लेखक परिचय

प्रवक्‍ता ब्यूरो

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-देवेन्द्र स्वरूप

सितम्बर (बृहस्पति-वार) 2010 को भारत के इतिहास में एक युगान्तर कारी तिथि के रूप में स्मरण किया जाएगा। लगभग पांच सौ साल तक भारत की अनेक पीढ़ियां एक विदेशी आक्रमणकारी के आदेश पर अयोध्या में निर्मित जिस ढांचे को राष्ट्रीय अपमान के रूप में देखकर आहत थीं, उस ढांचे को न्यायालय ने रामजन्मस्थान के रूप में मान्यता प्रदान कर दी और वहां मर्यादा पुरुषोत्तम राम का भव्य मंदिर निर्माण का पथ प्रशस्त कर दिया। इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ की तीन सदस्यीय खंडपीठ के इस ऐतिहासिक निर्णय को किसी की जय पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसे स्वाधीन खंडित भारत के भटकाव से बाहर निकलने के स्वर्णावसर के नाते देखा जाना चाहिए। यहां अयोध्या आंदोलन के पूरे इतिहास को खंगालने की आवश्यकता नहीं है। यह आंदोलन अनेक ज्ञात और अज्ञात चरणों से गुजरता हुआ निरंतर आगे बढ़ता है। कल जो निर्णय आया है वह 22 दिसंबर 1949 की अर्धरात्रि में उस विवादास्पद ढांचे के भीतर रामलला की प्रतिमा के प्राकटय से प्रारंभ हुए चरण का समापन कहा जा सकता है।

भारत विभाजन की पृष्ठभूमि

इस घटना को 15 अगस्त, 1947 को भारत के विभाजन की पृष्ठभूमि में देखा जाना चाहिए था। उस विभाजन का एकमात्र कारण पृथकतावादी मुस्लिम मानसिकता थी। 1945-46 के चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि पूरा हिन्दू समाज कांग्रेस के अखंड भारत कार्यक्रम के साथ खड़ा हो, जबकि लगभग पूरा मुस्लिम समाज मुस्लिम लीग की विभाजन की मांग के पीछे खड़ा रहा। ब्रिटिश साम्राज्यवादियों के समर्थन के कारण भारत को विभाजन की दारुण भयंकर त्रासदी से गुजरना पड़ा। इस त्रासदी का सहज परिणाम विभाजित खंडों के बीच जनसंख्या परिवर्तन के रूप में हो सकता था। मुस्लिम लीग की ओर से यह मांग उठी भी थी किंतु भारतीय नेतृत्व के मन में यह धारणा गहरी बैठी हुई थी कि भारत में हिन्दू मुस्लिम विभाजन को ब्रिटिश कूटनीति ने पैदा किया है। इसलिए अंग्रेजों के चले जाने के बाद हम मुस्लिम समाज को राष्ट्रीय धारा का अभिन्न अंग बनाकर दिखाएंगे। विभाजनोत्तर खंडित भारत के मुस्लिम समाज ने उनकी इस उदार मानसिकता को पहचानकर खंडित भारत में ही बसे रहने का मन बनाया और भारत ने उसका स्वागत किया। नवनिर्मित संविधान में उनकी मजहबी अस्मिता की रक्षा के लिए विशेष व्यवस्थायें की गयीं।

सामान्य जनमानस ने खंडित भारत की स्वाधीनता को सातवीं शताब्दी से अफगानिस्तान के हिन्दू प्रदेश पर आरंभ हुए अरब आक्रमणों के हजार साल लम्बे इतिहास की परिणति के रूप में देखा। उसने विदेशी आक्रमणकारियों की हिन्दू धर्मस्थलों की विध्वंस-लीला के इतिहास से छुटकारे के रूप में विभाजन को देखा। सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प और अयोध्या में रामजन्मस्थान का उध्दार उसी इतिहास दृष्टि और छटपटाहट के परिचायक थे। 22 दिसंबर को विवादित बाबरी ढांचे के भीतर रामलला के प्राकटय को भी इसी छटपटाहट और इतिहास बोध के प्रतीक रूप में देखा जाना चाहिए था। विभाजन के लिए मुस्लिम लीग का समर्थन करने वाले मुसलमानों ने खंडित भारत में बसे रहने का निर्णय करते समय इतिहास के इस संकेत को क्यों नहीं समझा, यह समझना कठिन है। वस्तुत: भारत में एकात्मक राष्ट्रीय समाज के निर्माण की दिशा में उन्हें पहल करनी चाहिए थी और सहस्रों हिन्दू मंदिरों व श्रध्दाकेन्द्रों की मध्ययुगीन विध्वंस लीला से अपना संबंध विच्छेद करने के संकल्प के प्रतीक स्वरूप अयोध्या, काशी और मथुरा के विध्वंसित स्थलों पर उपयुक्त भव्य राष्ट्रीय स्मारक निर्माण करने में अपना पूर्ण सहयोग देना चाहिए था। देश का दुर्भाग्य है कि वैसा नहीं हुआ और कल के न्यायालयी निर्णय को प्राप्त करने के लिए उसे साठ वर्ष लम्बा कानूनी युद्ध और जनांदोलन की पीड़ा से गुजरना पड़ा।

राष्ट्रीय आंदोलन

इस लेखक ने प्रारंभ से अयोध्या आंदोलन को केवल एक धार्मिक आंदोलन के रूप में न देखकर राष्ट्रीय आंदोलन माना है। 27 अक्तूबर 1991 को हिन्दी दैनिक ‘राष्ट्रीय सहारा’ में ‘हमारी राष्ट्रीयता का प्रतीक श्रीराम जन्मभूमि मंदिर’ शीर्षक लेख में हमने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि यह सत्य है कि मुस्लिम भारतीयों की वर्तमान पीढ़ी को मध्यकालीन मुस्लिम आक्रमणकारियों एवं शासकों की मजहबी असहिष्णुता एवं विध्वंसलीला के लिए उत्तरदायी नहीं ठहराया जा सकता। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि इस मध्ययुगीन विचारधारा से संबंध विच्छेद किये बिना भारत में पंथनिरपेक्षता का पौधा लंबे समय तक जीवित नहीं रह सकता। पंथनिरपेक्षता एवं सहिष्णुता पर आधारित समाज जीवन खड़ा करने के लिए आवश्यक था कि देश विभाजन की विभीषिका के बाद भारतीय मुसलमानों में आत्मालोचन एवं सुधार का कोई जबरदस्त आंदोलन प्रारंभ होता, किंतु दुख के साथ कहना पड़ता है कि ऐसा नहीं हुआ, बल्कि तब से अब तक ‘मुस्लिम प्रश्न’ ही भारतीय राजनीति का केन्द्र बिन्दु बना रहा है।

उसी लेख में आगे है, ‘इसके लिए मुस्लिम नेतृत्व से अधिक दोषी है वह हिन्दू नेतृत्व जो थोक वोटों को पाने के लोभ में और पंथनिरपेक्षता की आड़ में मुस्लिम संप्रदायवाद को भड़काता है, मुसलमानों के मन में हिन्दू विद्वेष जगाता है। हमारी दृष्टि में अयोध्या आंदोलन ऐसी दो विचारधाराओं का टकराव है जिनमें से एक विचारधारा उपासना स्वातंत्र्य, सर्वपंथ समादर भाव एवं पंथनिरपेक्षता की मूल भित्ति पर टिकी हुई है, जबकि दूसरी विचारधारा का आधार मजहबी एकरूपता, केन्द्रीयकरण, विस्तारवाद और असहिष्णुता है।’

यह कितने गर्व और संतोष की बात है कि जिस संघ परिवार पर झूठे पंथ निरपेक्षतावादी सत्तालोलुपों ने मुस्लिम विरोधी छवि आरोपित कर दी है, उसी संघ परिवार के मुखिया अर्थात् राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने न्यायालयी निर्णय की घोषणा के तुरंत बाद सायं 5.00 बजे पत्रकार परिषद् बुलाकर इस निर्णय का स्वागत करते हुए चेतावनी दी कि इसे किसी भी पक्ष की विजय-पराजय के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। उन्होंने मुस्लिम समाज से अनुरोध किया कि वे मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचन्द्र का मंदिर बनाने में अपना पूर्ण सहयोग दें। उन्होंने स्पष्ट किया कि वे राम को देवी-देवता के बजाय राष्ट्रीय महापुरुष के रूप में स्वीकार करें। सरसंघचालक का यह कथन पिछले साठ साल के भटकाव से बाहर निकलकर एकात्म राष्ट्रीय समाज के निर्माण का रास्ता खोल देता है।

सत्तालोभी हतप्रभ

मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक के रूप में देखने वाला सत्तालोभी राजनेता वर्ग इस समय हतप्रभ सा है। वामपंथी इतिहासकार, जिन्होंने अपना पूरा बुध्दि चातुर्य बाबरी ढांचे के निर्माण के पूर्व एक हिन्दू मंदिर के अस्तित्व को नकारने में लगा दिया अनेकानेक साहित्यिक साक्षियों, ढांचे के भीतर व बाहर विद्यमान पुरातात्विक अवशेषों, यहां तक कि बारहवीं शताब्दी के शिलालेखों, लखनऊ पीठ के आदेश पर एक जापानी कंपनी द्वारा उस स्थल के भूगर्भीय राडार सर्वेक्षण और उस सर्वेक्षण के आधार पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संचालित उत्खनन की रपट को भी इन वामपंथी इतिहासकारों ने झुठलाने का दुस्साहस किया। वस्तुत: ‘बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी’ को हठधर्मी के रास्ते पर धकेलने का महापाप इन बौध्दिकों ने किया, जिसकी राष्ट्र को महंगी कीमत चुकानी पड़ी है।

यह संतोष की बात है कि कल के निर्णय में न्यायालय ने विवादित स्थल को राम जन्मस्थान के रूप में मान्यता दी है। न्यायालय ने पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग की उत्खनन रपट के आधार पर स्वीकार किया है कि एक विशाल हिन्दू धर्मस्थल को ध्वंस करके इस मस्जिद का निर्माण किया गया जो इस्लामी मान्यताओं के अनुसार मस्जिद कहलाने की अधिकारी नहीं है। अपने इन निष्कर्षों के पक्ष में न्यायालय ने साहित्यिक एवं पुरातात्विक साक्षियों के प्रभूत भंडार का उपयोग किया है। उसकी पूरी जानकारी तो 8189 पृष्ठों के विशालकाय निर्णय का सूक्ष्म अध्ययन करने पर ही मिल सकती है। उपरोक्त दो निर्णयों पर पहुंच जाने के बाद भी यह समझना कठिन है कि दो माननीय न्यायमूर्तियों सिवगत उल्लाह खान एवं सुधीर अग्रवाल ने ‘विवादित भूमि’ का तीन भागों में विभाजन करके एक भाग मुस्लिम पक्ष को देने का निर्णय क्यों दिया? जबकि तीसरे न्यायमूर्ति धर्मवीर शर्मा ने पूरा क्षेत्र हिन्दू पक्ष को ही सौंपने का निर्णय दिया। माननीय न्यायमूर्तियों ने अलग निष्कर्षों पर पहुंचने के लिए किन कानूनी और तथ्यात्मक तकर्ों का सहारा लिया है इसका पता तो पूर्ण निर्णय को पढ़कर ही लग सकेगा। किंतु दो के बहुमत का यह निर्णय मुस्लिम समाज पर भारी जिम्मेदारी डाल देता है। उसे सोचना होगा कि मुख्य विवादित स्थल के रामजन्मभूमि घोषित हो जाने के बाद एक तिहाई भूखंड का उसके लिए क्या प्रयोजन रह जाता है। यदि वकीलों और वोट लोलुप राजनेता वर्ग उसे वहां मस्जिद निर्माण के लिए उसकाता है तो क्या अनजाने में वह पांच सौ वर्ष पुरानी कटुता के अध्याय को जीवित रखने का दोषी नहीं ठहराया जाएगा। वस्तुत: न्यायालय के इस निर्णय का उपयोग वह स्वेच्छा से पहल करके उस अध्याय को सदा-सर्वथा के लिए बंद करने के लिए कर सकता है। कल टेलीविजन चैनलों पर विनोद मेहता (टाइम्स नाऊ) और बरखा दत्त (एनडीटीवी) को लगातार मुस्लिम समाज को भड़काने का प्रयास करते देखकर बहुत पीड़ा हुई। झूठे पंथनिरपेक्षतावादी पत्रकारों का एकसूत्री कार्यक्रम हिन्दू-द्वेष बन गया है। नरेन्द्र मोदी को फांसी चढ़ते देखना ही उनकी एकमात्र चाह है। अपनी इस विकृत मानसिकता को वे मुस्लिम समाज पर थोपने की जीतोड़ कोशिश कर रहे हैं। यह प्रसन्नता की बात है कि कल से अधिकांश मुस्लिम नेताओं और उलेमाओं ने उदार मन से इस निर्णय का स्वागत किया है।

इस निर्णय को एक अल्पविराम के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि ठीक ढंग से इसका उपयोग किया तो भारत के भविष्य को संवारने का माध्यम बन सकता है। इस निर्णय के बाद सर्वोच्च न्यायालय में जाने का रास्ता खुला है तो पारस्परिक सद्भाव के साथ संवाद की मेज पर बैठने का भी। वकीलों का एक वर्ग और राजनेता वर्ग चाहेगा कि सर्वोच्च न्यायालय में अपील का रास्ता अपना कर इस विवाद को और अनेक वर्षों तक लटकाये रखा जाय व अयोध्या में तनाव पूर्ण यथास्थिति बनी रहे। राष्ट्रहित की मांग है कि जल्दी से जल्दी इस विवाद का पटाक्षेप कर सौहार्द और एकता का अध्याय आरंभ हो। यदि भारत में यह अध्याय आरंभ हो सका तो पूरे विश्व को वर्तमान मजहबी ध्रुवीकरण से बाहर निकलने का रास्ता खुल जाएगा।

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2 Comments on "साठ वर्ष के भटकाव का अन्त"

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श्रीराम तिवारी
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आज की ताजा खबर -हिन्दू महा सभा ने और हामिद अंसारी ने अपनी ओर से निर्मोही अखाड़े को अधिकृत किया है की आगे का बट्बारा {तीन हिस्सों ]में कैसे हो ?निर्मोही अखाड़े के प्रवक्ता संत ज्ञानदास जी ने स्पष्ट कहा है की अयोध्या के बाहर के तत्संबंधी पैरोकार अपनी जुबान पर काबू रखें ओर साम्प्रदायिकता की आंच पर राजनेतिक रोटी सेंकना बंद करें -इशारा उन्ही को था जिनके हित जुड़े हुए हैं .

Awadhesh
Guest

बहुत अच्छा लेख. जैसे फैसले की गहराई मे जाकर लिखा गया है. माननीय उच्चन्यायालय का निर्णय आने वाले समय मे इतिहास की जडे हिला कर रख देगा इसमे कोइ सन्देह नही. बस विवाद खत्म होने का इन्तज़ार है.

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