लेखक परिचय

लिमटी खरे

लिमटी खरे

हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

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अपना सारा जीवन कोलकता के इर्दगिर्द समेटने वाले कम्युनिष्ट नेता ज्योति बसु का जीवन अनेक मामलों में लोगों के लिए उदहारण बन चुका है। भले ही उन्होंने पश्चिम बंगाल के कोलकता को अपनी कर्मस्थली के रूप में विकसित किया हो पर राष्ट्रीय परिदृश्य में उनके महत्व को कभी भी कमतर नहीं आंका गया। उन्होंने एक एसा अनूठा उदहारण पेश किया है जिसमें साफ परिलक्षित होता है कि कोई भी किसी भी सूबे में रहकर देश के राजनैतिक क्षितिज पर अपनी भूमिका और स्थान सुरक्षित कर सकता है।

ज्योति दा इसी तरह की बिरली शक्सियत में से एक थे। वे देश में सबसे अधिक समय तक किसी सूबे के निजाम भी रहे हैं। हिन्दुस्तान में वामपंथी विचारधारा के सशक्त स्तंभ के तौर पर उभरे थे बसु। इतना ही नहीं बसु एक समझदार, परिपक्व और धीरगंभीर नेतृत्व क्षमता के धनी थे। जिस तरह राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने विदेशों में अध्ययन के उपरांत देशसेवा की, कमोबेश उसी तर्ज पर ज्योति बसु ने ब्रिटेन में कानून के उच्च अध्ययन के उपरांत भारत वापसी पर कम्युनिस्ट आंदोलन में खुद को झोंक दिया था।

ज्योतिकिरण बसु को उनके परिवारजन प्यार से ”गण” पुकारते थे। 1935 में वे ब्रिटेन गए और वहां भारतवंशी कम्युनिस्ट विचारधारा के रजनी पाम दत्त के संपर्क में आए। इसके बाद लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स के राजनीति शास्त्र के व्याख्याता हेलाल्ड लॉस्की, के व्याख्यानों का उन पर गहरा असर हुआ। चूंकि लॉस्की खुद वाम विचारधारा के बहुत बडे पोषक थे, अत: इसके उपरांत बसु वाम विचारधारा में रच बस गए।

1944 में कम्युनिस्ट आंदोलन से खुद को जोडने वाले बसु 1946 में पश्चिम बंगाल विधानसभा के सदस्य बने। इसके बाद बसु ने कभी पीछे पलटकर नहीं देखा। 23 साल का अरसा कम नहीं होता। अगर कोई लगातार इतने समय तक एक ही राज्य का मुख्यमंत्री रहे तो मान लेना चाहिए कि उसकी कार्यशैली में दम है, तभी सूबे की रियाया उस पर लगातार भरोसा कर सीएम की कुर्सी पर उसे काबिज करती रही है।

आपातकाल के दौरान 1977 में बसु पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे फिर अपने स्वास्थ्य कारणों के चलते 2000 में उन्होंने सक्रिय राजनीति को अलविदा कह दिया। बसु की कुशल कार्यप्रणाली और लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि राज्य की जनता ने उन पर 23 साल लगातार विश्वास किया।

मुख्यमंत्री निवास को जतने के बाद उन्होंने एक और अनुकरणीय पहल की। वे पार्टी के लिए पथ प्रदर्शक की भूमिका में आ गए, वरना आज के राजनेता उमरदराज होने के बाद भी सत्ता का मोह नहीं छोड पाते हैं। ढलते और कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद व्हील चेयर और अन्य चिकित्सा उपकरणों का सहारा लेकर चलने वाले राजनेताओं को बसु से प्रेरणा लेना चाहिए। जिस तरह अटल बिहारी बाजपेयी ने अपने आप को सक्रिय राजनीति से दूर कर लिया है, उसी मानिंद अब एल.के.आडवाणी, कुंवर अर्जुन सिंह, प्रभा राव, आदि को राजनीति को अलविदा कहकर पार्टी के लिए मार्गदर्शक की भूमिका में आ जाना चाहिए, किन्तु सत्ता मोह का कुलबुलाता कीडा उन्हें यह सब करने से रोक देता है।

पश्चिम बंगाल में भूमिसुधार कानून और पंचायत राज के सफल क्रियान्वयन ने बसु को जननायक बनाया था। ज्योति बसु ने आम आदमी के हितों को साधने में कोई कोर कसर नहीं रख छोडी थी। देश में कम्युनिस्ट पार्टी के पर्याय के तौर पर देखे जाने लगे थे ज्योति बसु। एक तरफ जब विश्व में कम्युनिस्ट सोच का सूरज अस्ताचल की ओर चल दिया था, तब भी हिन्दुस्तान में कम्युनिज्म विचारधारा का पर्याप्त पोषण सिर्फ और सिर्फ ज्योति बसु के चलते ही हो सका।

बसु के अंदर योग्यताओं का अकूत भण्डारण था। एक समय आया था जब केंद्र में घालमेल सरकार बनने का समय आया तब ज्योति बसु को प्रधानमंत्री मान ही लिया गया था। वक्ती हालात इस ओर इशारा कर रहे थे कि सर्वमान्य नेता के तौर पर ज्योति दा के अलावा और कोई नाम नहीं सामने आ पाया। इस समय पार्टी ने अपनी दखियानूस विचारधारा के चलते ज्योति दा को इसकी अनुमति नहीं दी। ज्योति दा ने पार्टी के फैसले को चुपचाप शिरोधार्य कर लिया। उस समय उन्होंने इस मसले पर एक लाईन की टिप्पणी ”एक एतिहासिक भूल” कहने के बाद अपने काम को पुन: आगे बढा दिया।

मुख्यमंत्री पद के तजने के बाद वे हाशिए में चले गए हों एसा नहीं था। पार्टी जानती थी कि ज्योत दा का क्या महत्व है, राजनीति में। ज्योति दा के दीर्घकालिक अनुभवों का पर्याप्त दोहन किया इन दस सालों में पार्टी ने, वरना आज की गलाकाट राजनैतिक स्पर्धा में वर्चस्व की जंग के चलते बसु को हासिए में डालने में देर नहीं की जाती। यह तो उनका निर्मल स्वभाव, त्याग, तपस्या और बलिदान था जिसका लगातार सम्मान किया था पार्टी ने।

ज्योति बसु आज के समय में बहुत प्रासंगिक माने जा सकते हैं। आज जब नैतिकता की राजनीति और चरित्रवान जनसेवकों का स्पष्ट अभाव है, तब ज्योति बसु का जीवन प्रेरणा के तौर पर काम आ सकता है। ज्योति बसु जैसे गंभीर और अनुशासित नेता, जिनके अंदर राजनैतिक सोच कूट कूट कर भरी थी, दुनिया भर में लाल झंडे के लगभग अवसान के बावजूद भी हिन्दुस्तान जैसे देश में उसे फक्र के साथ फहराना, सिर्फ और सिर्फ बसु के बस की ही बात थी। ऐसे महामना को शत शत नमन. . .।

-लिमटी खरे

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