लेखक परिचय

शादाब जाफर 'शादाब'

शादाब जाफर 'शादाब'

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार हैं।

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शादाब जफर ‘‘शादाब’’

’’मेरे पिया गए रंगून’’, ’’कजरा मुहब्बत वाला’’ जैसे कई लोकप्रिय गीतों की आवाज़ अब नही रही। शमशाद बेगम का मुंबई में निधन हो गया है।

भारतीय सिनेमा को ’’मेरे पिया गए रंगून’’ और ’’कजरा मुहब्बत वाला’’ जैसे अमर गीतो की बेगम खनकती आवाज की मलिका, ओपी नय्यर जैसे संगीतकार की पहली पसंद, लाखो करोडो दिलो पर राज करने वाली आवाज अतीत के प्रति मोह, जमाने के लिए शिकवे, चकरा देने वाला मूड, सभी के लिए फिक्र, और सबसे बढ़कर बिलकुल अलग अंदाजे बयां चूडी की तरह खनकती वो खामोश हो गई है। लंबे समय से गुमनामी में जी रहीं गायिका शमशाद बेगम के निधन ने दुनिया भर में उनके चाहने वालो को रूला दिया। 94 वर्ष की शमशाद बेगम लंबे समय से बीमार चल रही थीं। उन्होंने यहां पवई स्थित अपनी बेटी के घर में अंतिम सांस ली। आजादी के पहले 1943 में ही उनकी आवाज का जादू पंजाब से निकल कर मुंबई आ पहुंचा था। तभी तो महबूब ने उन्हें मिन्नतों से मुंबई बुलाया था और ’’तकदीर’’ (1943) के आठ गाने गवाए थे। आज के श्रोताओं को अनुमान नहीं होगा, किंतु यह सत्य है कि शमशाद बेगम ने 500 से ज्यादा फिल्मों में गाने गाए। उनकी गायकी ने हमेशा श्रोताओं को सुकून दिया। ओ पी नैयर ने ताउम्र लता मंगेश्कर की आवाज़ नहीं ली. उन्होंने शमशाद जी को ही अपने गीतों के लिए चुना। वो एक बार कह भी चुके हैं कि ’’मैं जो हूं वो शमशाद के कारण हूं।’’

शमशाद बेगम का जन्म पंजाब के अमृतसर शहर में 14 अप्रैल 1919 को हुआ था. षुरुआती दिनों में उन्होंने पेशावर रेडियो में काम किया था। गुरु की नगरी अमृतसर में टेलीफोन एक्सचेंज के निकट स्थित एक मुस्लिम मोहल्ले में पैदा हुईं शमशाद बेगम ’’बूझ मेरा क्या नाम रे’’ गाने की तरह बेगानी हो गई थीं। देश विभाजन के बाद शमशाद बेगम के परिवार का नाता गुरु नगरी के लोगों से टूट गया था। उनकी आवाज का जादू जब बॉलीवुड में चला तो वह भी अपने उन मुरीदों को भूल गईं, जो उनकी गजल व गाने सुनने टेलीफोन एक्सचेंज में स्थित ’’व्हाइट हाउस’’ में आया करते थे। शमशाद बेगम का परिवार व्हाइट हाउस में रहता था। उस समय इस घर के बाहर सफेद रंग की टाइलें लगी हुई थीं, जिस कारण उसे व्हाइट हाउस कहते थे। आसपास मुस्लिम परिवारों के लोग छोटे-मोटे कामकाज किया करते थे। उसके बाद उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी गीत गाए. कहा जाता है कि रेडियो पर उनकी आवाज़ सुनकर ही कई संगीत निर्देशकों ने उनसे संपर्क किया। उनकी समकालीन गायिकाएं गीता दत्त और लता मंगेश्कर से शमशाद की आवाज़ ख़ासी जुदा थी.

दिग्गज संगीत निर्देशक गुलाम हैदर को शमशाद की आवाज में झरने की गति और सहजता दिखती थी तो ओपी नैयर को उनकी आवाज मंदिर की घंटी से निकली गूंज की तरह लगती थी। कुंदन लाल सहगल से प्रभावित शमशाद की आवाज पतली नहीं थी। वह खुले गले से गाती थीं। किशोर उम्र के चुलबुले कंपन से गाए उनके गीत कानों में अठखेलियां करते थे। आजादी के पहले की वह अकेली आवाज थीं, जो लता मंगेशकर की गायकी का साम्राज्य स्थापित होने पर भी श्रोताओं के दिलो पर शमशाद बेगम का राज चलता था। भारतीय सिनेमा में लंबे समय तक सादगी पसंद शमशाद बेगम की आवाज ही उनकी पहचान बनी रही। फिल्म इंडस्ट्री के बाहर उन्हें कोई जानता-पहचानता नहीं था। दरअसल, गायकी में कदम रखने के साथ उन्होंने अपने पिता से वादा किया था कि वह कैमरे के सामने कभी नहीं आएंगी। तब गायिकाओं को नायिकाओं के रूप में फिल्में मिलती थीं। उनके पिता नहीं चाहते थे कि वह अभिनय करें। पिता की बात रखते हुए वह लंबे समय तक न तो फिल्मी कैमरे के सामने आई और न स्टिल कैमरे के। बीती सदी के आठवें दशक के अंत में संभवतरू पिता के निधन के बाद उन्होंने तस्वीरें खींचने की अनुमति दी। तब उनके प्रशंसकों ने उन्हें पहचाना।

शमशाद बेगम की आवाज को लेकर सैकड़ों किंवदंतियां और हजारों किस्से मशहूर हैं। शमशाद के इसी अंदाजे बयां की करामात थी कि जब लता मंगेशकर और आशा भोसले सरीखी गायिकाएं सिनेमा जगत में नई ताकत के रूप में उभर रही थीं, बेगम का जलवा न सिर्फ कायम रहा, बल्कि बढ़ता रहा। हिंदी फिल्मों के कई सुपरहिट गाने उनके नाम दर्ज हैं जिन्हें आज के दौर में रिमिक्स भी किया गयो है। 40 और 50 के दशक में शमशाद बेग़म के गाए गाने रेडियो पर छाए रहते थे. जैसे ’’सी.आई.डी’’ फिल्म का ’’लेके पहला पहला प्यार’’ और ’’कहीं पे निगाह’’, इसके अलावा ’’पतंगा’’ का ’’मेरे पिया रंगून’’ तो आज भी कई मोबाइल फोन की प्लेलिस्ट में मिल जाएगा।’’बहार’’ फिल्म से ’’सैंया दिल में आना रे’’ और ’’किस्मत’’ से ’’कजरा मोहब्बत वाला’’ जिसे उन्होंने हीरोइन बबीता के लिए नहीं बल्कि फिल्म के हीरो बिस्वजीत के लिए गाया था।

शमशाद बेगम अपनी आवाज को किसी भी रूप में ढाल सकती थीं। इसके लिए बचपन से उनका गहरा रियाज जिम्मेदार था। 10 साल की उम्र से वे धार्मिक समारोहों और पारिवारिक शादियों में लोकगीत गाने लगी थीं। रिटायरमेंट के दसियों साल बाद भी आज जब हम उनके रीमिक्स सुनकर उनकी प्रतिभा को दाद देते हैं तो हमें इस बात को भुलाना नहीं चाहिए कि पश्चिमी संगीत से प्रभावित बॉलीवुड का प्रथम गाना ’’आना मेरी जान संडे के संडे’’ उन्हीं की देन है। पर एक से एक मॉड गीतों को अपनी आवाज देने वाली शमशाद ने प्रसिद्धि की बुलंदियों को छूने के बावजूद खुद को सुर्खियों से दूर, फिल्म जगत की चकाचौंध से आखिर तक दूर रखा। आखिरकार वे चुपचाप रुखसत भी हो लीं। पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ शमशाद की बीमारी के बारे में सिर्फ चंद लोग ही जान पाए। जीवनसाथी गनपत लाल बट्टो के 1955 में गुजर जाने के बाद से वे पवई में अपनी बेटी और दामाद योग रत्रा के साथ रह रही थीं। जिस बॉलिवुड पर उन्होंने कभी राज किया था उसकी जमीन पर उठे उनके जनाजे में नजदीक के कुछ मित्रों को छोड़कर कोई मौजूद नहीं था।

2009 में शमशाद बेगम को भारत सरकार द्वारा पद्म भूषण पुरस्कार से नवाज़ा गया था। उनके द्वारा गये उनके मशहूर गीत ’’आना मेरी जान, मेरे पिया गये रंगून, छोड बाबुल का घर, नैनो रख लू, सैय्या दिल में आना रे, कभी आर कभी पार ,रेशमीसलवार कुर्ता, कही पे निगाहे कही पे निशाना, लेके पहला पहला प्यार, होली आई रे कन्हाई, ओ गाडी वाले गाडी धीरे हांक रे, तेरी महफिल किस्मत इाजमाके हम भी देखेगे, कजरा मौहब्बत वाला आदि उन्हे रहती दुनिया तक संगीत प्रेमियो के दिलो में जिंदा रखेगे।

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