लेखक परिचय

डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

डॉ. भूपेंद्र सिंह गर्गवंशी

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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thanedarपुरानी बात है जिले के एक थाना क्षेत्र में चोरियों की बाढ़ आ गई थी। जिससे आम आदमी की नींद हराम हो गई थी। जिले के आला अफसरों से लेकर पुलिस महकमें के सूबे स्तरीय अधिकारी इसको लेकर काफी चिन्तित थे। यह उस समय की बात है जब सूबे के पुलिस महकमें का मुखिया आई.जी. हुआ करता था। आई.जी. ने पुलिस विभाग के दरोगा से लेकर एस.पी., डी.आई.जी. की मीटिंग बुलाई और उक्त थाना क्षेत्र में होने वाली चोरियों पर अंकुश लगाने पर गहन मंत्रणा किया। मीटिंग में उपस्थित किसी भी अधिकारी की समझ में नहीं आ रहा था कि कौन सी रणनीति बनाई जाए जिससे होने वाली चोरियों पर नियंत्रण लग सके।
मीटिंग में कई दबंग किस्म में के दरोगा/थानेदार भी उपस्थित थे, लेकिन इन दबंगों ने चुप्पी साध रखी थी। एक दरोगा जी (ढिल-ढिल पाण्डेय) मीटिंग हाल में किनारे बैठे बड़े शान्त भाव से अपने अधिकारियों की मंत्रणा पर गहन विचार कर रहे थे। वह पुराने व मजे हुए सीधे स्वभाव के थे। किसी समकक्षीय ने उन पर कटाक्ष किया और भरे सभाकक्ष में कहा कि यदि उक्त थाने का प्रभार इन्हें दे दिया जाए तो चोरियों पर नियंत्रण लग जाएगा। इतना सुनना था कि आई.जी. महाशय ने उन दरोगा जी (ढिल-ढिल पाण्डेय) से कहा कि यदि उन्हें उस थाने का इंचार्ज बना दिया जाए तो क्या वह वैसा कर पाएँगे जैसा कि अन्य पुलिस अधिकारियों ने सुझाव दिया है।
दरोगा जी अपने उच्चाधिकारी की बातें सुनकर खड़े हो गए और बोले सर जैसा आप चाहें और मैं वादा करता हूँ कि आप को निराश नहीं होना पड़ेगा। आई.जी. महाशय ने कहा- तो जावो आज और अभी से तुमको उक्त थाने का प्रभारी बनाया जाता है, यदि तुम सफल हो गए तो तुम्हारी पदोन्नति के लिए सरकार से सिफारिश भी की जाएगी। आप की महान कृपा होगी श्रीमान् जी- इतना कहकर दरोगा (ढिल-ढिल पाण्डेय) जी चुप हो गए। मीटिंग भी समाप्त हो गई थी। दरोगा जी को थानेदार बनाए जाने का हुक्मनामा भी जारी हो गया। अब वह थानेदार बनकर उक्त थाने पर पहुँचे जहाँ चोरियों की बाढ़ लगी हुई थी।
एक माह उपरान्त- उक्त थाना क्षेत्र में चोरियाँ होना एकदम से बन्द हो गईं। क्षेत्र वासी सुकून से रहने लगे। फिर आई.जी. महाशय का ‘मुआयना’ हुआ। थाने के रोजनामचे में चोरी की घटनाएँ शून्य पाकर वह बहुत खुश हुए और थानेदार ढिल-ढिल पाण्डेय को शाबासी दिया। जिले के अन्य थानों के निरीक्षण उपरान्त उन्होंने थानेदार पाण्डेय को बुलाकर एकान्त में वार्ता करने की इच्छा व्यक्त किया। अब आई.जी. और थानेदार ढिल-ढिल पाण्डेय एक कमरे में वार्ता कर रहे थे। अधिकारी ने थानेदार के कार्य की प्रशंसा करते हुए कहा कि एक महीने में इस थाने की साफ-सफाई और मेस में बनने वाले भोजन से यहाँ के सभी पुलिस कर्मी प्रसन्न एवं स्वस्थ दिख रहे हैं। अच्छा यह बताओ कि तुम रात को गश्त पर नहीं निकलते हो ऐसा क्यो…? फिर भी चोरी रूक गई।
थानेदार ढिलढिल पाण्डेय ने कहा सर माफी चाहूँगा। आप हमारे अफसर हैं। आपने हमारे थाने का निरीक्षण किया और संतुष्ट हैं। यह हम सबके लिए एक बड़ी उपलब्धि है रही बात आप द्वारा पूँछे गए प्रश्नों के उत्तर की…क्या बताऊँ यह हमारा अपना तरीका है कृपा कर प्रश्न वापस ले लें। थानेदार पाण्डेय की बात सुनकर आई.जी. ने कहा मैं तुम्हारा अफसर हूँ मेरे प्रत्येक प्रश्न का उत्तर देना तुम्हारा कर्तव्य बनता है। थानेदार ढिलढिल पाण्डेय को अपने अधिकारी के आदेशों का अनुपालन करने की बात का बोध हो आया उसने कहा सर एक वायदा करिए कि जो कुछ मैं आप को बताऊँगा उसे आप अपने तक ही सीमित रखेंगे। आई.जी. ने ‘तथास्तु’ कहा और फिर जो कुछ थानेदार ने बताया वह यह कि-
सर मैं जैसे ही उक्त थाने का इंचार्ज बनकर आया थाने की हालत देखा, घास-फूस गन्दगी और मेस में खाना बनाने वालों की कमी, कुल मिलाकर मुझे दुःख हुआ। फिर मैंने रजिस्टर नं. 8 और 10 का विधिवत अवलोकन किया। उसके उपरान्त थाना क्षेत्र के उन सभी शातिर चोरों को थाने में बुलाया। पहले तो सब डर रहे थे, लेकिन जब मैंने उनसे यह कहा कि मैं उनको आकरण परेशान नहीं करूँगा अलबत्ता इसी थाने में पुलिस कर्मियों के समानान्तर काम करने का मौका दूँगा त बवह लोग राजी हुए।
सभी छोटे से लेकर बड़े शातिर चोरों की अब थाने में आमद हो गई। कुछ के जिम्मे साफ-सफाई तो कुछ को खाना बनाने के लिए मेस में ड्यूटी लगा दिया। जो मुखिया था उसी को उन सबों के काम-काज की देख-रेख के लिए मेस मैनेजर और सुपरवाइजर बना दिया। इस तरह साफ-सफाई और मेस का कार्य संचालित होने लगा। मैं दिन में गश्त करने लगा और शाम होते ही अपने मड़हेनुमा आवास में आराम करता। बारी-बारी से शातिर चोर बन्धु मेरी सेवा करते मसलन कोई मालिश करता तो कोई हाथ-पाँव दबाता और कोई हाथ का पंखा चलाता। यही सब मुझे भोजन देते और नहलाते-धुलाते। ऐसा करने से पूरी रात बीत जाती।
कुल मिलाकर मैंने इन चोरों को चोरी का मौका ही नहीं दिया, दिन को अमूमन चोरी होती नहीं, रात को चोर हमारी सेवा में रहते। बस हजूर इसके अलावा मैने कोई जादू नहीं किया। आई.जी. महाशय थानेदार ढिलढिल पाण्डेय की बातें सुनकर अति प्रसन्न हुए और अपने साथ लाए उस पत्र को उनके (थानेदार ढिलढिल पाण्डेय के) हवाले करते हुए कहा कि अब तुम ‘कोतवाल’ बना दिए गए हो। यह पत्र लो। दोनों पत्र एक प्रोन्नति वाला और दूसरा तबादला वाला। थानेदार पाण्डेय खुश, साथ ही पूरा थाना प्रसन्न हो गया। तो ऐसे थे थानेदार ढिलढिल पाण्डेय।

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