लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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समग्र किसान चेतना का प्रतीक है- शिव
पंडित सुरेश नीरव

सावन का महीना। चैत्र मास से शुरू होनेवाले भारतीय कैलेंडर का पांचवा महीना। पांच यानि सृष्टि के पंचभूत का प्रतीक। तो फिर क्यों न हो भूताधिपति महादेव को प्रिय यह पांचवां महीना। जो स्वयं जल की तरह तरल और भोले हैं। जिनके माथे पर चंद्रमा है जो कि जल तत्व का प्रतीक है। जिनकी जटाओं में गंगा है जो जल ही नहीं आपः है। आपः यानी आस्था से सिक्त जल।शिव जो स्वयं केदार हैं। केदार अर्थात जल से भरा हुआ खेत। जो शिव है। शिव जो कल्याणकारी तो हैं हीं मगर शिव का एक अर्थ पशु धन को थामनेवाला खूंटा भी होता है। शिव का वाहन नंदी है। जो कि किसान के हल में जुतकर उसकी हर समस्या हल कर देता है। इस कृषिप्रधान देश की अस्मिता का प्रतीक है किसान। और इस समग्र किसान चेतना का प्रतीक है- शिव। टकटकी लगाए वर्ष भर किसान इंतजार करता है आकाश में घुमड़ते काले-काले बादलों का। सावन में चारों तरफ हरीतिमा बिखरने से धरती पर उल्लास का भाव होता है। वर्षा की बूंदों से बरसता यह अलौकिक उल्लास ही शिव है। इस वर्षा का ही सम्मान है कि हम अपने देश भारत को भारतवर्ष कहते हैं। जो वर्षा को धारण करे वह वर्ष है। हम एक वर्षा से दूसरी वर्षा की अवधि को एक वर्ष कहते हैं। यानि की काल को नापने का पैमाना भी हमारे यहां वर्षा है। तो फिर काल को संचालित करनेवाला महाकाल तो स्वयं सावन होता है। वैदिक संस्कृति में एक सूर्योदय से एक सूर्यास्त का जो काल है उसे भी सावन कहा गया है। तो फिर जब स्वयं शिव सावन है तो फिर क्यों सनत कुमारों ने महादेव से उनके सावन के महीने को पसंद करने का कारण पूछा। ऐसा नहीं कि ब्रह्मा पुत्र इस सत्य को नहीं जानते होंगे। अगर वे प्रश्न नहीं पूछते तो कैसे ये तथ्य उदघाटित होता कि हिमालय में जन्मी कन्या पार्वती वही सती है जिसने कि पिछले जन्म में अपने पति शिव का पिता द्वारा उपहास करने पर योग शक्ति से अपने प्राण त्याग दिए थे। और इस मास में ही निराहार रहकर अपनी कठोर तपस्या से पार्वती ने शिव को प्रसन्न किया था। इस तरह सावन शक्ति (पार्वती) और शक्तिमान (शिव) दोनों के मिलन का केन्द्र हैं। चातुर्मास्य में जब भगवान विष्णु शयन के लिए जाते हैं, तब शिव ही तो हैं जो तीनों लोकों की सत्ता संभालते हैं। श्मशानी रुद्र ग्रहस्थ बनकर विवाह रचाते हैं। लेकिन यह लौकिक विवाह नहीं है। यह ब्रह्म और प्रकृति का विवाह है। यही सावन की शिवरात्रि है। इस शिवरात्रि के बाद आती है- नाग पंचमी। नाग काल का प्रतीक है। जो काल सापेक्ष नहीं है उसका कोई विकास संभव नहीं। शिव तो स्वयं त्रिकालदर्शी हैं। प्रकारांतर से नाग की पूजा महाकाल के साथ-साथ काल की ही पूजा है। रक्षा बंधन से ठीक पहले घर के द्वार पर नाग बनाकर उनकी पूजा करने का हमारे यहां विधान है। श्रावण मास की पंचमी को जहां नागों की पूजा की जाती है, वहां नवमी तिथि को नेवलों की पूजा की जाती है। नउरी नवमी पर नेवला पूजन इस बात की घोषणा है कि जीव ही जीव का भक्षक है। और सांप कितना ही विषैला क्यों न हो अंततः वह नेवले से हार ही जाता है। विषपायी शिव को जिसने देवासुर संग्राम में निकले संसार के सबसे तीक्ष्ण विष हलाहल को कंठ में धारण कर लिया हो, विष के उस दाह को शमित करने के लिए ही देवों और भक्तों द्वारा किया गया पवित्र जल से उनका विराट अभिषेक। तभी से चली आ रही है अभिषेक की परिपाटी। उसी का सामाजिकरूप है-कांवर यात्रा। संसार का पहला कंवरिया था-महाशिवभक्त-रावण। जिसकी एक कांवर में थे शिव और दूलरी कांवर में था गंगाजल। अपने आराध्य को कैलास से लंका ले जाने को रावण चल पड़ा कंधे पर लिए कांवर। मगर बिहार के वैद्यनाथ धाम तक आते-आते वह श्रमश्लथ हो गया। बालक बने नारद को उसने कांवर थमाई। थोड़ी देर बाद जब रावण शंका निवृत होकर आय़ा तो जमीन पर कांवर रख कर बालक गायब दो चुका था। कांवर जमीन पर न रखने का विधान जो है। इसलिए शिव पत्थर के होकर वहीं रह गए। मगर भगवान शिव की भक्ति और आराधना से जुडे़ भक्तगण आज भी देश की विभिन्न पवित्र नदियों से जल इकट्ठा करके प्रसिद्ध शिवलिंगों पर जलाभिषेक करते हुए गृह स्थल पर जाकर अपनी कांवर यात्रा संपन्न करते हैं। 1857 की क्रांति का एक मात्र चश्मदीद गवाह पुणे से वाराणसी तक पैदल कांवर लेकर चलनेवाला विष्णुभट्ट गोडसे भी परम शिवभक्त था। कांवरिये वे तपस्वी होते हैं जो जप, तप और व्रत, इन तीनों त्यागमयी वृत्तियों को एक साथ उपलब्ध होते हैं।

कांवर काटता है काम को
कावर शब्द बना ही कामरि से है। कांवर यानी काम की अरि। जो काम को काट दे वह कांवर। मगर दुर्भाग्य से आज कांवर यात्रा में ऐसे कांवरिये भी शरीक हो जाते हैं जिनके आचरण और व्यवहार से यह पवित्र तीर्थ-यात्रा महज एक मौज-मस्ती और सैर सपाटे का जरिया बनती जा रही है। कभी कांवर परंपरा धार्मिक आस्थाओं की पूर्ति के साथ-साथ भारत की चारों दिशाओं में रह रहे लोगों में एक सामाजिक-सांस्कृतिक संवाद स्थापित करने का लोक माध्यम हुआ करती थी वही कांवर यात्रा आज के बाज़ारवादी दौर में अपने मूल उद्श्य से भटककर सामाजिक और धार्मिक संगठनों की शक्ति के दिखावे और पाखंड का प्रदर्शन बनती जा रही हैं। कुछ कांवरियों को अभद्रता और ड्रग तस्करी में शामिल भी पाया गया। इस कुकृत्य ने पर्यावरण और राष्ट्रीय एकता के यज्ञ को भी दूषित कर दिया। हर वर्ष कांवरियों की संख्या जहां लगातार बढ़ रही है वहीं पर्यावरण और प्रशासन के लिए अनियंत्रित भीड़ एक समस्या भी बनती जा रही है। गोमुख, नीलकंठ व हरिद्वार से लेकर पवित्र कैलास और मानसरोवर तक धीरे-धीरे प्लास्टिक,पॉलीथिन और मानव कचरे के बोझ और कार,मोटरों की चौं-चौं,पौं-पौं से चरमरा उठे हैं। साढे बाहर हजार फुट ऊंचे अमरनाथ का सबसे बड़ा ग्लेशियर कोलेहोई जो कभी 17 कि.मी. तक फैला था आज प्रदूषण की मार झेलते हुए सिकुड़कर 2.63 कि.मी. रह गया है। कारों और बसों से निकलनेवाले जहरीले धुएं ने सदानीरा नदियों का कत्ल कर दिया है। इस प्रदूषण ने वनस्पति और प्राणियों के अस्तित्व को भी खतरे में डाल दिया है। जिस गंगाजल और अन्य पवित्र नदियों के जल से अभिषेक कर के भक्तगण शिव को प्रसन्न करना चाहते हैं उन्हीं नदियों को हमने नाला बना दिया है। समय आ गया है कि कांवर की आस्था में पर्यावरण की चेतना को भी जोड़ा जाए।

सावन में होते हैं तंत्र
पौराणिक ग्रंथों में भगवान शंकर को तंत्र का अधिपति भी माना गया है। इसलिए सावन के महीने में मनोकामना की पूर्ति हेतु लोग तंत्र विधान से बम-बम भोले को प्रसन्न करने में भी लग जाते हैं। आज के दौर में ये टोने-टोटे कितने प्रासंगिक हैं इस तथ्य को खंगाले बिना भी तमाम अंधविश्वासी तंत्रसिद्धि में जुट जाते हैं। इस साधना के मूल में व्यापारी वर्ग, नौकरीपेशा और बेरोजगार लोगों को शीघ्र धन लाभ और पदोन्नति पाने की महत्वाकांक्षा मुख्य होती है।
जब महज जल, बिल्वपत्र और फूल चढ़ाने से ही शिवजी प्रसन्न हो जाते हैं तो फिर इस निर्रथक व्यायाम की जरूरत रह ही कहां जाती है। लेकिन सोच का क्या किया जाए।सावन का असर होता ही कुछ ऐसा है कि सावन के तो अंधे को भी सब जगह हरा-ही-हरा दिखाई देता है। अब हरा दिखे या काला अंधे को दिखे यह भी तो सावन का कमाल और भोले बाबा की कृपा ही है।

सावन और आयुर्वेद-

आयुर्वेद के अनुसार सावन में दूध नहीं पीना चाहिए क्योंकि सावन में कच्ची घास होती है। उस घास में बहुत सारे कीड़े-मकोड़े होते हैं। चरने के दौरान जब गाय-भैंस यह घास खाती है तो उसके दूध में बहुत से रोगों के जीवाणु भी साथ में पहुंच जाते हैं। हमारे ऋषियों ने जोकि आयुर्वेद के मर्मज्ञ भी होते थे यह बात जनता को अपने तरीके से समझायी। उन्होंने नियम बना दिया कि सावन में शिवजी पर दूध चढ़ाया जाए। शिवजी तो हलाहल पी सकते हैं। फिर दूध का क्या है।

सिद्ध ज्योतिर्लिंग

शिव साकार भी हैं और निराकार भी। इनके निराकार स्वरूप का प्रतीक शिवलिंग है। शिव रूपवान हैं, इसलिए साकार हैं। इसीलिए भगवान शिव की पूजा दोनों रूपों में की जाती है। शिव के 12 अवतार इस प्रकार हैं-
सोमनाथ: यह सौराष्ट्र के प्रभास क्षेत्र में हैं। पुराणों के अनुसार शिव का यह प्रथम अवतार चंद्रमा के दुख का विनाश करने वाला है। सोमेश्वर ज्योतिर्लिंग की पूजा स्वयं चंद्रमा ने की थी।
मल्लिकार्जुन: यह ज्योतिर्लिंग श्रीशैल पर्वत पर है। कृष्णा नदी के तट पर स्थित यह ज्योतिर्लिंग को दक्षिण का कैलाश भी कहलाता हैं। पुत्र प्राप्ति के लिए इनकी स्तुति की जाती है।

महाकाल: पुरातन काल की अवंतिकापुरी यानी उज्जैन के क्षिप्रा नदी के तट पर विराजमान यह ज्योतिर्लिंग भक्तों की रक्षा करने वाला माना गया है। पहले पंचांग की काल गणना इसी महाकाल से की जाती थी।
ओंकारेश्वर: विंध्यगिरि ने शिव का पार्थिव लिंग स्थापित किया, उनकी कामना पूरी करने प्रकट हुए शिव देवताओं की प्रार्थना पर दो रूपों में विभक्त हो गए। एक भाग ओंकारेश्वर तथा दूसरा परमेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ। नर्मदा तट पर स्थित ये एक ही ज्योतिर्लिंग के दो स्वरूप हैं।
केदारेश्वर: शिव का पांचवां अवतार है- केदारेश्वर, जिन्हें केदारनाथ कहा जाता है। यह ज्योतिर्लिंग हिमालय के उत्तराखंड के केदार नामक पर्वत-शिखर पर है। श्रीहरि के नर-नारायण अवतार की प्रार्थना पर शिव हिमगिरि के केदार शिखर पर विराजित हुए।
भीमाशंकर: यह शंभु का छठा अवतार है, जिसमें शिवजी ने अनेक लीलाएं की और भीमासुर का विनाश भी किया था। राजा सुदक्षिण की प्रार्थना पर स्वयं शंकर डाकिनी में भीमशंकर नामक ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थित हो गए।
विश्वनाथ: भोलेनाथ का सातवां अवतार विश्वनाथ है, जो काशी (वाराणसी) में ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थित हैं। विश्वेश्वर नामक इस अवतार की पूजा रोज विष्णु समेत समस्त देवता एवं भैरव करते हैं।
त्र्यंबकेश्वर: यह स्थान नासिक के पास है। शिव का त्र्यंबक नामक आठवां अवतार गौतम ऋषि की प्रार्थना पर गौतमी नदी के तट पर हुआ। मुनि की प्रार्थना पर भगवान शिव ज्योतिर्लिंग स्वरूप अचल होकर स्थित हो गए।

वैद्यनाथ : शिव का नवां अवतार वैद्यनाथ ( बैजनाथ ) से प्रसिद्ध है। रावण द्वारा अपने लिए लाए जाने का कारण मानकर महेश्वर ज्योतिर्लिंग स्वरूप चिताभूमि में प्रतिष्ठित हो वैद्यनाथेश्वर नाम से विख्यात हुए।
नागेश्वर : शिव का दसवां अवतार नागेश्वर है , जो दुष्टों को दंड ित करनेवाला है। इसमें शिव ने दारुक नामक राक्षस का वध करके सुप्रिय नामक भक्त की रक्षा की थी। भगवान शिव अंबिका सहित महाज्योतिर्लिंग स्वरूप स्थित हुए।
रामेश्वर : शिव का 11 वां अवतार है रामेश्वर , जिन्हें श्रीराम ने स्थापित किया था। भक्त वत्सल महादेव ने प्रसन्न होकर श्रीराम को लंका युद्ध में विजयी होने का वर यहीं दिया था।
घुश्मेश्वर : यह शंकर का 12 वां अवतार है। घुश्मा का कल्याण करने के लिए भगवान शिव देव शैल के निकट एक सरोवर में प्रकट हुए थे। घुश्मा के पुत्र को जीवित करने के बाद घुश्मा की प्रार्थना पर भगवान शिव तड़ाग में ज्योतिर्लिंग स्वरूप स्थित हो गए। ये सभी 12 ज्योतिर्लिंग एश्वर्य और मोक्ष के प्रदाता हैं।

विरही संवेग का दूतःसावन
सावन जहां भक्तों को शिव के नजदीक ले जाता है वहीं साहित्य में यही सावन का बादल बेचारा विरहियों का पोस्टमैन बनकर रह जाता है। चाहे कालिदास का मेघदूत हों जहां बादल कुबेर की अल्कापुरी से निष्कासित कामदग्ध यक्ष का उसकी प्रेमिका तक संदेश पहुंचानेवाला दूत हो या फिर महाभारत का “नलोपाख्यान में जहां यही बादल नल तथा दमयंती दोनों का दूत बनकर अपनी चाकरी निभाता है। तो वही सावन का बादल तीर्थकर पार्श्वनाथ के लिए “पार्श्वाभ्युदय” में और कवि “विक्रम” के “नेमिदूत” में भी दूत ही बनकर प्रकट हुआ है। सावन के मस्त-मस्त मौसम में जहां नवविवाहिता दुल्हने अपनें मायके चली जाती हों और अपनी सहेलियों के साथ झुंड बनाकर घरों में,बाग़-बग़ीचों में पेड़ों पर झूले डालकर सावन के गीतों और झूले के झोटों की पींग में अपना गम ग़लत कर लें मगर बेचारे पतिदेव क्या करें। सिवाय कांवर लेकर बम-बम भोले कहते हुए तीर्थ पर निकल जाने के। इसी कारण तो शिवभक्त, तीन लोक से न्यारी काशी नगरी प्यारी के शिवभक्त कविवर भारतेंदु ने भी सावन के मर्म को समझकर और बढ़िया ठंडाई पीकर खूब कजरी लिखीं। झमाझम सावन की फुहारों में प्यार का मजा ही अलग है। अगर आप कांवर लेकर नहीं निकल सकते और कजरी भी नहीं लिख सकते तो सावन के महीने में अपनी उनके साथ एक ही छतरी में भीगते हुए मौका देखकर छत्रपति तो बन ही जाइए। या फिर अपनी गौरी के साथ लांग ड्राइव पर किसी हिल स्टेशन जरूर चले जाइए। सावन के आराध्य सिव की शुभ कामनाएं सदैव आपके साथ हैं। शिवास्ते संतु पंथानः। भगवान आपकी यात्रा शुभ करे। हर-हर महादेव..।

यह सावन का ही जादू है कि वीर रस का कवि भी सावन में श्रंगार लिखने लगता है। सावन पर स्व.रामधारीसिंह दिनकर की कविता-

जेठ नहीं, यह जलन हृदय की,
उठकर ज़रा देख तो ले,
जगती में सावन आया है,
मायाविनि! सपने धो ले।

जलना तो था बदा भाग्य में
कविते! बारह मास तुझे,
आज विश्व की हरियाली पी
कुछ तो प्रिये, हरी हो ले।

नन्दन आन बसा मरू में,
घन के आँसू वरदान हुए;
अब तो रोना पाप नहीं,
पावस में सखि! जी भर रो ले।

अपनी बात कहूँ क्या? मेरी
भाग्य-लीक प्रतिकूल हुई;
हरियाली को देख आज फिर
हरे हुए दिल के फोले।

-रामधारी सिंह दिनकर

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