लेखक परिचय

पंडित सुरेश नीरव

पंडित सुरेश नीरव

हिंदी काव्यमंचों के लोकप्रिय कवि। सोलह पुस्तकें प्रकाशित। सात टीवी धारावाहिकों का पटकथा लेखन। तीस वर्षों से कादम्बिनी के संपादन मंडल से संबद्ध। संप्रति स्‍वतंत्र लेखन।

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पंडित सुरेश नीरव

आज का लेटेस्ट अपडेट- वतन की आबरू खतरे में है। तैयार हो जाओ। और ये भी

बता दें कि खतरा बाहर के दुश्मन से नहीं अपने उन खूंखार खबरचियों से है

जो कि खबर के रेपर में लपेटकर सनसनी बेचते हैं। इनके लिए बस एक अदद खबर

महत्वपूर्ण है। क्योंकि ये खबरफरोश हैं। खबर ही इनके जीवन का परम सत्य

है। एक खबर के आगे इंसान की जान,ईमान और मुल्क की आन-बान-शान-जैसी ओछी

बातों को ये कभी सीरियसली नहीं लेते हैं। अर्जुन की आंख की तरह इन्हें बस

चिड़िया की आंख दिखती है।साक्षी भाव और वीतरागी मन से ये सकल संसार को

देखते हैं। ये आत्मदाह करते हुए व्यक्ति को बचाने का बचकाना कार्य कभी

नहीं करते। जब वह अपने कपड़ों पर अपनी आर्थिक स्थिति के मुताबिक तेल या

पेट्रोल छिड़कता है तो कैमरा-पुरुष तसल्ली के साथ अपने कंधे से कैमरा

उतारता है। जब वह माचिस से दियासलाई निकालकर कपड़ों में आग लगाता है तो

यह कैमरावीर बहादुरीपूर्वक लक्ष्य से पीछे हट जाता है। शेर भी यही करता

है। जब उसे लंबी छलांग लगानी होती है तो पहले वह पीछे हटता है। सभी

बहादुरों का मूल चरित्र एक-जैसा ही होता है। कैमरा-कुंअर रूमाल से कैमरे

का लैंस साफ करता है। और जब वह आदमी आग के गोले में तब्दील हो जाता है तो

यह कैमरावीर उत्साहपूर्वक लपक कर आगे बढ़ता है और अपनी अदम्य चुस्ती और

फुर्ती के साथ अपनी ही जान और वो भी अपनी ही हथेली पर लेकर इस दुर्लभ

ईवेंट का फोटोसेशन कर डालता है। ततपश्चात वीरोचित मुद्रा में इन यादगार

लम्हों को कैमरे में कैद कर वह अपने दफ्तर चला आता है। और अगर कहीं वो

फ्रीलांसर है तो विभिन्न चैनलों और अखबारों के दफ्तर में गर्वपूर्वक इन

फोटुओं के होने की सुखद सूचनाएं भी देता है। वे उदारमना बालाएं जो दफ्तर

बसाने-जैसे सामुदायिक लक्ष्य के आगे घर बसाने-जैसे नितांत व्यक्तिगत सुख

का हंसते-हंसते बलिदान कर देती हैं, ऐसी संरक्षित नस्ल की वीरांगनाएं

चुइंगम चबाती-दिखीती इन फोटुओं को देखकर मादक सिसकारियां उछालती हुई कहती

हैं- वाओ,वेरी स्मार्ट, वेरी डेअरिंग। ऑफिस के अन्य इमोशनल कर्मचारी भी

इन तस्वीरों को देखकर एक गुप्तसुख का कुत्सित आनंद लेते हैं। कुछ मेधावी

कर्मचारियों को तो बरबस ही बर्निंग ट्रेन और टॉवरिंग इनफर्नो-जैसी

कलात्मक फिल्मों के दृश्य याद आ जाते हैं। कुछ सेकुलर टाइप के मनचले

देशहित में गोदराकांड को जलियावाला कांड की तर्ज पर याद कर वर्तमान को

अतीत से जोड़ देते हैं। फाइनल राउंड में स्वयंभू जजों की टोली ये फेंसला

करने में जुट जाती है कि कौन-सी फोटो सबसे ज्यादा नेचुरल है। और किसे

पब्लिक के सामने लाया जाना चाहिए। कैमरे की आंख के पीछे जो वीतरागी आंख

होती है उसके लिए मुन्नी बदनाम हुई का डांस करती आयटम गर्ल,क्रिकेट

स्टेडियम में दर्शकों की सांसे गर्म करती चीअर-लीडर्स,गैंगरेप का शिकार

हुई नारी अस्मिता और आत्मदाह करती निराश जिंदगी सब एक समान है। बाजार में

बिकनेवाला उपभोक्ता पदार्थ। सरकुलेशन बढ़ाने का टोटका। टीआरफी बढ़ानेवाला

कच्चा माल। अपने काम के लिए कैसा दुर्दांत समर्पण होता है इनमें। शादी से

पहले और शादी के बाद जैसी धार्मिक तर्ज पर ये भी दुर्घटना से पहले और

दुर्घटना के बादवाली स्टाइल में किसी भी हादसे को सुपर-डुपर दिलचस्प

बनाने की पवित्र भावना से हर पल अपनी लोमहर्षक हाजिरी दर्ज कराने के लिए

कमर नामक पदार्थ और कमर के नीचे का लंगोट दोनो ही उल्लासपूर्वक कसे रहते

हैं। क्या करें। खबरों के इस गलाकाट ओलंपिक में खबर खेंचने का बबाल और उस

पर इस पापी पेट का सवाल। इन कर्मयोगियों का काम तो हर खबर पर गिद्ध नजर

रखना है। इस नजर को किसी गिद्ध की भी नज़र ना लगे। ये समाज के वॉच डॉग

हैं। देशहित में जो नहीं दिखाना होता है ये वह भी दिखाते हैं। और तय

करलें तो जो दिखाना होता है उसे भी छिपाते हैं। आगरा से सेना की टुकड़ी

के दिल्ली कूच का मंगलकारी समाचार छापकर अभी हाल में इन्होंने देश में

हर्ष की लहर चला दी। रंगा भी खुश और गोमांगो भी खुश। हमारा मानना है कि

व्यवस्था जब वीक होती है खबर तभी लीक होती है। और पत्रकार कभी किसी लीक

पर नहीं चलते। वो तो हवा का झोंका होते हैं। उनके पांव में जंजीर कौन

पहना सका है। सरकार तक सेंसरशिप की जंजीर नहीं पहना सकती। इसलिए हवा के

रुख के साथ बहने और रहने में ही समझदारी है। क्या फायदा मरकर खर्च भी हो

जाओ और आत्महत्या के आयटम पर मीडिया नोटिस ही न ले। मेरी तो सिंसियर राय

है कि आत्महत्या से पहले प्रेस कॉंफ्रेस कर ली जाए तो दोनों ही पक्ष

फायदे में रहेंगे।

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