लेखक परिचय

आलोक कुमार

आलोक कुमार

बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

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shatruदशकों से सांसदों को जनता के बीच जाने और उनकी समस्याओं से रूबरू होने की बातें होती आ रही हैं , लोकतन्त्र का तकाजा भी यही है l सुनने – सुनाने में अच्छी लगने वाली इन बातों का बाकियों पर क्या असर हो रहा है ये तो मैं नहीं जानता लेकिन हमारे ,पटना साहिब के, सांसद श्री शत्रुघ्न सिन्हा पर इसका कोई असर होता हुआ नहीं दिखता है , शायद इन सब चीजों से से ऊपर की ‘चीज़’ हैं जनाब !! सांसद के रूप में अपने किसी भी कार्यकाल में महोदय का कभी कोई सरोकार रहा ही नहीं है , न जनता से और न उससे जुड़े मुद्दों से l बिहार व पटना में इनके यदा-कदा दर्शन भी होते हैं तो किसी कार्यक्रम के मंच पर अतिथि के रूप में , कबड्डी के मैच में , नाटक करते हुए कलाकार के रूप में , नीतीश जी व् लालू जी के दरबार में , टीवी कैमरे के सामने सनसनी पैदा करने वाले बयान देते हुए या फिर चुनावों के समय ‘डायलॉगबाजी’ भरा भाषण करते हुए ….अभी हाल ही में पटना वासियों को ‘नौटंकी के स्टेज ‘ पर नौटंकी करते हुए इनके ‘दर्शन’ का ‘सौभाग्य’ तो मिला लेकिन जनता कैसे अपनी समस्याओं के साथ ‘कबड्डी’ खेलते-खेलते पस्त व् खामोश है उसकी परवाह किए बगैर सांसद महोदय ‘फुर्र’ हो लिए …. आज इनके संसदीय क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा बाढ़ की विभीषिका झेल रहा है फिर भी जनाब के दर्शन – दुर्लभ हैं …जनता बाढ़ के पानी में गोते लगाने को मजबूर है और बिहारी बाबू कहलाने वाले जनाब सांसद महोदय शायद मायानगरी की रंगीनियों में गोते लगा रहे हैं …!! इनसे समस्याओं के निदान की उम्मीद करना तो इन पर ज्यादती ही होगी लेकिन बाढ़ से हलकान जनता का मनोरंजन तो ये कर ही सकते हैं ….!!

इनका ये रवैया वाजिब ही है ..!! जब बिना कुछ किए ही जनता चुन लेती है तो ‘पचड़ों’ में पड़ने की आवश्यकता ही क्या है ? …. इनकी जीत से ये साबित होता है कि अभी भी चुनावी राजनीत का विकास या जन-सरोकारों से कोई लेना-देना नहीं है और जनता शिक्षित हो या अशिक्षित वोट करने के समय वो जातिगत समीकरणों की ‘मजबूरियों’ से ‘वशीभूत’ हो कर ही अपनी प्राथमिकताएं तय करती है ( द्रष्टव्य है कि पटना साहिब संसदीय क्षेत्र में शहरी मतदाताओं की बहुलता है और बेशक वो शिक्षित भी होंगे !!)…..’नोटा’ का प्रावधान होने के बावजूद कोई शहरी , शिक्षित व जागरूक मतदाता अगर विवशताओं ( आखिर किस को चुनें ?) का बहाना करता है तो यह निःसन्देह उस व्यक्ति-विशेष का विरोधाभासी -चरित्र है l

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