लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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नक्सलवाद पर जारी बहस में सरकार का पक्ष चाहे जो भी हो मीडिया पर्सन की हैसियत से जनता जनार्दन के समक्ष सच्चाई रखना और सरकार को जगाने का प्रयास करना निश्चित तौर पर हमारी नैतिकता का अंग है। इसी लिहाज से हम नक्सलवाद के जहर के बारे में जितनी तफ्तीश कर चुके हैं, उसे जनता और सरकार के सामने लाना हमारा फर्ज है। 1967 में आरंभ हुआ और नब्बे के दशक में तेज हुआ नक्सवाद आज देश के सत्तर फीसदी हिस्से को अपनी जद में ले चुका है। देश के मानचित्र पर अगर देखा जाए तो हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखण्ड, पश्चिम बंगाल, उडीसा, छत्तीसगढ, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, केरल और कर्नाटक इसकी चपेट में हैं। इसके अलावा अलगाववाद की अगर बात की जाए तो उसम, मणिपुर, नागालैंड, त्रिपुरा, मेघालय और मिजोरम इसकी जद में हैं। वामपंथ उग्रवाद, उत्तर पूर्वी अलगाववाद और जम्मू काश्मीर की आंतरिक समस्या सरकार की पेशानी पर पसीने की बूंदे छलका रही है।

देश भर में लगभग 22 हजार केडर में फैले ये नक्सलवादी और माओवादी संगठन देश की जडों में मठा डालने का ही प्रयास कर रहे हैं। झारखण्ड पर अगर नजर डाली जाए तो समूचा झारखण्ड माओवादियों की बर्बरता की चपेट में है। झारखण्ड के 16 जिले माओवादी गतिविधियों का केंद्र बन चुके हैं। यहां प्रमुख तौर पर छ: संगठन सक्रिय हैं। इसमें तृतिया प्रस्तुति कमेटी, सीपीआई (माओवाद), संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा, द पिपुल्स लिब्रेशन फ्रंट ऑफ इंडिया, झारखण्ड प्रस्तुति समिति और झारखण्ड जनसंघर्ष मुक्ति मोर्चा प्रमुख हैं।

2001 में संयुक्त मध्यप्रदेश से प्रथक होकर अस्तित्व में आए छत्तीसगढ को नक्सलवादियों ने अपना गढ बनाया हुआ है। दरअसल संयुक्त मध्य प्रदेश में राजधानी भोपाल से बस्तर तक सडक मार्ग से पहुंचने में तीन दिन लग जाते थे, तो सरकारी इमदाद किस कदर यहां बटती होगी इस बात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। जनता को सरकारी नुमाईंदो द्वारा प्रताडित किए जाने का लाभ यहां सबसे अधिक नक्सलियों ने उठाया है। पिछले तीस सालों में खनिज संपदा के धनी और धान का कटोरा कहे जाने वाले इस सूबे की नक्सलवादियों ने आर्थिक रीढ तोड कर रख दी है। आज आलम यह है कि प्रदेश के लगभग एक दर्जन जिलों के दो सौ से अधिक पुलिस थानों में नक्सली आतंक पसरा हुआ है। सूबे के बस्तर, दंतेवाडा, कांकेर, बलरामपुर, सरगुजा, कवर्धा आदि जिलों में नक्सलवादियों की जडें बहुत हद तक मजबूत हो चुकी हैं।

इसी तरह मध्य प्रदेश में बालाघाट, मण्डला और डिंडोरी जिलों में जब तब नक्सली पदचाप सुनाई दे जाती है। इसके अलावा अब सिवनी, छिंदवाडा, जबलपुर, शहडोल, बैतूल, रीवा, सतना, सीधी आदि जिलों को भी नक्सलवादियों ने अपने निशाने पर ले लिया है। बालाघाट जिले में प्रदेश के पूर्व परिवहन मंत्री लिखी राम कांवरे को उनके मंत्री रहते हुए उन्ही के घर पर नक्सलियों ने गला रेतकर मार डाला था। इसके अलावा और भी अनेक वारदातें नक्सलवादियों ने यहां की हैं।

उडीसा सूबे में भुखमरी को नक्सलवादियों ने अपना प्रमुख हथियार बनाया है। आज समूचा उडीसा लाल रंग में रंग चुका है। सूबे के 17 जिलों में नक्सल और माओवादियों का कहर व्याप्त है। मलकानगिरी, कोरापुट, रायगढ, गजपति जिलों में माओवादियों की पकड देखते ही बनती है। साथ ही कंधमाल में इनका नेटवर्क बहुत ही जबर्दस्त है। पश्चिमी उडीसा के सुंदरगढ, देवगढ, संभलपुर, बांध और अंगुल में नक्लवादियों ने अपनी सरकार चला रखी है। कहा जा सकता है कि समूचा उडीसा नक्सलवाद और माओवाद से बुरी तरह ग्रस्त है।

महाराष्ट्र के अनेक जिलों में ये कहर बरपा रहे हैं। सूबे का गढचिरौली इनका गढ है। इसके अलावा इनकी सल्तनत चंद्रपुर, गोंदिया, भंडारा, नांदेड, नागपुर, यवतमाल के साथ ही साथ मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और आंध्र प्रदेश की सीमा से सटे गांवों में फैली हुई है। महाराष्ट्र में आए दिन नक्सलवादी गतिविधियों की खबरें आना आम बात हो गई। विशेषकर विदर्भ के अनेक इलाकों में इनका फैलाव देखकर लगता है कि आने वाले समय में ये समूचे महाराष्ट्र को अपने कब्जे में ले सकते हैं।

रही बात बिहार की तो बिहार में नक्सलवाद और माओवाद ने अपना घर बनाकर रखा हुआ है। यहां लगभग 20 जिलों में नक्सलवाद का प्रभाव अच्छा खासा माना जा सकता है। पटना, गया, औरंगाबाद, अरवल, भभुआ, रोहतास, जहानाबाद, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चंपारण, शिवहर, सीतामढी, मधुबनी, दरभंगा, मुजफ्फरपुर, बेगुनसराय, वैशाल, सहरसा और उत्तर प्रदेश के सटे जिलों में नक्सलवाद की गूंज सुनाई देती है।

आंध्र प्रदेश के दण्डकारण्य क्षेत्र में इनका खतरा बना हुआ है। सूबे के विशाखापट्टनम, खम्माम, विजयानगरम, पूर्वी गोदावरी आदि जिलों में इनका नेटवर्क बहुत ही मजबूत है। आंध्र प्रदेश के 93 झारखण्ड के 85, छत्तीसगढ के 81, , बिहार के 34, उडीसा के 22, महाराष्ट्र के 14, पश्चिम बंगाल के 12, उत्तर प्रदेश के 7, कर्नाटक के 6, मध्य प्रदेश के 4, केरल और हरियाणा के दो दो थाने इसकी चपेट में हैं। इस तरह देश के लगभग चार सौ थाने इसकी जद में हैं।

वामपंथी उग्रवाद के मामले में अगर देखा जाए तो 2004 से 2008 तक 842 सुरक्षा बल के जवान, 1375 आम नागरिकों के साथ 990 नक्सली मारे गए थे। इसी तरह उत्तर पूवी्र अलगाव वाद में 335 सुरक्षा बल के जवान, 1614 आम नागरिक, 4079 आतंकवादी या तो पकडे गए या फिर पकडे गए। 703 सुरक्षा बल, 2011 आम नागरिक और 2844 आतंकवादी मारे गए। उत्तर पूवी अलगाव वाद की आग में असम, मणिपुर, नागालेण्ड, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम आदि बुरी तरह झुलस गए हैं।

असम चूंकि बंग्लादेश और भूटान की सीमा से सटा हुआ है, अत: यहां अलगाववाद की बयार बारह माह चौबीसों घंटे बहती रहती है। सालों से यह सूबा हिंसा का दंश झेल रहा है। इस प्रदेश में उल्फा, एनडीएफबी जैसे अलगाव वादी संगठन फल फूल रहे हैं। मणिपुर में पीएलए, यूएनएलएफ, पीआरईपीएके, तो नागालेण्ड में एनएससीएन, आईएम, एनएससीएम, त्रिपुरा में एनएलएफटी, एटीटीएफ, मेघालय में एएनवीसी, एचएनएलसी, और मिजोरम में एचपीसी (डी), बीएनएलएफ पूरी तरह सक्रिय नजर आ रहे हैं।

(क्रमश: जारी)

-लिमटी खरे

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