लेखक परिचय

प्रभात कुमार रॉय

प्रभात कुमार रॉय

लेखक पूर्व प्रशासन‍िक अधिकारी हैं।

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प्रभात कुमार रॉय

26 जनवरी 2011 को भारतीय गणतंत्र ने अपने 60 वर्ष पूरे कर लिए और अपनी 61 वीं वर्षगाँठ का जश्न भी मना लिया। भारतीय गणतंत्र की सबसे महान उपलब्धि रही है कि देश में उठे समस्त झंझावातों के मध्य इसने स्वयं को बाकायदा कायम बनाए रखा है। जबकि भारत के पडौ़सी मुल्क पाकिस्तान, म्यांमार, नेपाल, थाईलैंड आदि में गणतंत्र सदैव ही डांवाडोल बना रहा। भारतीय गणतंत्र ने अत्यंत कामयाबी के साथ 15 आम चुनाव आयोजित किए। संवैधानिक भारतीय गणतंत्र के तहत हमारा राष्ट्र, विश्व पटल पर एक जबरदस्त आर्थिक ताकत के तौर पर स्थापित हुआ। आतंकवाद की बर्बर चुनौतियों का मुकाबला करते हुए स्वयं को न केवल विखंडित होने से बचाया और बल्कि मजबूत और मुस्तहक़म बनाया। 26 जनवरी 1950 को भारतीय संविधान ने अपनी प्रथम अंगडाई ली थी, इस जबरदस्त उम्मीद के साथ कि भारतीय संविधान अपने निर्माताओं की कसौटी पर खरा सिद्ध होगा। भारतीय संविधान निर्मात्री सभा में एक से बढकर एक राजनीतिशास्त्र के विद्वान, प्रखर विधि विज्ञ और जंग ए आजादी के योद्धा विद्यमान रहे। जवाहरलाल नेहरु, सरदार बल्लभभाई पटेल, बी.आर.अंबेडकर, श्यामाप्रसाद मुखर्जी, डा.के.एम मुंशी, ह्रदयनाथ कुंजरु,, गोपालास्वामी अय्यर, विश्वनाथ दास, हीरेन मुखर्जी, बी.एन.राव, एवं अल्लादी कृष्णस्वामी अय्यर आदि सरीखे मूर्धन्य व्यक्तित्व संविधान सभा में विद्यमान रहे थे।

संविधान की प्रस्तावना में ऐलान किया गया कि हम भारतवासी सार्वभौमिक, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष, जनवादी प्रजातंत्रिक भारत के निर्माण का अहद लेते हैं। इसके सभी नागरिकों के लिए सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय हासिल करेगें, स्वतंत्रता, समानता एवं भाईचारा स्थापित करेगें। भारतीय संविधान के प्रीएम्बल में किए गए ऐलान और इसमें लिए गए शानदार संकल्प को साकार करने की खातिर भारतीय नागरिकों के बुनियादी अधिकारों की जोरदार इबारत तशकील की गई। राज्यसत्ता की लिए राह प्रशस्त करने नीति निर्देशक सिद्धांतों की संरचना अंजाम दी गई। जन प्रतिनिधि सरकार की स्थापना के लिए संविधान के आर्टिकल्स रचित किए गए। संविधान के तहत ऐसी जन प्रतिनिधि सरकार की स्थापना का प्रावधान किया गया जो जनमानस के द्वारा जनमानस के लिए निर्मित की जाए। संविधान के आर्टिकिल्स के आधार पर संवैधानिक मक़सद को हासिल करने के लिए संसद, केंद्रीय सरकार, विधान सभाओं और प्रांतीय सरकारों का विशाल प्रजातांत्रिक ढांचा खडा़ किया गया।

विगत 60 वर्षों के संवैधानिक शासन के तहत संविधान के तहत लिए इस संकल्प को किस हद तक और कितना निभाया गया कि भारत के सभी नागरिकों के लिए सामाजिक और आर्थिक न्याय हासिल किया जाएगा। शासकीय आंकडें ही बयान करते हैं कि देश के 40 करोड़ नागरिक गरीबी रेखा के तले कुचल कर जिंदगी गुजारने के लिए विवश हैं। दबे कुचले इन 40 करोड़ नागरिकों में अधिकतर आदिवासी और दलित ही हैं, जिनके लिए भारतीय संविधान के प्रथम पैराग्राफ में ही सामाजिक और आर्थिक न्याय प्राप्त करने का संकल्प लिया गया। प्रख्यात आदिवासी नेता कैप्टन जयपाल सिंह ने 13 सितंबर 1946 को संविधान निर्मात्री सभा में तक़रीर करते हुए कहा था कि यदि भारतीय जनता के किसी समूह के साथ सबसे ज्यादा खराब व्यवहार किया गया है तो वे मेरे आदिवासी लोग रहे हैं। हमारा संपूर्ण इतिहास दमन, अत्याचार और शोषण से लबरेज है, जिसके विरुद्ध हम आदिवासी निरंतर विद्रोह करते ही रहे हैं। 1928 में एम्सटर्डम के मैदान में विजेता भारतीय हाकी टीम के कप्तान कैप्टन जयपाल सिंह के ये अल्फाज़ जीवंत और साकार हो उठे हैं, जबकि आदिवासी किसान गण, देश में जारी नक्सल विद्रोह का सशक्त जनआधार बन चुके हैं।

देश के किसानों को आधार बनाकर आजादी का संपूर्ण संग्राम लडा़ गया। संत कबीर का करघा, गाँधी का चरखा, भगत सिंह का पगडी़ संभाल जट्टा, सुभाष बोस का जय हिंद सबसे अधिक करोडों किसानों में गूंज उठा था। जंग ए आजादी का इतिहास गवाह है कि 1857 से 1942 तक लडे़ गए सभी स्वातंत्रय संग्रामों में सबसे अधिक कुर्बानियां किसानों ने अता की। विगत एक दशक के दौरान 2 लाख से अधिक किसानों द्वारा अंजाम दी गई आत्महत्याओं से उठी चीखों का आर्तनाद बयान करता हैं कि संविधान में उल्लेखित आर्थिक न्याय का संकल्प राजसत्ता के अलंबरदारों द्वारा एकदम ही विस्मृत कर दिया गया। यूं तो कथित ग्लोब्लाइजेशन की आँधी के दौर में तक़रीबन चालीस हजार मजदूभी आत्मघात कर चुके हैं। संवैधानिक संकल्पों की घनघोर उपेक्षा से उपजे असंतोष ने राष्ट्र को आतंकवाद के अंधकार में धकेल दिया। करोडों नौजवानों के मध्य बढती जाती बेरोजगारी ने प्रत्येक रंग के आतंकवाद को नए रिकरुट प्रदान किए और यह सिलसिला आज भी बदस्तूर जारी है। 31 वर्षों पूर्व पंजाब प्रांत से प्रारम्भ हुआ भयावह आतंकवाद कश्मीर, असम, मणिपुर आदि प्रांतों तक विस्तारित होकर, अभी तक कुल मिलाकर तीन लाख नौजवानों की हलाकतें अंजाम दे चुका है और भारत को एक बार पुनः खंडित करने के लिए दनदना रहा है।

गणतंत्र की 61 वीं वर्षगाँठ का जश्न मनाते हुए भारत बाकायदा विश्व की एक जबरदस्त आर्थिक शक्ति के तौर पर उभर चुका है, किंतु आर्थिक शक्ति के तौर पर स्थापित होने का समुचित फायदा भारत के वास्तविक जन गण तकरीबन सौ करोड़ किसान मजदूरों तक पंहुच नहीं सका। मुठ्ठी भर कारपोरेट घराने ही जिनकी तादाद महज सौ से अधिक कदाचित नहीं है, इनकी कुल संपदा विगत एक साल के दौरान ही लगभग 15 लाख करोड़ से बढकर 21 लाख करोड़ हो गई। विगत वर्ष 54 खरबपति थे इस वर्ष इनकी संख्या बढकर 93 हो गई है। यही रही है राष्ट्र की 9 फीसदी आर्थिक विकास दर की निर्मम वास्तविकता, जिसके चलते पिछले एक साल के काल में बेहद गरीब दरिद्र भारतीयों की संख्या तकरीबन 40 करोड से बढकर 42 करोड़ हो गई। ताजमहल के विषय में प्रख्यात लेखक एडल्स हक्सले का कमेंट बरबस याद आ जाता है कि इसके संगमरमर के पत्‍थरों की चमक दमक की पृष्ठभूमि में बेहिसाब अंधकारपूर्ण गुनाह दफ़न हैं।

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