लेखक परिचय

हिमांशु डबराल

हिमांशु डबराल

लेखक स्‍वतंत्र टिप्‍पणीकार व ब्लॉगर हैं।

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हिमांशु डबराल

सोच के देखिये की भारत में स्वतंत्र प्रेस न हो तो क्या होगा? चाइना जैसा हाल…? सोच के भी अजीब लग रहा है… सोशल मीडिया पर पाबन्दी और निगरानी की बात चल रही है…बड़े बड़े लोगों के बयान आ रहे है की इस पर पाबन्दी लगनी चाहिए…अब प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया पर पाबन्दी लग नही पाई तो सोशल मीडिया ही सही…इसके बाद सारी मीडिया पर पाबन्दी की बात सामने आ जाये तो चौकियेगा मत…

सबको पता है की तानाशाही वाले या गैर लोकंत्रिक देशों में मीडिया, खास तौर पर सोशल मीडिया पर पाबन्दी है…कई देशों में बड़े बड़े आंदोलनों के सफल होने के पीछे सोशल मीडिया बहुत बड़ा कारण रहा है…इसलिए कई देशों में फेसबुक ट्विटर या ब्लागस्पाट जैसी वेबसाइटें भी बैन हैं…लेकिन हमारे यहाँ तो लोकतंत्र है…सबको अपनी बात रखने का अधिकार है…सभी तरह की बातें होती रहती है…अरे भाई कुछ गलत हो रहा है तो उसका सही जवाब दीजिये…आपके बारे में अनर्गल प्रचार हो रहा है तो उसका खंडन कीजिये…जनता को उसी सोशल मीडिया के माध्यम से सच बता दीजिये…न बात बने तो कोर्ट तो कोर्ट तो हैं न..वैसे आप हिन्दुस्तानियों को इतना समझदार भी नही मानते की वो गलत, सही को पहचान सकें…??? वैसे तो कई लोग 90 % से ज्यादा हिन्दुस्तानियों को बेवकूफ मानते है…लेकिन अपन ऐसा नही सोचते…ये पब्लिक है सब जानती है…

वैसे जिन लोगों के कारण ये बात उठ रही है उनमें खुद सयंम की किमी है…तो मीडिया वाले क्या करें…अब बीवी के साथ नज़र आते तो निजता का हनन होता भी या चलिए इसे भी निजता मान लेते है…लेकिन बोल क्या रहे हो भाई….चपरासी या बाबु बनवा रहे होते तो चलता भी….सीधे जज बनवा रहे हो…प्रलोभन देकर किसी का शोषण कर रहे हो…और ये बात कानून के जानकर से बेहतर कौन जान सकता हैं की न्याय के मन्दिर को इस तरह से कलंकित करना लोकतंत्र में अक्षम्य अपराध है…क्यूंकि लोकतंत्र की अंतिम पहरेदार न्यायपालिका ही है..अब आपने अदालत का सहारा लेकर मीडिया में खबर भी नही आने दी तो खबर जनता तक कैसे पहुचती..सो मॉस मीडिया (सोशल मीडिया) ही सही…अब आपकी तथाकथित निजता के चलते सोशल मीडिया को बैन कर दें? तो मेहरबान-कदरदान-साहिबान…’सावधान’ हरकते ठीक करलो..वरना कहीं न कहीं से आपकी कर्म सामने आ ही जायेंगे…

वैसे तो हमाम में जितने भी नंगे है सबको बेनकाब होना चाहिए… और खबर बुरी हो या अच्छी खबर तो खबर होती है…जनता तक आनी चाहिए…हाँ तरीका भी सही होना चाहिए…लेकिन आप ये भी जान ले की सुचना क्रांति के इस दौर में खबर दब नही सकती…इनसब बातों को छोड़ भी दे और एक बार मान भी लें के मीडिया पर निगरानी राखी जाये…लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है की अगर कोई निगरानी या नियंत्रण करेगा भी तो वो कौन होगा और क्या गारंटी है की और बिना किसी दबाब के निर्णय लेगा? और सत्ता आसीन लोग उसे सही निर्णय लेने देंगे…??

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस की स्वतंत्रता पर नियंत्रण की बात सही नही है…भारत में लोकतंत्र के नाते स्वतंत्र प्रेस का होना बहुत जरुरी है…मुझे अल्बर्ट कामुस का एक कथन याद आता है की “A free press can, of course, be good or bad, but, most certainly without freedom, the press will never be anything but bad.” और सच में बिना स्वतंत्रता के प्रेस केवल और केवल बुरी ही होगी…

इस बात से इंकार नही किया जा सकता की आज के मीडिया में सुधार की बहुत आवश्यकता है…खास तौर पर सोशल मीडिया में…कूड़ा कबाड़ कंटेंट की भी भरमार है…लेकिन ये आपके ऊपर है की आप उस कूड़े में कितनी अच्छी चीज़े ढूंड सकतें है…जब आप टीवी के लिए कहते हैं की आपको कोई चैनल नही देखना तो चैनल चेंज कर दीजिये तो जो वेबसाइट आपको नही देखनी मत देखिये…कोई जबरदस्ती थोड़े न है…हाँ निजता(वास्तविक निजता) में कोई सोशल मीडिया या कोई भी मीडिया दखलंदाजी करता है तो उसके खिलाफ एक्शन तो लिया जाना चाहिए…या ऐसा कोई रास्ता निकलना चाहिए जिससे इस समस्या का समाधान हो…

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1 Comment on "अब भाई तुम्हारी निजता के चलते सोशल मीडिया बंद करदें…???"

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एल. आर गान्धी
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जब गैर लोग अपने निजी मोबाईल पर कुछ निजी चित्र मात्र निहारते पाए गए तो मनु जी मर्यादायों का बिगुल फूंकने लगे .. अब अपने निजी न्यायालय कक्ष में किसी विषकन्या को न्यायाधीश के सिंहासन पर बैठने का प्रलोभन दे कर देह शोषण करते पकडे गए तो ..हाए मेरी
निजता !

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