लेखक परिचय

प्रवीण दुबे

प्रवीण दुबे

विगत 22 वर्षाे से पत्रकारिता में सर्किय हैं। आपके राष्ट्रीय-अंतराष्ट्रीय विषयों पर 500 से अधिक आलेखों का प्रकाशन हो चुका है। राष्ट्रवादी सोच और विचार से प्रेरित श्री प्रवीण दुबे की पत्रकारिता का शुभांरम दैनिक स्वदेश ग्वालियर से 1994 में हुआ। वर्तमान में आप स्वदेश ग्वालियर के कार्यकारी संपादक है, आपके द्वारा अमृत-अटल, श्रीकांत जोशी पर आधारित संग्रह - एक ध्येय निष्ठ जीवन, ग्वालियर की बलिदान गाथा, उत्तिष्ठ जाग्रत सहित एक दर्जन के लगभग पत्र- पत्रिकाओं का संपादन किया है।

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shaury diwasप्रवीण दुबे छह दिसंबर 1992 का दिन, विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल इस दिन को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं। तमाम मुस्लिम संगठनों ने इसे यौमेगम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा की है। यह शौर्य का दिन था या यौमेगम अथवा मातम का इस पर अलग-अलग मत हो सकते हैं लेकिन इतना तो तय है कि छह दिसंबर का दिन बहुत कुछ संदेश देता है। इस दिन सच्चे मन से यह चिंतन करने की आवश्यकता है कि आखिर इस देश का पहचान किससे है। भगवान राम से या मुगल आक्रांता बाबर से। इस दिन यह भी विचार करने की जरुरत है कि भगवान राम के देश मे एक विदेशी आक्रांता के नाम पर धार्मिक उन्माद फैलाने की आवश्यकता क्यों? यह भी विचार करने की बात है कि यदि हिन्दू छह दिसंबर को एक विवादित ढांचे के विध्वंस की घटना को शौर्य दिवस के रूप में मनाते हैं तो इसी देश में रहने वाले एक वर्ग विशेष के लोगों की पेट में मरोड़ क्यों उठती है? इसके प्रतिउत्तर में वे इसे मातम का दिन अथवा यौमेगम दिवस के रूप में मनाने की घोषणा क्यों करते हैं? यह ऐसे सवाल हैं जिन पर यदि बारीकी से चिंतन किया जाए तो स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है और एक ऐसा कड़वा सच सामने आता है जो बेहद कष्टकारक है। पहला सवाल जो हमने उठाया वह है इस देश की पहचान भगवान राम से है या मुगल आक्रांता बाबर से? इस सवाल का विश्लेषण करने से पूर्व सबसे पहले इस देश के उन तथाकथित समाचार चैनलो, बुद्धिजीवियों और मीडिया घरानों से जुड़े लोगों से यह पूछना चाहता हूं कि आखिर इस सवाल पर अभी तक किसी भी बहस को अंजाम क्यों नहीं दिया गया? क्यों किसी भी समाचार चैनल ने इस पर मीडिया सर्वेक्षण नहीं किया? छह दिसंबर 1992 से अभी तक 22 वर्ष का लंबा अंतराल गुजर चुका है। लेकिन यह देश आज तक निर्विवाद रूप से यह तय नहीं कर सका कि हिन्दू हो या मुसलमान अथवा चाहे अन्य कोई भी धर्मावलंबी सभी के लिए भगवान राम राष्ट्र पुरुष हैं। कैसी अफसोस की बात है जब मोदी सरकार की एक मंत्री साध्वी निरंजन ज्योति यह कहती हैं कि ‘इस देश के मुसलमान और ईसाई सभी राम की संतान हैं और जो इस बात को नहीं मानेंगे वो इस देश को भी नहीं मानेंगे।Ó तो देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों के पेट में मरोड़ क्यों उठने लगती है? क्यों इस बयान पर बावेला खड़ा हो जाता है? यह बात उन्हीं लोगों को नहीं पच रही जो भगवान राम को राष्ट्र पुरुष नहीं मानते। आखिर इसमें समस्या क्यों? उत्तर स्पष्ट है यह वही लोग हैं जो इस देश के बहुसंख्यक हिन्दू समाज को, उसके आराध्यों, आराधना स्थलों को, उसकी परम्पराओं को, उसकी संस्कृति को नीचा दिखाने में अपनी शान समझते हैं। ऐसे  ही लोगों की दृष्टि में मुगल आक्रांता के नाम पर बना विवादित ढांचा पूज्य है और इस देश की आत्मा, रग-रग में बसने वाले भगवान राम कुछ भी नहीं। यह वही मानसिकता है जिसे लेकर बाबर, गजनी, गौरी, औरंगजेब जैसे मुगलिया लुटेरे भारत में आए और उन्होंने भारत के करोड़ों-करोड़ हिन्दुओं के आराध्य स्थलों, अयोध्या, मथुरा, काशी को निशाना बनाया। वहां खड़े धर्म स्थलों को तोड़ा, लूटा और अपने नाम से विवादित ढांचा खड़ा कर गए। यदि छह दिसंबर 1992 को लाखों कारसेवकों ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए सैकड़ों वर्ष पुराने विवादित ढांचे को ढहा दिया तो इसे शौर्य न कहा जाए तो क्या कहें? न्यायालय भी उस स्थल को भगवान राम का जन्म स्थान मान चुका है। अत: साफ है राम भक्तों का गुस्सा जायज था। उन्होंने जो कुछ किया वह उसके लिए कतई दोषी नहीं ठहराए जा सकते। अच्छा तो यह होता कि जो लोग 22 वर्षों से विवादित ढांचे के विध्वंस पर विधवा विलाप कर रहे हंै, वहां पुन: बाबर के नाम पर निर्माण की मांग कर रहे हैं। न्यायालय के फैसले के बाद स्वयं आगे आकर यह स्थल हिन्दुओं को सौंप देते। साथ ही इस मामले का पटाक्षेप करते। लेकिन ऐसा करना तो दूर उस दिन पर विरोध प्रदर्शन करना, मातम या यौमेगम दिवस मनाने की घोषणा करना साफ यह संकेत है कि एक वर्ग विशेष इस मामले का शांतिपूर्ण समाधान नहीं चाहता है। इसे इस देश की विडंबना ही कहा जाना चाहिए कि विवादित ढांचे को ढहाए जाने के बाद 22 वर्ष का लंबा अंतराल गुजर चुका है। लेकिन भगवान रामलला आज भी टाट के एक अस्थाई मंदिर में चबूतरे पर विराज मान हैं। धन्य है इस देश के हिन्दू यदि और कोई दूसरा राष्ट्र होता तथा उसके मूल निवासियों के पूज्य आराध्य के साथ यह स्थिति होती तो कल्पना की जा सकती है वहां का क्या हाल होता जरा याद कीजिए तस्लीमा नसरीन, सलमान रुश्दी और एक धर्म विशेष के आराध्य का कार्टून बनाने वाले मीडिया कर्मी को। इन सबको पूरी दुनिया में भागने के लिए स्थान तक नहीं मिला क्योंकि इन्होंने इस्लाम के खिलाफ टिप्पणी की थी। आज देश में व्यवस्था परिवर्तन हो चुका है। दिल्ली की सत्ता पर हिन्दू हितों की हितैषी सरकार सत्तासीन है। भाजपा पूर्व से ही अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण की पक्षधर रही है।  अत: स्थतियां पूर्णत: अनुकूल हैं। जरुरत इस बात की है कि इस दिशा में सार्थक कदम उठाया जाए। सबसे अच्छा तो यह होगा कि अयोध्या में भव्य राममंदिर निर्माण के लिए सभी सांसदों की सहमति बनाकर कानून पारित किया जाए यह कार्य भाजपा और केन्द्र सरकार को जल्द से जल्द करना चाहिए। वह समय आ गया है जब 22 वर्षों से टाट में विराजे हमारे राष्ट्र पुरुष भगवान राम को उनके गौरव के अनुरूप भव्य राममंदिर में स्थापित किया जाए। इसके लिए छह दिसंबर 1992 की तरह एक और शौर्य दिखाने की आवश्यकता है।

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1 Comment on "शौर्य दिवस पर विधवा विलाप क्यों?"

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Anil Gupta
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जो राम को नहीं मानते हैं वो कोहराम मचाते हैं.अतः ये कहना उचित होगा कि ” ये चुनाव करना होगा कि रामज़ादों कि सरकार बने या कोहरामज़ादों की?

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