लेखक परिचय

निर्मल रानी

निर्मल रानी

अंबाला की रहनेवाली निर्मल रानी कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय से पोस्ट ग्रेजुएट हैं, पिछले पंद्रह सालों से विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में स्वतंत्र पत्रकार एवं टिप्पणीकार के तौर पर लेखन कर रही हैं...

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 case against lord ram (1)निर्मल रानी
अधिक से अधिक धन-दौलत अर्जित करना तथा सुख व समृद्धि हासिल करना निश्चित रूप से मानव जाति की एक बहुत बड़ी कमज़ोरी है। समाज में अधिकांश लोग ऐसे मिलेंगे जो ज़्यादा से ज़्यादा पैसा कमाने की कोशिश में दिन-रात लगे रहते हैं। धनवान बनने की यही प्रवृति इंसान को भ्रष्टाचार,जमाख़ोरी,रिश्वतख़ोरी,कालाबाज़ारी,तस्करी तथा अन्य कई प्रकार के अपराधों की ओर भी धकेल देती है। परंतु जो लेाग अपनी मेहनत व ईमानदारी से पैसे कमाकर धनवान बनते हैं निश्चित रूप से समाज ऐसे लोगों को मान-सम्मान देता है तथा अपने सर-आंखों पर बिठाता है। ऐसे लोगों के लिए ज़ीरो से हीरो बन जाने की कहावत भी इस्तेमाल की जाती है। परंतु गलत तरीके से धनवान बने किसी भी व्यक्ति को समाज भले ही उसके सामने कुछ न कहता हो परंतु उसकी चर्चा उसके पास-पड़ोस या उसके शहर में इस बात को लेकर ज़रूर होती रहती है कि आिखर अमुक व्यक्ति बिना किसी काम-काज के इतना धनवान कैसे बन गया? और जिस दिन ऐसे व्यक्ति की पोल-पट्टी खुल जाती है और वह कानून के शिकंजे में जकड़ जाता है उस समय उसकी सारी की सारी काली कमाई धरी रह जाती है और ऐसा व्यक्ति जेल की सलाखों के पीछे तो जाता ही है साथ-साथ उसे व उसके परिवार को बदनामी का सेहरा अलग पहनना पड़ता है।
धनवान बनने की लालसा की ही तरह समाज में शोहरत हासिल करने के लिए भी दुनिया दीवानी बनी रहती है। प्रसिद्धि या शोहरत के क्षेत्र में भी धनवान बनने की ही तरह दो रास्ते होते हैं। एक तो वह रास्ता जिसपर चलते हुए कोई भी व्यक्ति अपने कर्म,तपस्या,चरित्र,त्याग तथा अपनी अद्भुत कारगुज़ारियों के बल पर शोहरत हासिल करता है। ऐसे लोगों को समाज पूरा आदर व सम्मान देता है। तमाम ऐसे प्रसिद्धि प्राप्त लेागों को समाज आदर्श व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है तथा ऐसे लोगों की जीवन यात्रा व उनकी कारगुज़ारियों के
क़िस्से पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहते हैं। तमाम ऐसे लोग भी प्रसिद्धि के इस शिखर पर पहुंच चुके हैं जिनकी कहानियां व उनकी जीवन यात्रा व संघर्ष के क़िस्से पुस्तकों में प्रकाशित होते हैं तथा स्कूलों में छात्रों को सिर्फ़ इसलिए पढ़ाए जाते हैं ताकि बच्चों का ज्ञानवर्धन तो हो ही साथ-साथ बच्चे उनकी जीवन गाथा सुनकर स्वयं प्रेरणा भी हासिल कर सकें। ज़ाहिर है ऐसे लोगों ने सकारात्मक व रचनात्मक मार्ग पर चलते हुए शोहरत हासिल की है। इसे इन शब्दों में भी समझा जा सकता है कि ऐसे महान लोगों ने अपने जीवन में जो कुछ भी किया वह इस लक्ष्य को सामने रखकर हरगिज़ नहीं किया कि ऐसा करने से उन्हें प्रसिद्धि हासिल होगी। बल्कि उन्होंने अपने जीवन में अपने कारनामों,कारगुज़ारियों के दम पर ऐसा कर दिखाया कि शोहरत स्वयं उनकी मोहताज बन बैठी और दुनिया उन्हें मान-सम्मान तथा श्रद्धा की नज़रों से देखने लगी।
परंतु जिस प्रकार धनवान बनने के लिए मेहनत करने के बजाए कुछ लोग शार्टकट का रास्ता अपना कर धनवान बनना चाहते हैं उसी प्रकार प्रसिद्धि हासिल करने की गरज़ से भी बहुत से लोग आए दिन प्रसिद्धि के नए-नए टोटके इस्तेमाल करते रहते हैं। सिर्फ़ इसलिए ताकि उनके नाम से आम लोग परिचित हो सकें। यह लोग भी उस कहावत को चरितार्थ करते हैं जिसमें कहा गया है कि-‘बदनाम अगर होंगे तो क्या नाम न होगा’? ऐसे लोग यह भी नहीं सोचते कि उनके उल्टे-सीधे बेतुके व कुतर्कीय बयानों की वजह से उन्हें बदनामी का सामना भी करना पड़ेगा। ऐसी प्रवृति के लोग कई बार सार्वजनिक रूप से ऐसी बातें भी कह जाते हैं जिससे समाज में आक्रोश पैदा हो जाता है। कई बार इस प्रकार की बातें सामुदायिक या सांप्रदायिक अथवा जातिवादी संघर्ष का कारण भी बन जाती हैं। कहने को तो इस प्रकार की ऊट-पटांग,तर्कहीन तथा अनर्गल बातों को भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खाते में डाल दिया जाता है। परंतु हक़ीक़त में न तो यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान या उसकी सीमाएं होती हैं न ही शोहरत हासिल करने का उपयुक्त मार्ग। परंतु मीडिया में ऐसी बेतुकी बातें प्रकाशित होने के बाद मीडिया के इसी सहयोग से ऐसा व्यक्ति शोहरत हासिल करने के अपने घिनौने मकसद में कामयाब ज़रूर हो जाता है।भले ही इसके परिणामस्वरूप समाज में कितनी भी व्याकुलता क्यों न पैदा हो अथवा शोहरत हासिल करने की उसकी साजि़श के परिणामस्वरूप समाज को संघर्ष व दंगे-फ़साद का सामना क्यों न करना पड़े।
पिछले दिनों ऐसे ही आशय का एक समाचार बिहार के सीतामढ़ी जि़ले से प्राप्त हुआ। स्वयं को वकील बताने वाले एक व्यक्ति ने भगवान श्रीराम के विरुद्ध अदालत में एक मुक़द्दमा दायर कर दिया। उसने कुतर्क पेश किया कि भगवान राम ने एक धोबी के बहकावे में आकर अपनी पत्नी सीता पर अत्याचार करते हुए उन्हें घर से निकाल दिया। इस घटना को उस व्यक्ति ने त्रेता युग से ही प्रारंभ हुए स्त्री उत्पीडऩ की दलील से जोडऩे की कोशिश की। उसने तर्क दिया कि जब तक त्रेता युग की नारी को न्याय नहीं मिलेगा तब तक कलयुग की नारी को न्याय कैसे मिल सकता है? इस वकील ने भगवान राम के विवेक पर प्रश्र उठाते हुए यह आरोप लगाया कि अयोध्या के राजा राम ने मिथिला की बेटी के साथ न्याय नहीं किया। और चूंकि वह वकील भी मिथिला में ही पैदा हुआ है लिहाज़ा उस रिश्ते के तहत सीता का पैरोकार बनते हुए भगवान राम से सीता के लिए न्याय चाहता है तथा इसपर बहस भी करना चाहता है कि क्या भगवान राम ने सीता के साथ न्याय किया था या अन्याय? निश्चित रूप से किसी भी व्यक्ति द्वारा इस प्रकार के द्वेषपूर्ण राग छेड़े जाने की कोई भी व्यक्ति कभी कल्पना भी नहीं कर सकता था। यहां इस बहस में जाने की तो आवश्यकता ही नहीं कि त्रेता युग में भगवान राम ने सीता के साथ क्या किया,क्यों किया और उस समय की घटनाएं हमारे समक्ष क्या आदर्श प्रस्तुत करती हैं? आिखर कुछ बात तो ऐसी है जिसके चलते सभी देवताओं व भगवानों में अकेले भगवान राम को ही मर्यादा पुरुषोत्तम के नाम से याद किया जाता है। ऐसे में एक साधारण से अल्पबुद्धि व्यक्ति की जिसने भले ही वकालत पढक़र औपचारिक रूप से स्वयं को पढे-लिखों में शुमार क्यों न कर लिया हो, उसकी बिसात ही क्या है कि वह भगवान राम के किसी क़दम पर उंगली उठा सके या आपत्ति दर्ज कर सके?
इस घटनाक्रम को मीडिया में प्रकाशित करने के बाद उस वकील का शोहरत हासिल करने का वह मक़सद भी पूरा हो गया जिसके लिए उसने प्रसिद्धि पाने का यह शार्टकट टोटका इस्तेमाल किया था। सुनने में यह भी आ रहा है कि अब प्रसिद्धि का कोई दूसरा वैसा ही टोटकेबाज़ उस वकील पर मुकद्दमा करने जा रहा है जिसने भगवान राम पर मुक़द्दमा करने का प्रयास किया था। गोया एक सीता जी का हमदर्द बनकर स्वयं मशहूर होना चाह रहा था तो दूसरा भगवान राम का पैरोकार बनकर प्रसिद्धि प्राप्ति के मैदान में उतर आया। गोया सूत न कपास जुलाहों में लट्ठमलट्ठा। कहां त्रेता युग और कहां कलयुग। करोड़ों वर्ष पुरानी कथाओं को लेकर आज अदालत के दरवाज़े खटखटाने वाले लोगों को मंदबुद्धि अथवा आसामान्य बुद्धि वाले लोग कहा जाना चाहिए या नहीं? इसी प्रकार की और भी तमाम बातें अकसर समाचारों के माध्यम से सुनने को मिलती रहती हैं। कभी किसी धर्म के आराध्य को कोई बुरा-भला कहकर या  उनकी शान में अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल कर  कोई अंजान व्यक्ति रातों-रात प्रसिद्धि की मंजि़लें तय करने की कोशिश करता है तो कोई किसी अपराधी के सिर कलम करने की क़ीमत लाखों व करोड़ों रुपये घोषित कर अपने-आप को बहुत बड़ा सूरमा बताने का प्रयास करता है। भले ही उसके अपने बैंक खाते में एक हज़ार रुपये भी न हों परंतु केवल शोहरत हासिल करने के लिए ऐसा व्यक्ति यह बोलने से नहीं हिचकिचाता कि अमुक व्यक्ति का सिर क़लम कर लाओ और करोड़ों रुपये का पुरस्कार ले जाओ।
बिना कोई विशेष प्रयाास किए तथा बिना किसी सकारात्मक सोच-विचार या कारगुज़ारी दिखाए हुए शोहरत हासिल करने के और भी तमाम शार्टकट टोटके ख़ासतौर पर हमारे देश में अक्सर इस्तेमाल किए जाते हैं। कभी कोई ऐसा व्यक्ति जिसे भले ही उसके अपने मोहल्ले या शहर के लोग बुरी नज़रों से देखते हों तथा उसका चरित्र भी संदिग्ध क्यों न हो परंतु केवल प्रसिद्धि के लिए ऐसा व्यक्ति राष्ट्रीय स्तर का कोई संगठन बना बैठता है। कभी कोई आतंकवाद विरोधी संगठन के नाम से लोगों में प्रसिद्धि हासिल करने की कोशिश करता है, कभी कोई दुश्मन देश के झंडे जलाकर या किसी का पुतला फूंक कर प्रसिद्धि हासिल करना चाहता है। परंतु प्रसिद्धि का इस प्रकार का टोटका अपनाने वाले लोगों को यह बात भलीभांति समझ लेनी चाहिए कि ऐसे लोगों को उनके उलटे-सीधे कारनामों या अनर्गल बयानों की वजह से भले ही कुछ लोग जान क्यों न जाते हों परंतु समाज में उनकी एक नकारात्मक छवि भी बनती है और ऐसे लोगों को बदनामी,रुसवाई तथा अपमान के सिवा और कुछ नहीं हासिल होता। लिहाज़ा शोहरत के ऐसे टोटकों से लोगों को तो बचना ही चाहिए साथ-साथ मीडिया को भी चाहिए कि वह अपने समाचारों को मसालेदार बनाने की ख़ातिर ऐसे व्यक्तियों की बातों पर तवज्जो देना क़तई बंद कर दे।

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