लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भार्गव

अमेरिका में गुरूद्वारे पर हमला-

नस्लीय घृणा का परिणाम

अमेरिका में एक कटटर दक्षिणपंथी युवक द्वारा गुरूद्वारे पर किए लोमहर्षक हमले ने दुनिया की सांस्कृतिक चेतना को झकझोरा है। अमेरिका की जांच एजेंसियां समझदारी से काम लेती हैं, इसीलिए उन्होंने हमलावर युवक की पहचान छिपार्इ है। हालांकि उसकी बाजू पर 911 का जो टैंटू छपा है, उस प्रतीक ने भारत समेत दुनिया को यह अहसास करा दिया है कि अमेरिका समेत यूरोपीय देशों में नस्लीय सर्वोच्चता साबित करने और धार्मिक कटटरता के प्रदर्शन का चलन एक हिंसक सनक के रूप में सामने आ रहा है। ऐसी ही घटना करीब एक साल पहले नार्वे में घटी थी, जिसमें आन्द्रेस बेहरिंग ब्रीविक युवक द्वारा अपने ही देश के लोगों पर हमला किया गया था। ब्रीविक र्इसार्इ कटटरपंथी और ठेठ दक्षिणपंथी विचारों का निष्ठावान अनुयायी था। वह बहुलतावादी संस्कृति और आव्रजन कानून के भी खिलाफ था। मसलन वह राष्ट्रवादी होने के साथ माक्र्सवाद और इस्लाम का सख्त विरोधी था। कमोवेश यही स्थिति अमेरिकी पूर्व सैन्यकर्मी वेड माइकल की है। इसीलिए प्रशासन ने इस हमले को ‘देशी आतंकवाद करार दिया है। अमेरिका में तीन सप्ताह के भीतर यह दूसरा बड़ा नरसिंहार है।

वेड माइकल और ब्रिविक की मनस्थितियों में बुनियादी अंतर यह था कि ब्रिविक ने जहां अपने ही देश के लोगों पर हमला किया वहीं माइकल ने भारतीय सिखों पर। ये हिंसक घटनाक्रम दोनों के लिए स्वप्रेरित और स्वस्फूर्त थे। वे शायद इसलिए चिंतित और भयभीत हैं क्योंकि उत्तरी अफ्रीका के देशों में चल रही उथल-पुथल और अमेरिका में 911 के हमलों के कारण जिस तरह से मुस्लिमों का वर्चस्व बढ़ता दिखार्इ दिया है, वह कहीं एक दिन ऐसी समस्या का आयाम न ले ले कि अमेरिका और नार्वे के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की पहचान को ही खतरा उत्पन्न न हो जाए ? इस तरह की मानसिकता निशिचत रूप से एक ऐसी बहस को जन्म देने वाली है जो धर्म, नस्ल, जाति और भाषा के जन्मजात संस्कारों के चलते अनायास उपजने वाले खतरों को रेखांकित करने के लिए बाध्य करती है। इस त्रासदी की बौद्धिक पड़ताल योरोपीय देशों में घटी आतंकवादी घटनाओं के परिप्रेक्ष्य में इसलिए भी जरूरी है क्योंकि वहां प्रवासी मुसलमानों को राजनीतिक बहस और चुनाव का मुददा भी बनाया जा रहा है।

वैश्वीकरण को हम इस रूप में गुणात्मक मानते हैं कि इसकी बिना पर दुनिया की विलक्षण संस्कृतियों के उत्कर्ष और महत्व को समझने में आसानी हुर्इ। संस्कृतियों का विनिमय हुआ। लेकिन सोवियत संघ के पतन के बाद खासतौर से अमेरिका और उसके मित्र देशों की कोशिश रही कि विश्व एक ध्रुवीय हो जाए और उसका नाभिकेन्द्र अमेरिका हो। कमोबेश ये हालात निर्मित हुए भी। अमेरिका ने इसे एक अनुकूल अवसर माना और वह भूमण्डलीय आदर्शो के बहाने अपने सांस्कृतिक परचम को विश्व-फलक पर फैलाने में लग गया। प्रजातांत्रिक मूल्यों और बाजारवाद की ओट में वास्तव में र्इसार्इ कटटरपंथी (फंडामेंटलिज्म) ने दुनिया के अनेक देशों के सांस्कृतिक वैविध्य को अपनी चपेट में ले लिया। दूसरी तरफ जेहादी इस्लामिक आतंकवाद का हस्तक्षेप कर्इ देशों में बढ़ा। जिसकी प्रतिक्रिया में भारत में जहां ‘हिन्दू आतंकवाद कहलें या ‘भगवा आतंकवाद उभरा, वहीं नार्वे में दहशतगर्दी की इबारत वहीं के नागरिक ब्रीविक ने लिख डाली। ब्रीविक ने एक दक्षिणपंथी वेब ठिकाने पर फरवरी 2010 में अपनी मंशा भी स्पष्ट की थी, कि योरोपीय देशों की परंपरा, संस्कृति, संप्रभुता और राष्ट्र-राज्य की संवैधानिक व्यवस्था कोे ध्वस्त करने की दृषिट से सांस्कृतिक बहुलतावाद की विचारधारा को असितव में लाया गया है। इसका जल्दी अंत होना जरूरी है। इन देशों में स्थायी तौर से बस जाने वाले अप्रवासियों को भी उसने बेदखल करने की बात कही है। उसे ब्रिटेन में हुए उस सर्वेक्षण ने भी बेचैन किया हुआ था, जिसके निष्कर्ष में 15 से 25 वर्ष आयु समूह के अप्रवासी 13 प्रतिशत मुस्लिम युवा उग्रवादी संगठन अलकायदा की विचारधारा से सहमत थे। उसने 1500 पृष्ठों का एक घोषणा-पत्र भी अपने वेब ठिकाने पर डाल रखा है। जिसमें योरोप को 2083 तक बहु-संस्कृति, जाति और भाषा से आजाद करने की बात कही गर्इ है। इस मुकित-संग्राम में विजयश्री हासिल करने के लिए उसने दावा किया कि आतंक और हिंसा के बिना इस लक्ष्य को पाना संभव ही नहीं है। इस नाते वह इस्लाम की बजाय हिंदू राष्ट्रवादियों की बौद्धिक वैचारिकता से प्रभावित है। हालांकि माइकल ने अपने पीछे ऐसी किसी मंशा का लिखित दस्तावेज नहीं छोड़ा।

तय है भूमण्डलीय जिन नमूनों को आदर्श मानकर दुनिया को एक ध्रुवीय बनाने की जो संरचना की जा रही है, वह खतरों से खाली नहीं है। एक तरफ लोगों में अपनी मूल अथवा पुरातन संस्कृति बचाने की जददोजहद है तो दूसरी तरफ पशिचमी संस्कृति में ढल जाने की होड़ है। लिहाजा नूतन और पुरातन संस्कृतियों के बीच कश्मकश है। जो अपने जन्मजात जातीय संस्कारों से गहरे जुड़े हैं, वे पुरातन मूल्यों और जड़ों से जुड़ने में कहीं ज्यादा जातीय, नस्लीय, भाषार्इ और धार्मिक होने की कवायद में लगे हैं। सनातन धर्मग्रथों के मिथक और बिंबों की चकाचौंध व सम्मोहन उन्हें एक मायावी दुनिया से जुड़ने को विवश करता है। ऐसे में वैशिवक बाजारवाद का हिस्सा बन चुकी और मीडिया द्वारा परवान चढ़ार्इ गर्इ धर्मों की कर्मकाण्डी संस्कृति भी उकसाने के काम में लगी है। फलस्वरूप धर्म के जो प्रेरक और बुनियादी तत्व हैं, उन्हें तो नेपथ्य में डालकर छिपाया जा रहा है, इसके विपरीत उनके आडंबरी पक्ष को प्रदर्शित कर पाखंड को बढ़ावा दिया जा रहा है। ये स्थितियां व्यकित के जीवन-दर्शन और सिद्धांत को विकृत करने वाली साबित हो रही हैं। जबकि धर्मों में वर्णित ध्यान, साधना, प्रार्थना और इबादत व्यकित में उदार भावों की स्थापना के साथ, निरंतर वैचारिक समन्वय और चेतना के विकास की अभिप्रेरणा होनी चाहिए। क्योंकि एक बहु-सांस्कृतिक सरंचना में ढला व्यकित सांस्कृतिक संतुलन बनाता हुआ अपने पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ किसी भी देश में आसानी से जी लेता है। जैसे की दुनिया के तमाम देशों में भारतीय अपना गौरवशाली भविष्य बनाने के साथ उसे देश को भी समृद्ध बना रहे हैं।

पश्चिम की समूची दुनिया में इस समय ‘राष्ट्रवाद और ‘बहु-संकृतिवाद विमर्श के विरोधाभासी रूप चर्चा में हैं। जब से विश्व के एक वैशिवक गांव होने का विचार पनपा है, राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को किसी न किसी रूप में चुनौती मिलती रही है। कुछ समय पूर्व ब्रिटेन के शिक्षकों का एक देशव्यापी सर्वेक्षण कराया गया था। जिसमें तीन-चौथार्इ शिक्षक बालकों को राष्ट्रभक्ति का पाठ पढ़ाए जाने को गलत मानने वाले थे। इनका मानना था कि पाठयक्रम में ऐसे विषयों को रखना बच्चों के मौलिक विचारों को जबरन बदलने (ब्रेन वाशिंग) का पर्याय है। लंदन विश्वविधालय द्वारा कराए इस सर्वेक्षण में 74 फीसदी शिक्षकों की राय थी कि उनका कत्र्तव्य बच्चों को ‘राष्ट्रभक्ति अर्थात ‘राष्ट्रवाद के खतरों से अवगत कराना भी है। सर्वेक्षण में शामिल कुछ शिक्षकों ने मशिवरा दिया कि देशभक्ति की बजाय ‘विश्व-बंधुत्व का पाठ पढ़ाया जाना ज्यादा उचित है। देशभक्ति के प्रति सकारात्मक दृषिटकोण रखने वाले अनेक शिक्षकों ने भी दबी जुबान में विश्व-बंधुत्व का पाठ पढ़ाए जाने में रजामंदी जतार्इ। एक शिक्षक ने तो शोधकर्ताओं से यहां तक कहा, कि देशभक्ति को बढ़ावा देने का अर्थ गैर-ब्रिटिश छात्रों से दूरी बनाना भी है। जब हम बच्चों को उन मूल्यों के बारे में बताते हैं, जो असमानता और विषंगतियों को दूर करने वाले हैं, तब इस परिप्रेक्ष्य में राष्ट्रभक्ति की बात करना, क्या छात्रों को जातीय, नस्लीय और सांप्रदायिक आधार पर विभाजित करने का काम नहीं करेगी ? हम यहां यह कल्पना कर सकते हैं कि यदि राष्ट्रभक्ति की शिक्षा का पाठयक्रम पाठशालाओं में लागू न होता तो शायद आन्द्रेस बेहरिंग ब्रीविक और अजमल कसाव जैसे व्यकित-चरित्रों का निर्माण होता ही नहीं ?

हालांकि ब्रिटेन में सर्व-समावेशी शिक्षा संभव है, क्योंकि वह वैसे भी योरोपीय संघ का अग्रणी देश है। वहां सदस्य देशों के बीच सरहदों को पहले ही लचीला बनाया जा चुका है। आज जब भूमण्डलीय आदर्श और वैशिवक बाजार की जरूरतों के चलते विभिन्न देशों और संस्कृतियों के बीच अंतर और दूरियां कम हुए हैं तो जरूरत इस बात की है कि राष्ट्रवाद को अपने-अपने देशों के संदर्भ में नए सिरे से परिभाषित किया जाए। लेकिन क्या यह संभव है ? नहीं, क्योंकि इन मसलों पर बौद्धिक बहसें तो संभव हैं, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक देश के राजनीतिक अजेंडे में ऐसे मसलों को शामिल किया जाना नमुमकिन है। इसीलिए ब्रिटिश के तब के प्रधानमंत्री गार्डन ब्राउन ने इस सर्वेक्षण को नजरअंदाज कर सार्वजनिक घोषणा की कि पाठशालाओं के पाठयक्रमों में ‘ब्रिटिशनेस को बढ़ावा देने पर जोर दिया जाए।

विश्व-बंधुत्व की अवधारणा जिस तरह राष्ट्रवाद के विरूद्ध है, ठीक उसी तरह सांस्कृतिक बहुलतावाद की अवधारणा भी राष्ट्रवाद के खिलाफ है। क्योंकि संस्कृति के रीति-रिवाज, खान-पान, वेष-भूसा और लोक भाषाओं जैसे तत्वों के साथ धर्म की पैठ व्यकित में कहीं इन सबसे गहरी है। यही वजह है कि धर्म में विज्ञान-सम्मत तार्किक हस्तक्षेप से स़त्ताएं बचती हैं। इसीलिए धर्मों में हिंसा का कोर्इ स्थान नहीं होने के बावजूद मुस्लिम आतंकवाद इस्लाम का, भगवा उग्रवाद हिंदू धर्म का और ब्रीविक कमोबेश इन्हीं तर्ज़ों पर र्इसाइयत की ओट ले रहा है। कश्मीर में कथित बुद्धिजीवियों को जो आतंकवाद व्यवस्था परिवर्तन की लड़ार्इ के रूप में दिखार्इ दे रहा है वास्तव में वह धर्म का फासीवादी रूप ही है। दरअसल ये स्थितियां आध्यातिमक फासीवाद को बढ़ावा देने वाली हैं। जो खतरनाक है। मिली-जुली संस्कृति का प्रचलन मुस्लिम राष्ट्रों में भी संभव नहीं है। क्योंकि ज्यादातर इन राष्ट्रों में न तो प्रजातांत्रिक सरकारेें हैं और न ही धर्मनिरपेक्ष संवैधानिक व्यवस्था। एक मर्तबा पशिचमी समाज तो अपनी रूढि़यों को उदार बनाने को तैयार है, लेकिन मुस्लिमों में यह नजरिया दिखार्इ नहीं देता। भारतीयों की तरह सहिष्णु और सर्व समावेशी अवधारणाएं उनके लिए गौण हैं।

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