लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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mदेश की संसद व विधानसभाओं में महिलाओं की 33 प्रतिशत् भागीदारी सुनिश्चित करने हेतु भारतीय राजनीति में इन दिनों जबरदस्त खींचतान चल रही है। नि:संदेह भरतीय महिलाओं में इस ख़बर को लेकर कांफी उत्साह देखा जा रहा है कि संभवत: भविष्य में देश की संसद व विधानसभाएं 33 प्रतिशत महिलाओं से सुशोभित होंगी। परंतु जब बिना महिला आरक्षण के ही राजनीति में अपना अहम स्थान बना चुकी बहन मायावती के राजनैतिक तौर-तरीकों पर नजर डालते हैं तब हमें यह सोचने के लिए बाध्य होना पड़ता है कि यदि ख़ुदा न ख्वासता देश की सभी 33 प्रतिशत् महिला नेत्रियां मायावती को ही अपना आदर्श मानने लगीं तो ऐसे में देश की जनता की उस सोच तथा भावनाओं का क्या होगा जिसके तहत तथा जिसे मद्देनज़र रखकर महिलाओं को संसद तथा विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने की बात की जा रही है।

बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक काशीराम ने संभवत: बड़ी दूरदृष्टि के साथ भारतीय समाज के समक्ष एक जातिगत् समीकरण पेश करते हुए देश के मतदाताओं को यह बताने की पुरजोर कोशिश की थी कि देश के 85 प्रतिशत मतदाताओं के बलबूते पर शेष 15 प्रतिशत लोग अर्थात् कथित उच्च जाति के लोग राज करते हैं। 15 प्रतिशत का अर्थ ठाकुर, पंडित और बनिया समाज था। इस जातिवादी समीकरण ने आज बहुजन समाज पार्टी को निश्चित रूप से देश की एक ऐसी राजनैतिक शक्ति के रूप में स्थापित कर दिया है जोकि आज देश के सबसे बड़े राय उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत की अपनी सरकार चला रही है। काशीराम तो आज इस दुनिया में नहीं रहे। परंतु उनकी राजनैतिक उत्तराधिकारी के रूप में मायावती कथित रूप से उसी मिशन को अपने अनोखे अंदाज के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास कर रही हैं। जहां काशीराम ने बहुजन समाज पार्टी को एक जातिगत समीकरण पर आधारित राजनैतिक दल के रूप में स्थापित करने की कोशिश की थी वहीं बार-बार विवादों में घिरती जा रही मायावती ने तो गोया नकारात्मक राजनीति करने का पूरा जिम्मा ही अपने सिर उठा लिया है।

हालांकि मायावती भी बातें तो दलित सम्मान की ही करती हैं परंतु रचनात्मक रूप में वे दलित सम्मान के बजाए ‘माया’ सम्मान की ओर अधिक आकर्षित होती दिखाई देती हैं। मायावती की विवादपूर्ण राजनीति की शुरुआत तो दरअसल काशीराम की मृत्यु से पहले ही उसी समय शुरु हो गई थी जबकि काशीराम के परिवार वालों ने मायावती पर काशीराम का अपहरण कर उन्हें अपने परिवार वालों से अलग व गुप्त रखने का आरोप लगाया था। काशीराम के परिजनों का आरोप है कि मायावती स्वयंभू रूप से काशीराम की राजनैतिक वारिस बन बैठी हैं। इस संबंध में और भी कई आरोप काशी राम के परिवार वालों द्वारा मायावती पर लगाए जा चुके हैं। परंतु मायावती इन सब आरोपों की परवाह किए बिना ‘मस्त हाथी’ की तरह अपने विशेष अंदाज में राजनीति किए जा रही हैं। वह बख़ूबी जानती हैं कि कब उन्हें उच्च जाति के लोगों को गालियां देनी हैं और कब उन्हें पुचकारना और गले लगाना है। राजनीति में ऐसे लोगों की भी कोई कमी नहीं है जो पिछलग्गू नेता की तरह मायावती की हां में हां सिंर्फ इसलिए मिलाते हैं ताकि मायावती के दलित मंथन अथवा ‘ब्रह्मा,विष्णु, महेश’ के नए समीकरण से जो भी ‘अमृत की बूंद’ छलके उसका शायद कुछ हिस्सा इन पिछलग्गूओं को भी हासिल हो जाए।

मायावती स्वयं भी इस बात को बेहतर तरीके से समझती हैं तभी वह कभी स्वयं को ‘जिंदा देवी’ घोषित कर देती हैं तथा यह भी कह जाती हैं कि मंदिरों में देवी-देवताओं पर पैसे चढ़ाने के बजाए मुझ जैसी ‘जिंदा देवी’ पर पैसे चढ़ाओ। दलित सम्मान के लिए संघर्ष करना निश्चित रूप से बहुत ही सकारात्मक सोच है। परंतु बड़े अंफसोस की बात है कि मायावती के राज में आज भी उत्तर प्रदेश में दलितों के साथ वही सब कुछ हो रहा है जो बहुजन समाज पार्टी के अस्तित्व में आने से पूर्व हुआ करता था। हां दलित सम्मान के नाम पर यदि कुछ हुआ है तो वह यह कि देश के इतिहास में पहली बार मायावती जैसी किसी नेत्री द्वारा अपने जीते जी अपनी आदम क़द पत्थर की मूर्तियां बनवाई गईं। अपनी पार्टी के चुनाव निशान, हाथी के सैकड़ों पत्थर के बुत विभिन्न पार्कों में स्थापित कराए गए। क्या इस प्रकार के खर्चीले पार्टी प्रतीक पार्कों में स्थापित करने मात्र से दलित समाज ऊंचा उठ सकेगा या यह पार्टी का प्रचार सरकारी धन से करने की एक साािश मात्र है? मायावती का ‘माया प्रेम’ भी काशीराम की मृत्यु के बाद कांफी चर्चा में है। बहुजन समाज पार्टी के लोकसभा व विधानसभाओं के कई बी एस पी के ईमानदार प्रत्याशी उन पर पैसा मांगने का आरोप लगाते हुए पार्टी तक छोड़ चुके हैं। कई नेताओं ने सार्वजनिक रूप से यह ख़ुलासा किया है कि बी एस पी में मायावती उन्हें टिकट देती है जो उन्हें मुंह मांगा पैसा देता है।

गत् कई वर्षों तक मायावती ने अपने जन्मदिन के बहाने पार्टीजनों से मोटी रंकम वसूलने का एक नियम सा बना रखा था। आरोप है कि उनके जन्मदिन के ऐसे ही एक अवसर पर धन उगाही के चलते बी एस पी के एक बाहुबली विधायक शेखर तिवारी द्वारा धन वसूलने के चक्कर में मनोज गुप्ता नामक एक ईमानदार इंजीनियर की हत्या तक कर दी गई। इस घटना के बाद मायावती की ओर से यह घोषणा की गई कि अब वह अपने जन्मदिन पर कोई उपहार स्वीकार नहीं करेंगी। परंतु मायावती का माया से दूर रहने का यह अस्थाई ‘संकल्प’ अधिक समय तक कायम न रह सका। आख़िरकार पार्टी की स्थापना के 25 वर्ष पूरे होने के अवसर पर तथा पार्टी संस्थापक काशीराम के जन्मदिन के मौंके पर मुख्य अतिथि के रूप में बहन मायावती ने उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री होते हुए गत् 15 मार्च को एक-एक हज़ार के नोटों की जो विशाल एवं अभूतपूर्व माला अपने गले में डाली उसने तो देश की विवादपूर्ण एवं नकारात्मक राजनीति में अपना सबसे अलग झंडा गाड़ दिया।

जरा कल्पना कीजिए कि प्रदेश की एक मुख्यमंत्री जब अपने गले में करोड़ों की माला डालकर ‘माया’ के प्रति अपने मोह का इस प्रकार खुला प्रदर्शन करेगी तो आंखिर ऐसी मुख्यमंत्री अपने मंत्रियों, सांसदों, विधायकों तथा अपने अधीनस्थ सरकारी अधिकारियों से क्या उम्मीद रखेगी। यह भी कितना आश्चर्यजनक है कि 15 मार्च को करोड़ों की विशाल माला डालने की घटना के बाद जब पूरे देश में यह माला विवादित हुई तथा आयकर विभाग भी 15 मार्च की शाम को ही इसकी जांच हेतु सक्रिय भी हो गया उसके बावजूद 17 मार्च को अपने सांसदों, मंत्रियों व विधायकों के मध्य मायावती ने एक बार फिर भारतीय मुद्रा अर्थात् नोटों से बनी एक और विशाल माला अपने गले में डालकर यह संदेश सांफतौर पर दे दिया कि उन्हें न किसी की आपत्ति की परवाह है न आलोचना का डर। राजनीति में नैतिकता व अनैतिकता के मापदंड क्या हैं यह न मीडिया तय करेगा न ही बी एस पी विरोधी राजनैतिक दल। बल्कि यह स्वयं मायावती तय करेंगी। जैसा कि उत्तर प्रदेश के माया मंत्रिमंडल के एक मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीक़ी ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा भी की कि यदि बहन जी की आज्ञा होगी तो अब प्रत्येक समारोह में फूलों की नहीं बल्कि नोटों की माला से ही उनका स्वागत किया जाएगा।

मजे की बात तो यह है कि मायावती के इस प्रकार के ‘कृत्यों’ की जब कोई भी वर्ग आलोचना करता है उस समय मायावती के पास एक ही जवाब होता है कि अमुक आलोचक मनुवादी है,दलित विरोधी मानसिकता का शिकार है अथवा दलित की बेटी को आगे बढ़ते नहीं देख पा रहा है। मायावती का यह कथन सरासर बेमानी इसलिए होता है कि भारत में भले ही जाति व्यवस्था के कुछ प्राचीन अन्यायपूर्ण दिशा निर्देशों के चलते सामाजिक भेद-भाव क्यों न नजर आता हो। परंतु बाबा साहब भीमराव अंबेडकर, बाबू जगजीवन राम,आर के नारायणन से लेकर मीरा कुमार, राम विलास पासवान जैसे अनेकों दलित नेताओं ने देश की राजनीति में जो मान्यता व स्थान प्राप्त किया है वह दलित विरोधी मानसिकता के चलते इस देश में संभव नहीं था। और तो और दलित मंथन की राजनीति तथा 85 प्रतिशत मतदाताओं का समीकरण तो बहन मायावती को भी उत्तर प्रदेश की सत्ता में पूर्ण बहुमत कभी नहीं दिला सका था। पिछले विधानसभा चुनावों में जब मायावती ने ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ का नारा देकर प्रदेश के ब्राह्मण समाज को अपने साथ जोड़ने का सफल प्रयास किया तभी आज उन्हें पूर्ण बहुमत की पहली सरकार मिल सकी है। इन सभी वास्तविकताओं के बावजूद मायावती में अहंकारपूर्ण तथा ‘माया’ प्रेम जैसी अन्य कई नकारात्मक राजनीति के जो लक्षण दिखाई दे रहे हैं वह निश्चित रूप से आने वाले समय में मायावती को कांफी नुंकसान पहुंचा सकते हैं।

-निर्मल रानी

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1 Comment on "नकारात्मक राजनीति का प्रतीक बनती मायावती"

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Rajesh Kumar Ahirwar
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हाँ जो आपने कहा बिलकुल सही कहा की ३३ प्रतिशत महिला संसद में होने से संसद का हाल अलग होगा क्योंकि वहां पर इक तरफा राज मनुवादियों का ही होगा, मायावती जैसी महिला को वहां मनुवादी पहुचने ही नहीं देंगे क्योंकि उन जैसी महिलायों से भारत का मनुवाद समाप्त हो जायगा जो मनुवादियों को पसंद नहीं है मनुवादियों को तो वह महिला चाहिय जो उनके पैर पड़ती रहें और वह मायावती जैसी महिला नहीं कर सकती है मायावती जो भी करती है उसका दलितों को स्वीकार सिर्फ स्वीकार नहीं है तो उन दलितों को जो मनुवादियों के पिछलग्गू है डा… Read more »
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