लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

शिक्षा : एम.ए. राजनीति शास्त्र, मेरठ विश्वविद्यालय जीवन यात्रा : जन्म 1956, संघ प्रवेश 1965, आपातकाल में चार माह मेरठ कारावास में, 1980 से संघ का प्रचारक। 2000-09 तक सहायक सम्पादक, राष्ट्रधर्म (मासिक)। सम्प्रति : विश्व हिन्दू परिषद में प्रकाशन विभाग से सम्बद्ध एवं स्वतन्त्र लेखन पता : संकटमोचन आश्रम, रामकृष्णपुरम्, सेक्टर - 6, नई दिल्ली - 110022

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-विजय कुमार

इन दिनों देश में सावन और भादों का मौसम चल रहा है। इस मौसम की बहुत सी अच्छाईयां हैं, तो कुछ कमियां भी हैं। वर्षा कम हो या अधिक, परेशानी आम जनता को ही होती है। इन दिनों वर्षा के न होने से, न तो धरती की प्यास बुझेगी और न ही खेत-खलिहान और कुएं-तालाब भरेंगे। सावन के बिना ‘सावन के अंधे’ जैसी कहावत, तीज, कांवड़ और रक्षाबंधन जैसे पर्वों का भी अस्तित्व न होता। कवियों के लिए भी यह अति सुखकारी है। झूला झूलती कोमलांगियों को देखकर उनकी प्रतिभा जाग उठती है। जिसने इस मौसम में नई कविता नहीं लिखी, कवि लोग उसे अपनी बिरादरी से निकाल देते हैं।

पर यह सावन-भादों का मौसम कीचड़ और फिसलन की समस्या भी लेकर आता है। सड़क पर यदि कोई फिसल पड़े या कीचड़ में रंग जाए, तो कुछ लोग हंसते हैं और कुछ उसे संभलने में सहायता करते हैं; पर यह फिसलन अगर जीभ की हो, तो फिर कई समस्याएं खड़ी हो जाती हैं।

कहते हैं, एक बार दांत ने जीभ को जोर से काट लिया। जीभ ने समझाया, तो दांत ने फिर काट लिया। अब तो जीभ ने भी बदला लेने की ठान ली। एक बार किसी पहलवान के सामने जीभ दस-बीस गाली देकर चुप बैठ गयी। पहलवान ने दो घूंसों में ही श्रीमान जी की बत्तीसी झाड़ दी। सुना है तब से दांत कभी जीभ से झगड़ा नहीं करते।

जिह्ना ऐसी बावरी, कर दे सरग पताल।

आपन कह भीतर गयी, जूती खात कपाल।।

कुछ लोगों का मत है कि जीभ की फिसलन का संबंध दिमागी कीचड़ से अधिक है। विश्वास न हो, तो चिदम्बरम, दिग्विजय और पासवान के बयान को ही सुन लें। पता लग जाएगा कि उनके दिल में भरा दुर्गन्धित कीचड़ खतरे के निशान से ऊपर बह रहा है। मुलायम सिंह की बातें समझ में ही नहीं आतीं। इसलिए उनकी जीभ की फिसलन का स्तर नापना संभव नहीं है। वैसे भी दिल्ली और लखनऊ में उनकी जीभ का रंग-ढंग बदल जाता है। लालू जी की बात पर राबड़ी देवी और उनकी भैंसें भी ध्यान नहीं देतीं, इसलिए उसकी चर्चा व्यर्थ है।

भारी व्यक्तित्व वालों के साथ दोहरी समस्या होती है। वे स्वयं तो फिसलते ही हैं, प्रायः साथ वालों को भी फिसला देते हैं। गडकरी द्वारा पिछले दिनों अपने विरोधियों के सम्मान में तलुवे चाटने वाले कुत्ते, दामाद, खसम और डायन जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना इसी फिसलन का परिणाम हैं। वैसे मुंबई और दिल्ली में मिट्टी की चिकनाई भी अलग-अलग है। सुना है अब वे संभल कर चलने और बोलने का अभ्यास कर रहे हैं।

इस बारे में मैडम इटली और मनमोहन जी सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं। उनकी जीभ फिसलने का कोई खतरा नहीं है। क्योंकि वे सदा चुप रहते हैं। कभी बोलना ही हो, तो वे कुछ समझदार लोगों से भाषण लिखा लेते हैं। इसलिए गलती होने की संभावना नहीं रहती। विनोबा भावे तो मौन को सर्वोत्तम भाषण कहते थे।

पिछले दिनों हिन्दी साहित्य में भी खूब फिसलन का दौर रहा। लाल लेखकों के बीच बड़े माने जाने वाले विभूति नारायण राय की जीभ फिसली, तो वह कई लेखिकाओं को लपेटते हुए ‘छिनाल’ से लेकर ‘कितने बिस्तर में कितनी बार’ तक जा पहुंच गई। इस कीचड़ से ‘नया ज्ञानोदय’ और रवीन्द्र कालिया के हाथ-मुंह भी रंग गये। अब वे और कई बूढ़े हंस, बगुला भगत की तरह सिर झुकाए, जीभ में ताला डाले बैठे हैं।

वैसे ‘ज्ञानपीठ’ का इतिहास सदा सत्तापक्ष की ओर फिसलने का ही है। इस विवाद में अब हर साहित्यकार फिसल रहा है। सबको लग रहा है कि फिसले हुओं पर यदि कुछ कीचड़ उन्होंने न उछाला, तो कहीं वे ‘काफिर’ या ‘पतित’ घोषित न कर दिये जाएं।

कुल मिलाकर मेरा निष्कर्ष यह है कि दोष फिसलने वालों का नहीं, सावन-भादों के सुहाने मौसम का है। आप भी इसका आनंद तो लें; पर फिसलते हुए इतनी दूर न पहुंच जाएं कि माफी भी काफी न हो।

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1 Comment on "फिसलन का मौसम"

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श्रीराम तिवारी
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अब हमारे मध्यप्रदेश में तो भादों सूखा -कुंआर सूखा ;सूखा सकल जहान-जैसे हालत हैं -अब वो जमाना भी नहीं रहा की कहें -कहूँ कहूँ वृष्टि शारदी थोरी कोऊ एक पाँव, भगति जिमी मोरी ..
{रामचरितमानस }

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