लेखक परिचय

वीरेन्द्र जैन

वीरेन्द्र जैन

सुप्रसिद्ध व्‍यंगकार। जनवादी लेखक संघ, भोपाल इकाई के अध्‍यक्ष।

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वीरेन्द्र जैन

इसमें कोई सन्देह नहीं कि हिन्दी व्यंग्य के भीष्मपितामह हरिशंकर परसाई ही माने जाते हैं किंतु गत शताब्दी के सातवें दशक में अपने व्यंग्य उपन्यास रागदरबारी के प्रकाशन के बाद श्रीलाल शुक्लजी ने अपनी कुर्सी परसाई जी के बगल में ही डलवा ली थी। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे कि मतभेद निराकरण कार्यक्रम में दो उपप्रधानमंत्री या दो उपमुख्यमंत्री बना दिये जाते हैं।

रागदरबारी आजादी के बाद स्थापित हुयी व्यवस्था में ग्राम्य जीवन की समीक्षा है। 1947 के बाद उत्तर भारत के गाँवों में जन्मी विसंगतियों को एक उपन्यास में समेट कर रख देना व पूरे उपन्यास में व्यंग्य की धार को सतत बनाये रखना बहुत कौतुकपूर्ण लगता है। एक दृश्य देखिये- ‘ऐसे भुखमरे वातावरण में अखाड़े क्या खा कर या खिला कर चलते? कुछ वर्ष पहले गांव के लड़के कसरत और कुश्ती से चूर-चूर होकर लौटते तो कमसे कम उन्हें भिगोये हुये चने और मट्ठे का सहारा था। अब वह सहारा भी टूटने लगा था। यह और इस प्रकार के बई तथ्य मिलकर कुछ ऐसा वातावरण पैदा कर रहे थे कि गांव में निकम्मा बन जाने के सिवाय और दूसरा कार्यक्रम ही नहीं मिलता था। वे फटे पुराने पर रंगीन पतलूनों पायजामों के सहारे अपनी दुबली पतली टांगों को ढक कर और सीने पर गोश्त हो या न हो, सीने के अंदर सायराबानू के साथ सोने का अरमान भर कर, गली कूचों में पान की पीक फैलाते हुये निरूद्देश्य घूमा करते थे। उनमें से बहुत से कभी कभी खेतों, कारखानों और जेलों के चक्कर भी लगा आते थे। जो वहाँ जाते हुये हिचकते थे, वे स्थानीय कालिजों में बांगड़ूपन की शिक्षा ग्रहण करने के लिए चले आते थे। ये कालेज प्राय: किसी स्थानीय जननायक की प्रेरणा से शिक्षा प्रचार के लिए, और वास्तव में उसके लिए विधानसभा या लोकसभा के चुनावों की जमीन तैयार करने के उद्देश्य से, खोले जाते थे, और उनका मुख्य कार्य कुछ मास्टरों और सरकारी अनुदानों का शोषण करना था। ये कालिज सिर्फ जमाने के फैशन के हिसाब से बिना आगा पीछा सोचे हुये चलाये जा रहे थे और यह निश्चय था कि वहॉ पढने वाले अपनी ‘रियाया’ वाली हैसियत छोड़ कर कभी ऊपर जाने की कोशिश नहीं करेंगे और ऊँची नौकरियाँ और व्यवसाय जिनके हाथ में है, उनके एकाधिकार को इन कालिजों से कोई खतरा पैदा नहीं होगा।”

रागदरबारी की लोकप्रियता और उस लोकप्रियता का गत चालीस साल से निरंतर बने रहना इस बात का प्रमाण है कि अच्छी पुस्तकों को किसी आलोचक या पुरस्कार दिलाने वाले दलाल की आवश्यकता नहीं होती। रागदरबारी के लेखक को जो पुरस्कार मिले हैं, वे दरअसल पुरस्कार देने वालों को उन्हें देने पड़े हैं,ं वरना उनके पुरस्कारों और उनकी चयन समितियों की इज्जत मिट्टी में मिल जाती जिससे मिट्टीी की इज्जत के खराब होने का खतरा पैदा हो जाता। राग दरबारी का लेखक पूरी तटस्थता के साथ बिना किसी राग के परिवेश का अवलोकन करता है। वह परंपरागत दोषों को भी अपना होने के नाम से सराहता नहीं है अपितु उनकी भी खिल्ली उड़ाता है। उदाहरणार्थ- औरतें चिचिया रहीं थीं जिसे अगर कोई आकाशवाणी वाला सुन लेता तो कहता कि लोकगीत गाया जा रहा है।

आम तौर पर अफसरों को लेखक की तरह प्रतिष्ठित होने में सामान्य लेखक से अधिक श्रम लगता है क्योंकि आजकल टुच्चे किस्म के लालची, चारणवृत्ति के चापलूस आलोचक अफसरों की रचनाओं का ऐसा महिमामंडन करने लगे हैं कि आम पाठकों को उबकाई आने लगती है इसलिए आम पाठक अफसरों की रचनाओं को प्रथम दृष्टया गम्भीरता से नहीं लेते। बहुत सारे अफसरों को तो अच्छी रचनाओं के बाबजूद अपनी पहचान बनाने में इसी कारणवश कठिनाई आती है। पर श्रीलाल जी की रागदरबारी को जिसने भी पढा वह उसके कथ्य और प्रस्तुतीकरण को दूसरों के साथ बांटने को उतावला हो गया। मैंने स्वयं न जाने कितनी बार ‘रागदरबारी’ की प्रतियाँ खरीद व दूसरों को भेंट में देकर उससे अधिक का धन्यवाद बटोरा है जितना उसी मूल्य की दूसरी कोई वस्तु उपहार में देने पर नहीं मिलता। ‘रागदरबारी’ की मेरी कई प्रतियॉ चुरायी गयीं और पढने के लिए दी गयी कई प्रतियाँ वापिस नहीं लौटायी गयीं। गाँव में रहने वाले मित्रों में से प्रत्येक ने अपने गाँव में कोई न कोई वैद्यजी रूप्पन रंगनाथ बेला और लंगड़ पहचान लिये, जो देश के लाखों शिवपालगंजों में अब भी लगातार विचरण कर रहे हैं।

मेरा एक मित्र ‘रागदरबारी’ को इस मायने में क्रांतिकारी उपन्यास मानता है क्योंकि वह पूरी व्यवस्था के प्रति गहरी घृणा बोता है। पूरे उपन्यास में कहीं भी आशा की कोई किरण नजर नहीं आती। लेखक को गाँव, व्यवस्था, लोगों के चरित्रों आदि किसी में भी भरोसा नहीं रहा है। अब गांवों में पाखंड ढोंग विसंगति कामचोरी, काइयांपन आलस्य हरामखोरी गंदगी के सिवा कुछ भी नहीं है। वह जिसकी भी पूंछ उठाता है वही मादा निकलता है। रागदरबारी पढने के बाद गाँव और देश का गुण गाने वाले गीत तक हास्यास्पद लगने लगते हैं। ‘अहा ग्राम्यजीवन भी क्या है’ जैसी कविताएं बचकानी लगने लगती हैं। पाठक अपनी और समाज की विवशता पर हँसता सा लगता है पर यही निरीहता उसमें व्यवस्था बदलाव की एक बेचैनी पैदा करती है। रागदरबारी पढने के बाद कोई ये कहता नहीं मिला कि इसमें गाँव का सही चित्रण नहीं है या जो भी कुछ हो रहा है ठीक हो रहा है।

गॉवों पर थोपी गयी नैतिकता की असलियत का जो पर्दा श्रीलालशुक्ल ने उठाया है उसके पीछे तो सभी ने झांका हुआ था पर सच सच कहने का साहस केवल उन्होंने ही उठाया हुआ है। महिलाओं के बराबरी पर आने के प्रयास में पहला हमला उसके चरित्र पर ही किया जाता है और अपनी लोलुपता में सब नैतिकतावादी उस पर भरोसा करके मानस मैथुन करते रहते हैं।

”- हैs! दिल्लगी मत करो! गम्भीर बात को हंसी में मत उड़ाओं। हम रसिकों को रेत में न खिचेड़ो। चोला छोड़ेगी तो अपने पति के संग ही। उससे पहले नहीं मरेगी। औरत बड़ी सख्तजान होती है। सती भी कहाँ होना चाहती है, वो तो धरम करम का कोड़ा पड़ता है, नहीं तो……। वैद्यजी रूआंसे हो कर बोले, अजी अब कहाँ धरम करम, सती धर्म की तो ऐसी तैसी हो गयी। पति मरते ही रोजगार को भागती है। कुसहर ने कहा, चुप रहो वैद्यजी। हाँ, खुद ही तो कहते हो कि रांड़ें रोती नहीं और तुम खुद पुरानी रांड़ों की तरह रो रहे हो। बुलाओ अपने शनीचर फटीचर को, बड़ा गंजहा बना फिरता था, साले की कमर पर लात मार कर बेला शिवपालगंज की प्रधान बन गयी। सपने में भी ऐसा सोचा था? यह बुरा समय देखने को ही तुम उम्र का सैकड़ा पार कर गये।

प्रभुमाया! वैद्यजी कराहे। लड़की कभी गली में नहीं निकली थी। कुसहर हँसा, वैद्यजी हाँ, रूप्पन और रंगनाथ छतो- छतों आ कर ही रस चूस लिए।

-वैद्यजी सच्ची बात बताऊँ? नंगा आदमी नंगई पर खुल्लम खुल्ला आ गया है, बेला को खूंटे से छुड़ा कर क्या ले गया, पूरा सत निचोड़ कर पी रहा है। आगे बढ कर बोला, बेला प्रधानी हथिया ले, सम्भाल मैं लूंगा। जैसे तुझे सम्भाल लिया।

ग्राम्य जीवन पर जो भी उपन्यास और कहानियाँ लिखी गयी हैं उनमें रागदरबारी सर्वाधिक यथार्थवादी उपन्यास है और उसे उसी तरह का महत्व हासिल है जो कि गोदान और मैला आंचल को है पर इसमें व्यंग्य इसके गेटअप को ज्यादा चमक देता है और ज्यादा पठनीय बनाता है (भले ही उसके आकर्षण में उसके महत्वपूर्ण कथ्य के उपेक्षित रह जाने का खतरा भी रहता है]।

उनके व्यंग्य की तुलना केवल पाकिस्तान के उर्दू लेखक मुश्ताक अहमद यूसुफी से ही हो सकती है पर यूसुफी के पास भी कथानक की कमी होती है। शुक्लजी की विशेषता यह है कि रागदरबारी अपने आप में एक स्वतंत्र उपन्यास है जो व्यंग्य में ऐसे डूबा है जैसे कि चाशनी में जलेबी डूबी रहती है तथा अपनी मिठास के बाबजूद एक अलग शक्ल और रंगरूप से अपनी पहचान रखती है। यदि दोनों की तुलना की जाये तो हम कह सकते हैं कि श्रीलालजी जलेबी बनाते हैं जिसके लिए चाशनी की जरूरत पड़ती है जबकि यूसुफीजी के पास चाशनी का भंडार है जिसे खपाने के लिए वे उसी मात्रा में मिष्ठान्न बना रहे होते हैं।

 

 

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4 Comments on "श्रीलाल शुक्ल और रागदरबारी"

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GGShaikh
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यह में २०११ की ही कह रहा हूँ… घनघोर विपन्नता से भभूका हमारा पैसा प्रेम, छोटे-छोटे ओहदों का थ्रील.. शहरी आफिसों में जिनकी कोई आवाज़ न थी वह कस्बे में अपनी सोसाइटी के प्रमुख बन बैठे…धार्मिक आदेशों के मुताबिक़ सोसाइटी का काम चलाए…उन्हें सब इसलिए सहे क्योंकि वह अपने वाला है जिससे अपनी ही जाती का वर्चस्व बना रहे…उन्हें कोई मौलिक विचार कभी न आए न कुछ सोसाइटी का नया काम करवाए…संमूढ़ से बूढ़े…न टाईम पास हो, न घरवाले ही सहे…धार्मिक क्रियाकांडों में मन बे मन लगे रहे… (यह तो रहा एक पहलू हमारे समाज जीवन का). हमारे लोग कौटुम्बिक… Read more »
अखिल कुमार (शोधार्थी)
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बहुत बहुत साधुवाद वीरेन्द्र सर, राग दरबारी मेरे जीवन में पढ़े गए कुल १३५ (अब तक) उपन्यासों में गोदान के बाद सर्वश्रेष्ट है…..इस पायदान में तीसरे स्थान पर मैंने ”रानी नागफनी की कहानी” (परसाई जी कृत) को और चौथे स्थान पर ”काशी का अस्सी को रखा है………….इश्वर ही जानता है की इन कृतियों को जितनी बार पढता हु उतनी बार नया आनंद, ऊर्जा, और जीवनी मिलती है……..ऐसी कृतियाँ ना हो तो हम करुना के बोझिले और वियोग श्रृंगार के सुबकते रसों से साहित्य को कितना बोझिल और एकरसी पाते हैं न

श्रीराम तिवारी
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राग दरवारी को जिसने नहीं पढ़ा वह हिंदी साहित्य के क्लासिक व्यंग्य की पराकाष्ठा के साक्षात्कार से वंचित है.जिस चुनाव प्रक्रिया का वर्णन ‘राग दरवारी ‘में है उसका में प्रत्यक्ष दृष्टा हूँ आज भी अधिकांश उत्तर भारत और न केवल उत्तर भारत बल्कि पूरा भारतीय उप महादीप -शानिचरों,छोटेलालों,बद्री पहलवानों,वेलाओं,वेद्यजीओं से भरा पड़ा है.राग दरवारी में प्रिसपाल और वाइस प्रिन्स्पाल का रोचक संघर्ष आज पूरे देश में पसरा पड़ा है.

विजय
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‘राग दरबारी’ की सबसे सशक्त चीज उसकी भाषा है। उस से हिन्दी की आंतरिक सामर्थ्य का एक और रूप उजागर होता है। जहाँ तक कथ्य की बात है तो उसमें अनेक कमियाँ भी हैं। जैसे, इस कथन का सामान्यीकरण सही नहीं कहा जा सकता कि “औरतें चिचिया रहीं थीं जिसे अगर कोई आकाशवाणी वाला सुन लेता तो कहता कि लोकगीत गाया जा रहा है।” ऐसे खिल्ली उड़ाने वाले व्यंग्य का एक नकारात्मक पक्ष भी है। वह लेखकों, पाठकों में रचनात्मक भाव नहीं जगाता। लेखन की वास्तविक चुनौती और अधिक सार्थक योगदान तभी है जब वह कोई ठोस प्ररेणा दे सके।… Read more »
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