लेखक परिचय

जयराम 'विप्लव'

जयराम 'विप्लव'

स्वतंत्र उड़ने की चाह, परिवर्तन जीवन का सार, आत्मविश्वास से जीत.... पत्रकारिता पेशा नहीं धर्म है जिनका. यहाँ आने का मकसद केवल सच को कहना, सच चाहे कितना कड़वा क्यूँ न हो ? फिलवक्त, अध्ययन, लेखन और आन्दोलन का कार्य कर रहे हैं ......... http://www.janokti.com/

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हम जीवन के मूल तत्व ‘ काम ‘ अर्थात ‘सेक्स’ के ऊपर विभिन्न विचारकों और अपने विचार को आपके समक्ष रखेंगे . काम का जीवन में क्या उपयोगिता है  ? सेक्स जिसे हमने बेहद जटिल ,रहस्यमयी ,घृणात्मक बना रखा है उसकी बात करने से हuniverse/ में घबराहट क्यों होती है ? क्यों हमारा मन  सेक्स में चौबीस घंटे लिप्त रहने के बाद भी उससे बचने का दिखावा करता है ? अब आप कहेंगे कि आजकल जमाना बदल रहा है , यौन शिक्षा का चलन शुरू हुआ है परन्तु यह जो यौन शिक्षा दी जा रही है क्या वह सही है ? क्या केवल सेक्स कैसे करना चाहिए , यौन रोगों से कैसे बचा जा सकता है , स्त्री-पुरुष के यौनांगों की जानकारी देने भर से सेक्स को समझा जा सकता है ? नहीं , कदापि नहीं . सेक्स या काम इतना सरल और सतही नहीं है .

ओशो कहते हैं ” सेक्स प्रेम की सारी यात्रा का प्राथमिक बिंदु  है और प्रेम परमात्मा तक पहुँचने की सीढी है . ” सेक्स को ,काम को,वासना को मानव समाज ने पाप का नाम देकर विरोध किया है . इस विरोध ने,मनुष्य की अंतरात्मा में निहित प्रेम के बीज को अंकुर बनने से पूर्व ही रोक दिया , प्रेम के प्रस्फुटन की संभावनाएं तोड़ दी , नष्ट कर दी .
संसार की समस्त सभ्यता- संस्कृतियों ,धर्मों , गुरुओं और महात्माओं ने काम को यानि प्रेम के उत्पत्तिस्थल पर चोट किया है . मानव समाज की इस भूल के  कारण से सेक्स एक संकीर्णता के रूप में  देखा जाने लगा  है . सेक्स से खुद को दूर करने की बाह्य  कोशिश में आदमी पल-पल “सेक्स”  की हीं सोच  में खोया  रहता  है . आज के इस उपभोक्तावादी  संसार में सेक्स की भोग वाली छवि  को बदलने  की जरुरत है . सेक्स को अध्यात्म में घोलकर दुनिया के सामने एक नए रूप में पेश किये जाने आवश्यकता  है .

सेक्स की ऊर्जा  को प्रेम में परिवर्तित  करने हेतु  सबसे पहले सेक्स के सही स्वरुप और उसकी उपयोगिता को गहरे  से समझना होगा . यहाँ आगे अपनी  चर्चा  में इन तमाम  पहलुओं  पर प्रकाश  डालेंगे .

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11 Comments on "सेक्स चर्चा (भाग -3)"

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प्रेम सिल्ही
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प्रेम सिल्ही
प्रवक्ता डॉट कॉम पर सेक्स चर्चा देख मैं उत्सुकता स्वरूप इस लेख की ओर खिचता ही चला गया| न्यू-यार्क में अभी प्रात: हुई है और मेरे पास कई काम करने को हैं| समय की मर्यादा को भंग कर मैं अपने विचार लिखने बैठ गया हूं| ओर दुसरे सभी काम धरे के धरे रह गए हैं| जीवन में इस अकस्मिक अव्यवस्था को देख मानो मैनें आज के बदलते ज़माने में योन-शास्त्र के रहस्य को जान लिया है| भारतीय चल-चित्र व धारावाहिक रूपक के प्रसारण द्वारा प्रारंभिक काम-शास्त्र का ज्ञान घर घर में छोटे बड़े सभी को प्रयाप्त मात्रा में मिल जाता… Read more »
vibha rani
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sunil patel
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जयराम जी ने ठीक कहा कि क्यों आज हमारा मन चोबीसों घण्टे सैक्स में लिप्त रहने के बाद भी उससे बचने का दिखावा करता है। यह ठीक है कि प्रत्येक व्यक्ति के मन मे चंचल प्रवृत्ति रहती है किन्तु हमारे संस्कार हमारे मन को बांध कर रखते हैं और हम उस गलत आदतों से बचते रहते हैं। आज की शिक्षा, पाढाई, टीवी, धारावाहिक, पहनावा, खानपान, सामाजिक माहौल हमारे चंचल मन को बांध कर नहीं रख पाता है और मन उस काम प्रवृत्ति की और खिंचा चला जाता है। आज हमारी शिक्षा में, हमारे जीवन में आध्यात्मिक पहलू, संस्कारों की शिक्षा,… Read more »
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