लेखक परिचय

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

डॉ. कुलदीप चन्‍द अग्निहोत्री

यायावर प्रकृति के डॉ. अग्निहोत्री अनेक देशों की यात्रा कर चुके हैं। उनकी लगभग 15 पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। पेशे से शिक्षक, कर्म से समाजसेवी और उपक्रम से पत्रकार अग्निहोत्रीजी हिमाचल प्रदेश विश्‍वविद्यालय में निदेशक भी रहे। आपातकाल में जेल में रहे। भारत-तिब्‍बत सहयोग मंच के राष्‍ट्रीय संयोजक के नाते तिब्‍बत समस्‍या का गंभीर अध्‍ययन। कुछ समय तक हिंदी दैनिक जनसत्‍ता से भी जुडे रहे। संप्रति देश की प्रसिद्ध संवाद समिति हिंदुस्‍थान समाचार से जुडे हुए हैं।

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shyama prasad mukhejeeडा० कुलदीप चन्द अग्निहोत्री

१९५२ में भारतीय जनसंघ का गठन करते समय डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने एक वैक्लपिक वैचारिक राजनीति के लिये प्रयास किया था । पंडित नेहरु ने अपने राजनैतिक स्वार्थों के लिये देश विभाजन स्वीकार कर लेने के बाद भी उन्हीं नीतियों को जारी रखने की क़सम खाई हुई थी , जिनके चलते भारत विखंडित हुआ था और अंग्रेज़ी शासक पाकिस्तान का निर्माण करने में सफल हुये थे । अंग्रेज़ों की योजना असम समेत पूरा बंगाल पाकिस्तान में शामिल करने की थी । यदि इसमें वे कामयाब नहीं होते तो उन्होंने वैकल्पिक षड्यंत्र भी तैयार किया हुआ था जिसमें बंगाल को स्वतंत्र देश के रुप में स्थापित करना था । ज़ाहिर है यह स्वतंत्र बंगाल बाद में पाकिस्तान में शामिल हो जाता । उस समय कांग्रेस दिल्ली में सत्ता मिल जाने की संभावना से ही इतना प्रसन्न थी कि उसकी ,मुस्लिम लीग और ब्रिटेन के इस षड्यंत्र को नाकामयाब करने में कोई रुचि नहीं थी । इसका श्रेय गोपीनाथ बरदोलाई और डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी को जाता है कि उन्होंने असम को तो पाकिस्तान में जाने से बचाया ही , पश्चिमी बंगाल को भी पाकिस्तान में शामिल करवाने की साज़िश नाकामयाब की । तभी बाद में किसी ने कहा था कि अंग्रेज़ों ने मुस्लिम लीग के साथ मिल कर , कांग्रेस की सत्ता लोलुपता को भाँप कर , भारत का विभाजन किया लेकिन डा० मुखर्जी ने नहले पर दहला मारते हुये पाकिस्तान का ही विभाजन करवा दिया । पूर्वी बंगाल पाकिस्तान का हिस्सा बन गया लेकिन लेकिन डा० मुखर्जी की आशंकाएं सही निकलीं । पूर्वी बंगाल के भारत से अलग होते ही मुस्लिम लीग ने वहाँ की सरकार से मिल कर हिन्दुओं को खदेड़ना शुरु कर दिया । उनकी सम्पत्ति को लूटना शुरु कर दिया और लड़कियों का अपहरण शुरु हो गया । पूर्वी पाकिस्तान , जो उन दिनों पूर्वी बंगाल भी कहलाता था, के हिन्दुओं के सामने एक ही विकल्प था कि वे या तो इस्लाम स्वीकार कर लें या फिर अपनी मातृभूमि छोड़ दें । पूर्वी बंगाल में मानों एक बार फिर से मुग़ल वंश का शासन आ गया हो । डा० मुखर्जी उन दिनों नेहरु के मंत्रिमंडल में उद्योग मंत्री थे । महात्मा गान्धी के आग्रह पर सत्ता हस्तांतरण के समय शुद्ध कांग्रेसी सरकार न बना कर दिल्ली में राष्ट्रीय सरकार का गठन किया गया था । उसी कारण से डा० मुखर्जी मंत्री बने थे । मुखर्जी ने नेहरु से आग्रह किया कि भारत सरकार पाकिस्तान से बंगाली हिन्दुओं का नर संहार और मतान्तरण बंद करने के लिये कहे । यदि पाकिस्तान बंगाली हिन्दुओं को अपने यहाँ से खदेड़ना बंद नहीं करता तो पूर्वी बंगाल से निष्कासित लोगों की संख्या के अनुपात से वहाँ की ज़मीन पुनः भारत में शामिल की जाये । परन्तु पश्चिमी अवधारणाओं के समर्थक नेहरु के लिये शायद मतान्तरण कोई विषय ही नहीं था । उनकी चलती तो वे शायद पूर्वी बंगाल के सभी हिन्दुओं को मतान्तरित होकर प्राण रक्षा की सलाह भी दे देते । नेहरु ने पूर्वी बंगाल के हिन्दुओं की रक्षा करने की बजाय पाकिस्तान के उस समय के प्रधानमंत्री पर ही भरोसा करना ज़्यादा ठीक समझा । नेहरु की इसी शुतुरमुर्गी नीति से आहत होकर मुखर्जी ने मंत्रिपरिषद से त्यागपत्र दे दिया था ।
डा० मुखर्जी शायद उसी समय समझ गये थे कि यदि भारत की सांस्कृतिक धरोहर की रक्षा करनी है और शासन को भारतीय मूल्यों के अनुसार ढालना है तो नेहरु की पश्चिमोन्मुखी कांग्रेस के मुक़ाबले भारतोन्मुखी शक्तियों को संगठित करना होगा । १९५२ में डा० मुखर्जी ने इसी लम्बी योजना को ध्यान में रखते हुये भारतीय जनसंघ का गठन किया था । जनसंघ के गठन के तुरन्त बाद ही मुखर्जी से जम्मू कश्मीर के लोग मिले । नेहरु जो प्रयोग पूर्वी बंगाल में कर रहे थे लगभग वैसे ही प्रयोग वे जम्मू कश्मीर में भी कर रहे थे । अलबत्ता जम्मू कश्मीर में वे और भी दो क़दम आगे बढ़े हुये थे । उनके मित्र शेख़ अब्दुल्ला भारत के भीतर एक शुद्ध इस्लामी प्रान्त स्थापित करना चाहते थे । उनको लगता था कि ऐसा जम्मू कश्मीर रियासत में ही संभव था । वैसे अब्दुल्ला चाहते तो जम्मू कश्मीर छोड़ कर पाकिस्तान भी भाग सकते थे , जैसा उनके अन्य अनेक मित्रों ने किया था । लेकिन वे ज़्यादा समझदार थे और जिन्ना के पाकिस्तान में उनका क्या हश्र हो सकता था , इसे वे अच्छी तरह जानते थे । इसलिये वे नेहरु के दुमछल्ला बन गये । सभी जानते हैं कि नेहरु और शौक़ों के साथ साथ दुमछल्लों के भी शौक़ीन थे । इसलिये नेहरु ने महाराजा हरि सिंह से शासन छीन कर बिना किसी लोकतांत्रिक तरीक़े से शेख़ अब्दुल्ला को पूरी जम्मू कश्मीर रियासत का प्रधानमंत्री बना दिया । यह लोकतांत्रिक भारत में नेहरु का पहला तानाशाही प्रयोग था । जम्मू और लद्दाख के लोगों , जिनमें हिन्दु बौद्ध बहुमत में थे , ने रियासत को इस्लामी राज्य बनाने का विरोध ही नहीं किया बल्कि इसके विरोध में ज़बरदस्त आन्दोलन भी चलाया , जिसमें शेख़ अब्दुल्ला की मिलीशिया ने पन्द्रह लोगों को मौत के घाट उतार दिया । नेहरु इस्लामी राज्य बनाने की शेख़ अब्दुल्ला की ज़िद के साथ इतना आगे बढ़े कि उन्होंने कश्मीर घाटी के हिन्दुओं को भी यह सलाह देनी शुरु कर दी कि यदि घाटी में रहना है तो शेख़ अब्दुल्ला की कान्फ्रेंस में ही शामिल हो जाओ । संघीय संविधान में अनुच्छेद ३७० का समावेश तो इसलिये किया गया था क्योंकि जब भारत को गणतंत्र घोषित किया गया उस समय रियासत पर पाकिस्तान आक्रमण चला हुआ था और वहाँ सामान्य लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का पालन संभव नहीं था । अत रियासत के नागरिकों को भी वे सभी अधिकार , जो देश के दूसरे नागरिकों को मिले हुये थे , देने के लिये अनुच्छेद ३७० के नाम पर एक प्रक्रिया निश्चित की गई ।
परन्तु शेख़ अब्दुल्ला जानते थे कि यदि जम्मू कश्मीर के नागरिकों को भी वे सभी अधिकार मिल गये जो दूसरे नागरिकों को मिले हुये हैं तब न तो वे स्वयं रियासत के नये महाराजा या नबाव बन सकेंगे और न ही उनकी इस्लामी राज्य की महत्वकांक्षा पूरी हो सकेगी । तब प्रदेश की सत्ता असली जनप्रतिनिधियों के हाथों में आ जायेगी । इसलिये उन्होंने अनुच्छेद ३७० की आड़ में जम्मू कश्मीर के लिये अलग संविधान , अलग झंडा, अलग राज्य गीत,अलग प्रधानमंत्री और अलग प्रधान या सदरे रियासत का तानाबाना बुनना शुरु कर दिया । ताज्जुब तो तब हुआ जब नेहरु भी इस षड्यंत्र में शेख़ अब्दुल्ला के साथ खड़े दिखाई दिये । इतिहास के इस मोड़ पर डा० श्यामाप्रसाद प्रसाद मुखर्जी ने जम्मू कश्मीर के मामले में नेहरु और शेख़ अब्दुल्ला को एक साथ ललकारा और इसकी क़ीमत उन्हें अपनी जान देकर चुकानी पड़ी । उनकी जान लेने वाली शक्तियों का षड्यंत्र का तरीक़ा क्या था , यह अभी तक रहस्य की परतों में दबा पड़ा है ।
लेकिन लगता है इक्कीसवीं शताब्दी के दूसरे दशक तक आते आते इतिहास ने एक चक्र पूरा कर लिया है । जिस भारतोन्मुखी राजनैतिक दल की नींव डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने अपना रक्त देकर सींची थी उसने अन्ततः इटली मूल की सोनिया गान्धी के नेतृत्व में लामबन्द हुई पश्चिमोन्मुखी शक्तियों को परास्त कर भारत माता का अभिनन्दन कर दिया है । लेकिन असम और बंगाल को लेकर पाकिस्तान ने अंग्रेज़ों के वक़्त से चला आ रहा एजेंडा अभी तक त्यागा नहीं है । बंगला देश से करोड़ों की संख्या में मुसलमान पश्चिमी बंगाल और असम में आकर इन दोनों प्रान्तों का जनसांख्यिकी स्वरुप बदलने का प्रयास कर रहे हैं और इसमें कुछ सीमा तक सफल भी हुये हैं । पूर्वी बंगाल से जिन्ना के समय से शुरु हुआ हिन्दुओं का महानिष्कासन अभी तक समाप्त नहीं हुआ है । उधर जम्मू कश्मीर में शेख़ अब्दुल्ला के वारिस उन्हीं बातों को तोते की तरह दुहरा रहे हैं जिन्हें कभी उनके दादा श्रीनगर की जामा मस्जिद में गाया करते थे । अलबत्ता जहाँ तक राज्य की जनता का ताल्लुक़ है उसने अब्दुल्ला की पार्टी को प्रदेश की सभी सीटों पर पराजित कर अपना निर्णय दे दिया है । हाल ही में हुये लोक सभा चुनावों में नैशनल कान्फ्रेंस एक सीट भी जीत नहीं पाई । यहाँ तक की शेख़ के बेटे फ़ारूक़ भी बुरी तरह पराजित हुये । देखना होगा कि भाजपा की सरकार अपने संस्थापक डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी की वैचारिक विरासत को कैसे संभालती है । जहाँ तक नरेन्द्र मोदी का सम्बंध है उन्होंने तो अपने चुनाव अभियान में ही कहा था कि बंगला देश से आने वाले हिन्दु शरणार्थी हैं और अवैध रुप से घुसने वाले दूसरे लोग घुसपैठिये हैं । देश को इन अवैध बंगलादेशियों से मुक्त करवाना सरकार की वरीयता रहेगी । अनुच्छेद ३७० पर भी इस पृष्ठभूमि में बहस शुरु हुई है कि क्या इस से राज्य के आम लोगों को कोई लाभ भी हो रहा है या फिर इससे हानि ही उठानी पड़ रही है ? बहस के इस नये रुख़ से जम्मू कश्मीर के पूँजीपतियों और जन विरोधी शक्तियों में तो खलबली मची ही है साथ ही वे ताक़तें भी बेचैन हो रही हैं जो राज्य में आज तक मज़हब के नाम पर राजनीति करते हुये अपनी रोटियाँ सेंकती रही हैं । डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जन्म दिन के अवसर पर ये सभी प्रश्न प्रासांगिक तो हो ही गये हैं लेकिन इन की महत्ता इसलिये भी बढ़ गई है क्योंकि मुखर्जी के प्रयोग ने अपना एक चक्र नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से पूरा कर लिया है ।

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1 Comment on "डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी की विरासत और नई सरकार"

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DR.S.H.SHARMA
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Time is fast approaching to declare Jawahar lal Nehru a traitor and ban Indian National Congress considering the anti Hindusthan activities of Nehru and Congress not since partition but record and analyse what they have done in 20th and 21 st. century to Bharatmata and her true sons and daughters. I hope Shri Agnihotrijee would consider to collect details and write a book on this subject since congress’s inception to educate the people . Pranam to DR . Mukherjee and Dr. Gopinath Bardolai[ from Assam] to save entire North East , West Bengal and Assam from going to East Pakistan… Read more »
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