लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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-सतीश सिंह

तेज शहरीकरण की आपाधापी में इंसान उन बुनियादी तथ्यों को भूल चुका है जो प्रकृति द्वारा प्रदत्ता संसाधनों की हदों से वास्ता रखते हैं। जमीन इंसान की तरह अपनी आबादी को नहीं बढ़ा सकती। इस वास्तविकता को इंसान समझने के लिए आज भी तैयार नहीं है। छोटे से लेकर बड़े शहरों में दनादन टाऊनशिप बनाये जा रहे हैं। प्रत्येक अखबार में टाऊनशिप के बड़े-बडे विज्ञापन आ रहे हैं। वह भी सभी तरह की सुविधाओं को एक ही जगह पर मुहैया करवाने के कॉरपोरेट वायदों के साथ।

जमीन पर मालिकाना हक जमाने की दीवानगी इस कदर इंसान पर हावी है कि वह लगातार शहर से सड़क या रेल मार्ग से जुड़े हुए नजदीक के गाँवों को तेजी से शहर में तब्दील करता जा रहा है। जिस जमीन पर कभी सोने जैसी फसलों का पैदावार होता था, वहाँ आज वातानुकूलित मॉलों में तरकारी और अनाज बेचे जा रहे हैं। मॉल की वजह से जिस खेत की कीमत कभी लाख-दो लाख हुआ करती थी, उसकी कीमत आज करोड़ों और अरबों हो गई है। आश्‍चर्यजनक तथ्य यह है कि विकास का यह चक्र कब अपनी पारी को पूरा कर लेता है, इसका अहसास तक एक आम आदमी को नहीं हो पाता है। दलालों के इस देश में इसे बिजनेस कहा जाता है तथा जो इसे समझने में असमर्थ है, उसे मुर्ख व कमअक्ल की संज्ञा से नवाजा जाता है।

आजकल हमारे देश में पूरा जोर सड़कों को टू लेन से लेकर ऐट लेन तक बनाने पर है। सड़क ज्यादा से ज्यादा चौड़ा हो सके इसके लिए फुटपाथ की संकल्पना को भी खारिज कर दिया गया है। हालात ऐसे हो गये हैं कि हर तरफ कंक्रीट का जंगल पनपने लगा है।

विकसित शहर में हर वस्तु की अधिक कीमत चुकानी पड़ती है। खाने-पीने की चीजों से लेकर हर उपभोग वाली वस्तुओं की कीमत कस्बानुमा शहरों से अधिक होती है। सारा काम यहाँ प्रायोजित तरीके से किया जाता है।

इसतरह के शहरों में छाया की तो जरुरत होती है, लेकिन पेड़ों की नहीं। बाईयों के बिना यहाँ के रहवासियों का काम नहीं चलता है, परन्तु झुग्गी-झोपड़ी से उनको सख्त नफरत है। भले ही लगातार दोहन से भूजल का स्तर पाताल में चला गया हो, लेकिन यहाँ के निवासी बिना पश्‍चाताप के निरंतर धरती माँ के साथ बलात्कार करते रहते हैं। ऐसी प्रवृत्ति वाले इंसानों ने ही दिल्ली में यमुना मैया को नदी से नाला बना दिया है।

विचारहीनता की स्थिति में और पुराने शहरों के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को अमलीजामा पहनाने के नाम पर सड़क से सटे मकानों को तोड़कर सड़क की चौड़ाई को बढ़ाया जा रहा है। इतना ही नहीं सड़क के किनारों पर अवस्थिति फुटपाथों को तोड़कर, वहाँ पर अपनी दुकान के सहारे अपना जीवन बसर करने वाले गरीबजनों को भी, उनकी आजीविका से महरुम किया जा रहा है।

आज या तो फुटपाथ के लिए कोई स्थान नहीं है, यदि कहीं है भी तो वहाँ जगह इतनी कम है कि दुकान को ठीक से वहाँ नहीं चलाया जा सकता। इस तरह की प्रतिकूल परिस्थिति में पार्किंग की बात करना ही बेमानी है।

अगर कहीं फुटपाथ को एक निश्चित योजना के तहत विकसित भी किया गया है तो वहाँ पर बेरिकेडिंग की व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे आम नागरिक की जान हमेशा सांसत में बनी रहती है। ट्रैफिक और गाड़ियों की ऑंखमिचौली में प्रति दिन पूरे देश में दहाई की संख्या में आमलोग असमय ही काल के ग्रास बन जाते हैं।

हमेशा सड़कों पर मरम्मत तथा खुदाई का कार्य चलते रहने के कारण कोई न कोई दुर्घटना घटित होती ही रहती है। हद तब हो जाती है, जब इसतरह का सारा काम बिना किसी चेतावानी वाला बोर्ड लगाये हुए किया जाता है। आधे-अधूरे विकास की अवस्था में, अभी भी भारत के तथाकथित विकसित शहरों में स्ट्रीट लाईटों की स्थिति दयनीय है। रोशनी से महरुम सड़क हमेशा दुर्घटना को आमंत्रित करता है। ऊपर से सड़कों पर बने बेतरतीब ब्रेकर हालात को बद से बदतर बना देते हैं।

दूसरी महत्वपूर्ण कमी इस मामले में व्यस्तम सड़कों पर पैदल मार्ग का नहीं होना है। खास करके चौराहों पर। कहीं -कहीं जेब्रा क्रासिंग तो रहते हैं, पर ज्यादतर उन पर दो और चार पहिया वाहनों का कब्जा रहता है। ये वाहन कभी भी पैदल चलने वालों का ख्याल नहीं रखते हैं। लिहाजा हमेशा दुर्घटना की संभावना बनी रहती है।

स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि शहरों में आज न तो खेल के मैदान हैं और न ही बाग-बगीचे व पार्क। कब्रिस्तानों तक को नहीं छोड़ा है इंसानों ने। वहाँ भी आकाश को छूती बड़ी-बड़ी इमारत बन चुकी है।

शादी-ब्याह, उत्सव और शोक सभाओं में शामिल होने तक के लिए जगह नहीं बची है। इस कारण अब शादी-ब्याह से लेकर शोक सभा तक सड़कों पर होने लगे हैं। धरना-प्रदर्षन के लिए भी लोग सड़कों का सहारा लेने लगे हैं।

आज भी धरना-प्रदर्शन असंतोष जाहिर करने का सबसे सशक्त माघ्यम है। इसका सहारा लेकर लोग-बाग अपने दिल की भड़ास को बाहर निकाल देते हैं, जिसके कारण भविष्य में घटित होने वाली बड़ी- बड़ी घटनाएँ अपने अंजाम तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देती हैं।

फिलवक्त बच्चे शारारिक खेल की बजाए कमरे में बंद होकर खेल खेलना पंसद करते हैं। टेलीविजन उनका सबसे बड़ा साथी बन चुका है। टेलीविजन के बाद उनका सबसे गहरा रिश्‍ता कम्पयूटर के साथ है। इसके कारण बच्चों में कई तरह की बीमारियाँ पनप रही हैं। टेलीविजन और कार्टून वाले कार्यक्रमों की वजह से बच्चे हादसों का भी शिकार बन जाते हैं। अभी हाल ही में एक बच्ची ने खेल-खेल में भोपाल में फांसी लगा लिया था।

शहरीकरण का उद्देश्‍य है संसाधनों से युक्त सुविधा को इंसानों को मुहैया करवाना, पर यहाँ ध्यान रखने वाली बात यह है कि इन सुविधाओं का उपभोग करने के लिए आज इंसान को न्यूनतम पचास हजार प्रति माह आय की जरुरत है, लेकिन यहाँ सवाल यह उठता है कि विकास की इतनी बड़ी कीमत चुकाने की हैसियत भारत में सभी के पास है क्या?

आधारभूत संरचना में क्रमिक रुप से सुधार लाना बेहतर तरीके से जीवन जीने के लिए सबसे पहली शर्त है, किन्तु आधारभूत संरचना का पर्याय यहाँ पर सिर्फ चौड़ी, साफ-सुथरी और चिकनी सड़क के साथ टाऊनशिप व गगनचुंबी इमारते नहीं हैं। पड़ताल से स्पष्ट है कि हेमामालिनी के गालों जैसी चिकनी सड़कों पर कभी भी साइकिल नहीं चलाया जा सकता और न ही टाऊनशिप व गगनचुंबी इमारतों में गरीबों का प्रवेश हो सकता है।

सच कहा जाये तो इनसे अलग हटकर गरीबों की एक दूसरी ही दुनिया है, जहाँ वे खुले आकाश के नीचे रहते हैं और दो रोटी पाने की जद्दोजहद में वे एक-दूसरे का खून तक बहाने से गुरेज नहीं करते। अस्तु लोकतांत्रिक देश में उनका तो ख्याल रखा ही जाना चाहिए।

सभी को बेहतर सुविधा मिले, इससे किसी को कोई तकलीफ नहीं है। आधुनिक तरीके से शहरीकरण की प्रक्रिया को भी आगे बढ़ाया जा सकता है, परन्तु इस पूरी कवायद में कुदरती संसाधनों की सीमाओं और उन गरीबों का भी जरुर ध्यान रखा जाना चाहिए जो दो जून की रोटी पाने के लिए रोज संघर्ष करते हैं।

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