्त में जबकि पार्टी कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव एवं उपचुनाव में हार का मुंह देख चुकी है| महंगाई की मार, घोटालों-घपलों का नित बनता रिकार्ड, भ्रष्टाचार, बे-बजह की बयानबाजी, गुटबाजी ऐसे न जाने कितने कारण हैं कांग्रेस की हार को परिभाषित करने के| कांग्रेस का एकीकृत दिल्ली नगर निगम को विभाजित करने का फैसला भी आत्मघाती सिद्ध हुआ है| देखा जाए तो २७२ वार्डों में से १३८ पर कमल खिला है तो ७८ पर दिल्ली वासियों ने हाथ का साथ दिया है| ५६ वार्ड निर्दलियों के खाते में गए हैं| उत्तर, दक्षिण और पूर्वी दिल्ली में विभाजित वार्डों के लिहाज से देखा जाए तो उत्तरी निगम में भाजपा को सर्वाधिक फायदा हुआ है| यहाँ भाजपा के खाते में ५९ वार्ड आए हैं तो कांग्रेस मात्र २९ पर सिमटकर रह गई है| १५ पर अन्य का कब्ज़ा हुआ है| यहाँ केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल और कृष्णा तीरथ की प्रतिष्ठा सीधे तौर पर जुडी हुई थी| मतदाताओं ने दोनों को नकार कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व को सकते में ड़ाल दिया है| सिब्बल साब के बेतुके फैसलों तथा बेवजह की बयानबाजी के कारण आम जनता में रोष है और यह बात दिल्ली निकाय चुनाव ने साफ़ कर दी है| सिब्बल को अब अपनी शैली सुधारना होगी वरना उन्हें आगे इससे भी बड़ा नुकसान हो सकता है|

पूर्वी दिल्ली में भी कमल की जीत से हाथ को तकड़ा झटका लगा है| हालांकि पिछली बार के मुकाबले इस बार भाजपा को ५ वार्डों का नुकसान हुआ है किन्तु दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के पुत्र संदीप दीक्षित एवं प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जेपी अग्रवाल के संसदीय क्षेत्र की आठ-आठ विधानसभा सीटें इस निगम में हैं| ज़ाहिर है पार्टी की हार से इनकी प्रतिष्ठा को तो झटका लगा ही है, शीला दीक्षित का भी दिल्ली की जनता का खुद के पक्ष में होने का गुमान भी चकनाचूर हो गया है| कांग्रेस (१९) के मुकाबले भाजपा को ३५ वार्डों में जीत प्राप्त हुई है जबकि १० वार्डों पर निर्दलीय काबिज़ हुए हैं| जहां तक बात दक्षिणी निगम की है तो यहाँ कांग्रेस का प्रदर्शन अपेक्षानुरूप कुछ ठीक रहा है| भाजपा को अपना महापौर बनाने हेतु ९ पार्षदों की आवश्यकता है जिसके लिए निर्दलियों से बात भी चल रही है| यहाँ भाजपा ने ४४, कांग्रेस ने ३० तथा निर्दलियों ने ३० वार्डों पर जीत का परचम फहराया है| यानी यहाँ भी भाजपा ने कांग्रेस पर बढ़त बरकरार रखी है|

दिल्ली की चकाचौंध, बेहतर कानून व्यवस्था एवं अत्याधुनिक कॉलोनियां भी दिल्ली सरकार के दावे पर जनता की मुहर नहीं लगवा सकीं| भाजपा को ज़रूर पिछले कार्यकाल की अपेक्षा कम सीटें प्राप्त हुई हैं लेकिन कांग्रेस की दुर्गति ने उसे इस गम से उबरने का मौका तो दे ही दिया है| हाँ, कांग्रेस की दुर्गति का आलम यह रहा कि अपने प्रभाव क्षेत्र के लगभग ५० वार्डों में पार्टी तीसरे या पांचवे स्थान पर पहुँच गई है| प्रत्याशियों की जमानतें ज़ब्त हो गई हैं तो जो करोडपति एवं उद्योगपति पार्षद तक बनने हेतु तैयार हो गए थे; अब हार के गम को भुलाने की कोशिश कर रहे हैं|

कांग्रेस की करारी हार के बाद से प्रदेश कांग्रेस कार्यालय पर ताला पड़ा है और कमोबेश सभी वरिष्ठ नेता अज्ञातवास में चले गए हैं| शीला दीक्षित अब भी कह रही हैं कि इस हार को ज्यादा तूल देने की ज़रूरत नहीं है| अभी विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव बाकी हैं| उनमें देख लिया जाएगा कि कौन “चूका” हुआ है| वैसे इतिहास पर नज़र डाली जाये तो कमोबेश नगर निगम चुनाव में दिल्ली की जनता कमल पर विश्वास जताती है तो विधानसभा एवं लोकसभा चुनाव में इसी जनता की प्राथमिकताएं बदल जाती हैं| हालांकि इस बार भी ऐसा ही हो यह संभव नहीं है किन्तु यह तथ्य मतदाताओं के चरित्र की ओर रेखांकित करता है कि उसे अब थोथे वादे नहीं ठोस विकास चाहिए| खैर, आगे जो हो सो हो किन्तु फिलवक्त इतना तो दावे के साथ कहा जा सकता है कि राजनीति की हवा कांग्रेस के विरुद्ध चल रही है| ऐसे में हो सकता है शीला का चौथी बार कांग्रेस को सत्ता में लाना टेढ़ी खीर साबित हो|

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