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प्रवक्‍ता ब्यूरो

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हरिकृष्ण निगम

अंग्रेजी में एक लोकप्रिय कहावत है कि जो तलवार के बल पर जीवित रहता है वह तलवार के बार से ही मरता भी है। पाकिस्तान में कुछ अरसे से यह लोकोक्ति चरितार्थ हो रही है। हिंसा और आतंकवाद के पोषक एवं निर्यातक देश पिछले कुछ वर्षों से अतिरेकी हादसों व विस्फोटों का स्वयं शिकार बना हुआ है और जिसके कारण कराची और उत्तर-पश्चिम के कुछ शहरों को आज दुनियां के सर्वाधिक ज्वलनशील और खतरनाक स्थानों में गिना जा रहा है। इस स्थिति के कारण अमेरिकी सहित कुछ पश्चिमी देशों के सुरक्षा विशेषज्ञ एवं विश्लेषक उसके ढहते आस्तित्व पर ऐसी पटकथाएं भी खुल कर प्रचारित कर रहे हैं जैसे उसका विघटन या सीमाओं का पुनर्रचित मानचित्र भी अनेक नए दबावों के परिप्रेक्ष्य में जल्दी ही एक यथार्थ बन सकता है।

पहले यह समझा जाता था कि यह किसी संभावित स्थिति की भूराजनीतिक रूपरेखा या उसका मात्र सैध्दांतिक अभ्यास हो सकता है। पर आज यह वर्तमान सीमाओं के अध्ययन की भावी परिकल्पना मात्र रह गई है। ‘न्यूयार्क टाईम्स’ में हाल के प्रकाशित एक समाचार के अनुसार दक्षिण एशिया के एक नए प्रदर्शित मानचित्र में पाकिस्तान टुकड़ों में कटा हुआ दिखाया गया है जिसमें उसके भू-भाग की एक लंबी पट्टी ही बची हुई है। इस विघटित दीमक खाए जैसे पाकिस्तानी मानचित्र के प्रकाशन के बाद इस्लामाबाद के सैनिक संस्थानों में हड़कंप मच गई है। पहले यह मानचित्र मूल रूप से ‘आर्म्ड फोरसेज जनरल’ में राल्फ पीटर्स के एक लेखके साथ छपा था जिसका शीर्षक था ”ब्लड बार्डर्स : हाउ ए बेटर मिडिल ईस्ट वुड लुक”। विशेषज्ञों की इस तरह की टिप्पणियों से पाकिस्तान सैनिक संस्थान चिंतित है और इसमें षड़यंत्र की बू पाकर भारत और अफगानिस्तान के मंतव्यों पर भी संशय करने लगे हैं कि वे एक अमेरिकी साजिश एवं दुरभि संधि के माध्यम से उनके देश को, जो आणविक शक्ति-युक्त अकेला मुस्लिम देश है, नष्ट न कर दें।

पाकिस्तान के सिकुड़ते हुए भावी मानचित्र को लेकर कुछ दिनों पहले जब अफगानिस्तान में अमेरिकी सैन्य बलों के प्रमुख जनरल डेविड मैककीरने ने इस्लामाबाद गए थे तब पाकिस्तान मेें संसद के 70 सदस्य अमेरिकी राजदूत एन. डब्लू. पैटर्सन के आवास पर उनसे मिलने गए और जानना चाहते थे कि कहीं क्षेत्रीय राजनीति में अमेरिकी दृष्टिकोण में अंतर तो नहीं आ गया है। लोग जानना चाहते हैं कि क्या अमेरिका भी पाक को खंडित करना चाहता था? पिछले पांच दशकों से अधिक अमेरिका का राजनीतिक सहयोग और उसका क्षेत्र की भूराजनीतिक गतिविधियों का विश्वसनीय केंद्र होने पर भी अमेरिका ऐसा क्यों चाहता है? इस पर तरह-तरह के अनुमान लगाए जा रहे हैं। एक ओर ओबामा प्रशासन पाक से आतंकवाद विरोधी अभियान में अधिक सहयोग चाहता है दूसरी ओर अमेरिका के दूरगामी हितों पर भी उसकी दृष्टि बराबर है जहां सभी पाकिस्तानी प्रशासन को ‘अराजक’ राज्य या अंतर्राष्ट्रीय अपराधियों का उद्गम एवं उद्यम तक कह चुके हैं।

यह भी स्पष्ट है कि पाकिस्तान भारत अमेरिकी आणविक समझौते के साथ बढ़ते भारत-अफगान सहयोग पर बौखला रहा है। मानचित्र में उसका कुछ पूर्वी भाग भारत के साथ और पश्चिम में उसका एक बड़ा हिस्सा अफगानिस्तान में दिखाया गया है। पाकिस्तान के चारो प्रांतों में पंजाब के वर्चस्व और जनजातीय विभाजन में ‘फाल्टलाईन्स’ और सिंध के पुराने आंदोलन के कारण विभिन्न क्षेत्रों में देश को बांधने वाला कोई सूत्र नहीं हैं। उसकी एकता का सिर्फ एक कारण भारत विरोध व धर्मांधता को लगातार हवा देना रहा है। इसीलिए अलकायदा अथवा तालिबान पर अंकुश लगाने के प्रयासों का दावा मात्र छलावा रहा है।

सन् 2005 के प्रारंभ में भी अमेरिकी गुप्तचर एजेंसी सी.आई.ए. ने कुछ चौंकाने वाले निष्कर्ष और आकलन प्रकाशित किए थे जिसमें सन् 2015 तक पाकिस्तान के टुकड़े होने की बात थी। उसकी नींव हिलाने वाले कारणों के परमाणु आयुधों पर तालिबान के संभावित नियंत्रण और बलूचिस्तान, पख्तूनिस्तान एवं सिंध में चले आ रहे आंदोलन का तेज होना कहा जा गया था। यह रिपोर्ट जो राष्ट्रीय खुफिया परिषद्-नेशनल इंटेलीजेंस काउंसिल और सी. आई. ए. ने संयुक्त रूप से जारी की थी उसमें पाकिस्तान में अंतप्र्रांतीय प्रतिद्वंदिता, गृहयुध्द और कट्टरवादियों का अणु-आयुधों पर नियंत्रण दुनियां के लिए एक खतरे के रूप में चित्रित किया गया था। इसी रिपोर्ट में पाकिस्तान के इंगलैंड में रहे पूर्व उच्चायुक्त वाजिद शम्सुल हसन को उध्दृत करते हुए कहा गया था कि यह देश कब और कै से युगोस्लाविया जैसा बन जाएगा। सी.आई.ई. के पूर्व निदेशक जार्ज टेनेट ने भी यही बात काफी पहले कही थी। अमेरिकी नौसेना की गुप्तचर एजेंसी के निदेशक लोबेल जैकोबी ने भी अमेरिकी सीनेट की सुरक्षा संबंधी सेलेक्ट कॉमेटी में कहा था कि पाकिस्तान क्योंकि लीबिया, ईरान और उत्तरी कोरिया के आणविक कार्यक्रमों का सूत्रधार रहा है इसलिए उससे कोई सहानुभूति दिखाना अमेरिका को स्वयं धोखा देना होगा। कुछ भी हो आज लगता है पुरानी भविष्यवाणियां या विशेषज्ञों के निष्कर्ष पाकिस्तान को कहीं का नहीं छोड़ेंगे क्योंकि स्वात घाटी और पेशावर तक अतिरेकियों का असली कब्जा है, सरकार का नहीं।

* लेखक अंतर्राष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ हैं।

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