लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

ममता ने दिल्ली में केंद्र सरकार के खिलाफ जो हुंकार भरी है, कांग्रेस और सपा को हैरान करने वाली है। राजग की बैचेनी भी बढ़ सकती है। मुलायम सिंह उस अवसर से चूक गए लगते हैं, जो उनके तीसरे मोर्चे का मुखिया बनने का मार्ग प्रशस्त करता। यदि वे ममता के साथ केंद्र से समर्थन वापिसी की हिम्मत जुटा लेते तो वे तीसरे मोर्चे की केंद्रीय धुरी बन गए होते। लेकिन ममता ने जंतर-मंतर पर मनमोहन सिंह सरकार के खिलाफ संघर्ष का जो षंखनाद किया है, उससे लगता है तीसरे मोर्चे को वजूद में लाने का नाभिकेंद्र अब ममता के इर्दगिर्द होगा। ममता की सभा में राजग के संयोजक शरद यादव की उपस्थिति और इसी दिन केंद्र से झारखण्ड विकास मार्चा द्वारा समर्थन वापिसी की घोषणा इस बात का साफ संकेत है कि ममता ने खुद के नेतृत्व में तीसरे मोर्चे के गठन की भूमिका रच दी है। ममता की इस सभा को करुणानिधि का समर्थन भी इस बात की तसदीक है कि कालांतर में ममता केंद्रीय राजनीति की सिरमौर होंगी।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर ममता के प्रदर्शन को केवल खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेष की इजाजत, पेटोलियम पदार्थों में मूल्य वृद्धि और खाध पदार्थों के बेतहाशा बढ़तें दामों के परिप्रेक्ष्य में ही नहीं देखना चाहिए। इस सभा के जरिये राष्ट्रीय राजनीति में नए समीकरणों की खोज और आगामी सत्र में केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव की मंशा को सफलता के लायक मत-समर्थन जुटाने की कवायद के रुप में भी देखने की जरुरत है। इस सभा में ममता ने साफ कर दिया कि वे तृणमूल कांग्रेस का अखिल भारतीय स्तर पर विस्तार करने जा रही हैं। शायद इसीलिए उन्होंने एक दिनी भारत बंद की बजाय केंद्र के खिलाफ लगातार आंदोलन करते रहने पर जोर दिया। हरियाणा, लखनउ ओर पटना के साथ वे इन्हीं जनविरोधी मुददों को लेकर कांग्रेस के विरुद्ध मुसीबतों का पिटारा खोलने वाली हैं। उत्तर से दक्षिण की राजनीतिक यात्रा कर एक बार फिर वे 19 व 20 नवंबर को दिल्ली में धरना-प्रदर्शन कर संप्रग की नींद हराम करेंगी।

ममता के गूढ़ राजनीतिक लक्ष्यों में यह भी शामिल है कि वे ऐसे मुख्मंत्रियों का संघ भी बना सकती हैं, जिनकी सप्रंग और राजग से दूरी बनी हुर्इ है। ऐसे मुख्यमंत्रियों में उनके साथ जयललिता और नवीन पटनायक आ सकते हैं। शरद यादव ने जिस तरह से ममता की सभा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया, इससे लगता है, देर-सबेर नीतिश कुमार, ममता के साथ हो लेंगे। इधर बिहार भाजपा के अध्यक्ष सीपी ठाकुर ने भी बिहार में आगामी लोकसभा चुनाव में स्वतंत्र रुप से चुनाव लड़ने का संकेत देकर साफ कर दिया कि अब जनता दल ;यूद्ध राजग गठबंधन से कभी भी टूट सकता है। उधर नीतिश कुमार तो पहले ही कह चुके हैं कि भाजपा नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रुप में पेष करती है तो उनकी पार्टी भाजपा से गठबंधन तोड़ने में एक पल भी नहीं लगाएगी। जाहिर है दिल्ली के जंतर-मंतर पर ममता ने हुंकार भरके तृणमूल कांग्रेस के अखिल भारतीय विस्तार की भूमिका रच दी।

इस समय सबसे ज्यादा पसोपेष में मुलायम हैं। ममता द्वारा दिल्ली में भरी हुंकार, तृणमूल के विस्तार और निगर्ुट मुख्यमंत्रियों का संघ बनाने के ऐलान से मुलायम के मंसूबों पर पानी फिरता नजर आ रहा है। क्योंकि मुलायम तीसरे मोर्चे के गठन की संभावनाओं की तलाष लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद करने की जुगत में थे, जबकि ममता बनर्जी ने तीसरे मोर्चे को वजूद में लाने के सूत्र अभी से तलाषना शुरू कर दिए हैं। उनकी उत्तर से दक्षिण की यात्रा इसी राजनीतिक लक्ष्य पूर्ति के लिए है।

मुलायम के साथ असंमजस की स्थिति इसलिए है कि वे एक साथ कर्इ नावों पर सवार रहकर अपने हित साधकर उत्तर प्रदेश में चुनावी अजेंडे में की घोषणाओं को अमल के लिए जरुरी वक्त के साथ केंद्र से आर्थिक मदद भी लेते रहना चाहते हैं। मुलायम इस पाप के भागीदार बनने से भी बचे रहना चाहते हैं कि सप्रंग की लुटिया उन्होंने डुबोर्इ। इस मकसद के पीछे मुलायम की मंशा है कि चुनाव परिणाम के बाद यदि सपा 50 के आसपास सीटें जीत लेती है तो मुलायम प्रधानमंत्री बनने के लिए कांग्रेस की वैशाखियां उधार लेलें। लिहाजा मुलायम इस इंतजार में हैं कि जिस तरह झारखण्ड विकास मोर्चा ;प्रजातांत्रिकद्ध जैसे छोटे दल संप्रग गठबंधन से मुक्त होने लगे है, उसी तरह द्रमुक समेत कुछ अन्य छोटे दल भी संप्रग को ठेंगा दिखा दें, तब मुलायम अपना समर्थन वापिस लें। यह संघर्ष नहीं सुविधा की राजनीति है और सुविधा की यह राजनीति कहीं मुलायम की गति सांप-छंछूदर सी न कर दे। हालांकि मुलायम, ममता को साधने की कवायद में लगे हैं और ऐसी उम्मीद है कि ममता की लखनउ रैली में मुलायम भी षिरकत करें।

बहरहाल ममता की तेज होती राजनीतिक हलचलों से कुछ ही दिनों में साफ हो जाएगा कि तमाम क्षेत्रीय क्षत्रप उनसे कदमताल मिलाने लग गए और वे राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर जन-पक्षधरता वाली जननेत्री के रुप में उबरने लग गर्इ हैं। ममता को निकट भविष्य में कम करके आंकना मुश्किल होगा। उनके नेतृत्व में क्षेत्रीय दलों की लामबंदी कांग्रेस के लिए कदम-दर-कदम सकते में डालने वाले दांव होंगे। जो दल खुदरा में निवेष और मंहगार्इ का प्रतीकात्मक विरोध करके स्वार्थ सिद्धियों की सौदेबाजी में लगे हैं, उन्हें जनता शायद चुनाव में बर्दाश्त न करे ? क्योंकि क्षेत्रीय क्षत्रपों को अब साफ करना होगा कि लोकसभा चुनाव के पहले अथवा बाद में यदि भाजपा को सांप्रदायिक दल होने की वजह से धर्मनिरपेक्ष होने का दंभ भर रहे हैं, तो कांग्रेस के साथ आर्थिक गुलामी से जुड़े सरोकारों के साथ वे कैसे खडें हो सकते हैं ? यहां नैतिक सवाल तो यही खड़ा होता है कि जो क्षेत्रीय क्षत्रप भीतर या बाहर से सप्रंग को समर्थन का टेका लगाए हुए हैं वे तृणमूल कांग्रेस और झारखण्ड विकास मोर्चा की तरह स्पष्ट कदम उठाएं। दोमुंही राजनीति की कुटिल चतुराइयों से बचें। क्योंकि जनता की राजनीतिक जागरुकता बहुत बढ़ गर्र्इ है, लिहाजा उसकी भावनाओं से खेला गया तो वह भी प्रतिकार स्वरुप सबक सिखाने की भूमिका में आ सकती है। जो क्षेत्रीय दल संप्रग के साथ हैं, उन्हें यह आत्ममंथन भी करने की जरुरत है कि कांग्रेस बार-बार यह दावा कर रही है कि उसने खासतौर से एफडीआर्इ मुददे पर सहयोगी दलों से सलाह-मशवरा करके खुदरा में निवेष का फैसला लिया है। अब यहां सवाल उठता है कि यदि ऐसा था तो तृणमूल और झारखण्ड विकास मोर्चा संप्रग से विमुख क्यूं हुए। द्रमुक के करुणानिधि ने न केवल भारत बंद में मुखर भागीदारी की बलिक केंद्र सरकार को झटका देते हुए साफ कर दिया कि द्रमुक एफडीआर्इ का विरोध करने वालों के साथ है। मसलन द्रमुक दोहरे रुख की अपनाने की मजबूरी से तत्काल छुटकारा पाने को व्याकुल है। यहां संसद की गरिमा और संवैधानिक मर्यादा का बार-बार सवाल खड़ा करने वालों को यह आत्ममंथन भी करने की जरुरत है कि जब संप्रग के घटक दलों की एफडीआर्इ के मुददे पर सहमति नहीं थी, सपा और बसपा भी एफडीआर्इ के खिलाफ हैं तो संप्रग के इस फैसले के साथ संसदीय बहुमत कहां है ? क्या यह संसदीय लोकतंत्र की संवैधानिक मर्यादा का मखौल नहीं है ? ऐसे में यदि ममता दिल्ली में यह दहाड़ भर रही हैं कि वे संसद के आगामी सत्र में केंद्र सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव ला सकती हैं। यदि ममता यह प्रस्ताव लाती हैं तो सरकार को प्रत्यक्ष – अप्रत्यक्ष समर्थन दे रहे दलों का नैतिक और राष्ट्रीय दायित्व बनता है कि वे अविश्वास प्रस्ताव के साथ खड़े दिखार्इ दें, अन्यथा यह माना जाएगा कि ज्यादातर क्षेत्रीय दलों के स्वार्थ संसद और संविधान से उपर हैं ?

 

 

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2 Comments on "ममता ने दिल्ली में भरी हुंकार"

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sanjeev k
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ममता लक्ष्य से भटक रही हैं उन्हें डेल्ही की जगह बंगाल पे धयान देना चाहिए. बंगाल मैं बहुत प्रतिभा है निर्देश देने की जरूरत है.

श्रीराम तिवारी
Guest

ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल को बर्बाद कर दिया है अब वह समूचे भारत को बर्बाद करने के लिए फितरत में है. उसकी कोई विचारधारा -आर्थिक,सामाजिक,राजनैतिक कुछ भी नहीं केवल वामपंथ का विरोध करते हुए खजूर पर जा अटकी है.अब वहाँ से ओउंधे मुह गिरना बाकि है.

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