लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

Posted On by &filed under चुनाव, राजनीति.


विविधता और अनेक प्रकार की क्षेत्रीय अस्मिताओं एवं उपराष्ट्रीयताओं वाले देश भारत में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव संयुक्त रुप से कराए जाने की पहल केंद्र सरकार ने शुरू की है तो यह एक अच्छी शुरूआत मानी जानी चाहिए। इस कदम से अन्य सभी राजनीतिक दलों को कदमताल की जरूरत है। यदि इस विचार पर कानूनी सहमति बन जाती है तो केंद्र समेत राज्य सरकारें पूरी पांच साल स्थिर रहेंगी और विकास की रफ्तार में गतिशीलता बनी रहेगी। यदि यह पहल अंजाम तक पहुंच जाती है तो यह एक ऐसी अहम् उपलब्धि होगी, जिससे पूरा देश तो लाभान्वित होगा ही,चुनाव सुधार की दिशा में भी कई नई खिड़कियां खुलने की उम्मीद बढ़ जाएगी।

केंद्र सरकार चाहती है कि 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव के साथ राज्य विधानसभाओं को भी चुनाव संपन्न हो जाएं। सरकार की इस मंषा पर 18 राज्यों ने अपनी सहमति जता दी है। इन राज्यों में भाजपा षासित राज्य ही नहीं केरल, तमिलनाडू, बिहार, बंगाल और उत्तर प्रदेश जैसे विपरीत विचारधारा वाले राज्य भी शामिल हैं। केंद्र सरकार इस महत्वपूर्ण और आवश्यक विचार पर सामंजस्य बिठाने की कोशिश केंद्रीय कानून मंत्रालय के जरिए कर रही है। हालांकि चुनावों में सुधार की दृश्टि से निर्वाचन व विधि आयोग अनिवार्य मतदान, निर्वाचित प्रतिनिधि को वापस बुलाने का अधिकार,एक प्रत्याशी के कई निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध और अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने के प्रस्ताव केंद्र सरकार को देते रहे हैं, लेकिन इन प्रस्तावों को ठंडे बस्ते में डालकर सरकारें अपने कर्तव्य की इतिश्री करती रही हैं। यह पहली मर्तबा है, जब नरेंद्र मोदी सरकार संयुक्त रूप से चुनाव लड़ने के प्रस्ताव पर सर्वदलीय रजामंदी बनाने की कवायद में मुस्तैदी से जुटी दिखाई दे रही है। जाहिर है, इस प्रस्ताव पर अमल हो जाए तो राजनीतिक व्यवस्था में स्थिरता का एक बार फिर से नया दौर शुरू होगा,जो व्यवस्था में आमूलचूल बदलाव का वाहक बन सकता है

बीते पांच दशकों से देश में ऐसी परंपरा अनायास ही चल पड़ी है कि लगभग हरेक छह माह में किसी न किसी चुनाव से जनमानस को सामना करना पड़ रहा है। हमारे यहां बहुस्तरीय शासन प्रणालियों की वजह से भी निर्वाचन का सिलसिला चलते रहने की मजबूरी जनता को झेलनी पड़ती है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों की अनिवार्यता के साथ, जैसे-जैसे भारतीय लोकतंत्र मजबूत व परिपक्व होता गया है, वैसे-वैसे उसमें शासन-प्रशासन के विकेंद्रीकरण की ठोस पहलें होती रही हैं। नतीजतन नगरीय निकाय चुनाव के साथ त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक दर्जा दिया गया। राज्य स्तर पर कृषि उपज मंडियों और सहकारी बैंको व समितियों की चुनाव प्रक्रियाएं भी चलती रहती हैं। छात्र संधो के चुनाव भी भारतीय राजनीति का अह्म हिस्सा हैं। गौया, लोकसभा और विधानसभा चुनावों की संयुक्त कार्यवाही शुरू हो भी जाती है तब भी जनता को अन्य चुनावों से तो रूबरू होते रहना ही पड़ेगा।

प्रत्येक साल देश में करीब तीन-चार विधानसभाओं के चुनाव तो होते ही हैं। तय है, आदर्श आचार संहिता लागू हो जाने के कारण इससे विकास की गति में रोड़े आते ही हैं। प्रषासनिक और सरकारी षिक्षा व्यवस्थाएं भी लगभग चैपट हो जाती हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव के नौ माह के भीतर महाराष्ट्र,हरियाणा,झारखंड,जम्मू-कष्मीर और दिल्ली के चुनाव हुए। मसलन महज नौ माह में पांच विधानसभा चुनावों के दौर से देश को गुजरना पड़ा। अब इसी साल के अंत में बिहार में चुनाव होने हैं और इसके ठीक चार माह के बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडू में चुनाव प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके बाद केरल में चुनावी बिगुल बज उठेगा। साफ है, सरकारों और राजनीतिक दलों की प्राथमिकता विकास की बजाय, निर्वाचन और उसमें सफलता की लालसा में निहित हो जाती है। इस मिसाल का कारगर उदाहरण मध्यप्रदेश है। यहां नवंबर-2013 में विधानसभा चुनाव हुए। फिर लोकसभा की बारी आ गई। इसके तुरंत बाद नगरीय निकाय चुनाव संपन्न हुए और इसके तत्काल बाद पूरे दो माह पंचायत चुनाव का सिलसिला चला। अभी भी कृषि मंडियों व सहकारी समितियों के चुनाव हाने हैं। ड़ेढ़ साल चले इस चुनावी दौर में आठ माह आदर्श आचार संहिता लागू रही और सरकारी कामकाज कमोवेश ठप रहा।

मुख्य चुनाव आयुक्त एचएस ब्रहमा ने हाल ही में कहा है, राज्य विधानसभा चुनावों का खर्च 4500 करोड़ बैठता है। इसे नियंत्रित करने के लिए लोकसभा व विधानसभा चुनाव एक साथ कराना बेहतर होगा। यह पहल केंद्र सरकार ने आम राजनीतिक सहमति बनाने की कोशिश के साथ शुरू कर दी है। इस हेतु एक सर्वसम्मत फाॅर्मूले पर सरकार आगे बढ़ रही है। लोकसभा का अगला चुनाव 2019 में है। उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव 2017 में हैं। इसे एक साथ कराने की दृश्टि से फार्मूला दिया है कि 2017 में उप्र सरकार का कामकाज पूरा होने के बाद दो साल तक सर्वदलीय सरकार चले और 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ,नए सिरे से चुनाव हों। वहीं जिन राज्यों में 2020 में चुनाव होने हैं, उन्हें एक साल पहले करा लिया जाए। यदि एक बार लोकसभा और विधानसभाओं के निर्वाचन का क्रम बन जाता है तो यह क्रम बना रहे,इसके लिए प्रस्ताव है कि केंद्र या किसी राज्य सरकार को बहुमत नहीं मिलने पर मिलीजुली सरकार बनें अथवा राष्ट्रपति शासन लागू रहे। राष्ट्रपति शासन के साथ,संकट नौकरषाही के बेलगाम हो जाने का है,इसलिए इस विचार पर दल प्रमुख एकमत हो जाएं, यह उम्मीद नामुमकिन है।

लोकसभा के साथ ही विधानसभाओं के चुनाव 1967 तक होते रहे हैं। 1951-52 के बाद 1957,1962 और 1967 तक यह सिलसिला साथ-साथ चला। किंतु 1968 और 1969 में इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्रित्व में कुछ राज्य विधानसभाओं को भंग करने के साथ यह सिलसिला टूट गया। 1970 के बाद से कई मर्तबा लोकसभा को बीच में भंग कर दिए जाने का सिलसिला शुरू हो गया। लोकसभा का क्रम बीच में न टूटे इस उद्देष्य के मद्देनजर 1995 में भारतीय जनता पार्टी के प्रमुख नेता लालकृष्ण आडवाणी ने तो बाकायदा लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ हों, इस मकसद पूर्ति के लिए अभियान भी चलाया था। जिसे कुछ दलों का तत्काल समर्थन भी मिल गया था,लेकिन बात किसी अंतिम नतीजे तक नहीं पहुंच पाई थी। बहरहाल एक साथ चुनाव के सुझाव पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बन जाती है और यह मुद्दा 2019 से पहले संवैधानिक दर्जा हासिल कर लेता है तो देश में स्थिर और उत्तरदायी सरकारों का क्रम शुरू हो जाएगा, जो विकास और तंत्र को मजबूती देगा।

 

प्रमोद भार्गव

 

 

Leave a Reply

Be the First to Comment!

Notify of
avatar
wpDiscuz