लेखक परिचय

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी

प्रवीण गुगनानी, दैनिक समाचार पत्र दैनिक मत के प्रधान संपादक, कविता के क्षेत्र में प्रयोगधर्मी लेखन व नियमित स्तंभ लेखन.

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प्रवीण गुगनानी

अतिक्रमण एक ऐसा शब्द है जो आजकल सर्वाधिक चर्चा में है खासतौर से व्यावसायिक अतिक्रमण जो की छोटी छोटी दुकानों याँ यूँ कहे की गुमटियों के माध्यम से किया गया अतिक्रमण खास तौर चर्चा में रहता है .सामाजिक ,राजनैतिक ,प्रशासनिक और समाचारी दुनिया में जिस बात की सर्वाधिक चर्चा हो रही हो उस बात को निश्चित ही हमें समझना और विश्लेषित करना चाहिए .जब हम अतिक्रमण की बात करते है तो तुरंत ही हमारे मानस में उस अतिक्रमण करने वाले व्यक्ति के प्रति आपराधिक कृत्य के करने जैसी या व्यवस्था तोड़ने वाले व्यक्ति की छवि बनाने को मजबूर हो जाते है ;और जब हम किसी के प्रति प्रारम्भ में ही इस प्रकार की छवि बना लेते है तो उसके प्रति हमारा रवैया या आचरण न्यायपूर्ण रहेगा इस बात में शंका हो जाती है . आज के इस दौर में हो यही रहा है हर अतिक्रमणकारी को प्रारंभ से पूर्वाग्रह पूर्वक दोषी और गलत मान लेने की प्रवृत्ति समाज ,प्रशासन और राजनीति तीनो स्तर पर अन्याय उत्पन्न करती है याँ यू कहे की प्राकृतिक न्याय व्यवस्था के विपरीत जाती है .यहाँ प्राकृतिक न्याय एक शब्द या टर्म है जिसे हमें भावनाओं के स्तर पर जाकर समझना होगा. बेरोजगारों के प्रति प्रशासन और राजनीति तथाकथित तौर पर चिंतित है ,इस चिंता में संवेदना का पूट देने के लिये ही हमें प्राकृतिक न्याय शब्द का अधिकाधिक प्रयोग छोटी छोटी दुकानों और गुमटियों के अतिक्रामकों के साथ किये जाने वाले सामाजिक व्यवहार या क़ानूनी कार्यवाहियों के सम्बन्ध में आवश्यक हो जाता है.आज के समय में बड़े बड़े ओद्योगिक घरानों, नेताओ और संगठनों द्वारा हजारों करोड़ की भूमि को तिकडम पूर्वक कब्जाया जाया रहा हो या षड्यंत्र पूर्वक कोडियों के मोल खरीदा जा रहा हो;और ये सभी सिर्फ साधन संपन्न, प्रभावी और रसूखदार होने के कारण कानून की जद से दूर है. ये सभी बड़े कब्जेदार संपन्न व सुद्रढ़ होते हुए भूमि कब्जाते है तब प्रशासन इनका नाम कम लेता है और इन बेरोजगार छोटे छोटे अतिक्रामको के विषय सर पर उठा लेता है.अफ़सोस तब होता है जब मीडिया भी प्रशासन के सुर में सुर अलापने लगता है.

महानगरीय, नगरीय और ग्रामीण स्तर पर छोटी छोटी दुकानों के संदर्भ में व्यवस्थाओं के विषय में आवश्यक है की समाज,जन प्रतिनिधि, न्याय व्यवस्था,प्रशासन और मीडिया इस ओर संवेदना पूर्वक ध्यान दे क्योकि ये गुमटियां हमारे मध्यम वर्गीय भारतीय समाज की दिनचर्या का आवश्यक अंग हो गई है. निम्न औसत आय वाले अधिसंख्य परिवार अपनी जरूरतों को सामान इनसे दैनिक या साप्ताहिक खरीदते है और इनसे सामान खरीदने के लिये उन्हें पेट्रोल खर्च नहीं करना पड़ता बल्कि समय भी नहीं लगता है. अधिकांश अवसरों पर यह होता है की परिवार के आपूर्तिकर्ता बच्चे बन जाते है और वे ही पास की इन दुकानों से सामान की खरीद फरोख्त करके ले आते है .हमें इन दुकानों कि आवशयकता को भारतीय स्तर पर ही समझना होगा, हमें नगरीय बसाहट के अन्तराष्ट्रीय मानकों के फेर में नहीं पढ़ना चाहिए न ही बड़े बड़े व्यावसायिक घरानों,शापिंग माल मालिकों याँ अन्तराष्ट्रीय कंपनियों के फेर में पढ़ना चाहिए. बड़े सुपरमार्केट मालिकों की गिद्ध दृष्टि सदा से इन छोटी कहती दुकानों के बड़े अर्थशास्त्र पर रही है. अपने कम खर्च और दूकान मालिकों की मेहनत ,श्रम,लगन के कारण ये दुकाने बहुत कम मुनाफे में सामन बेचने में सफल हो जाती है और ग्राहकों को न सिर्फ सस्ती सेवाएं और सामन देती है बल्कि उपभोक्ताओं से व्यक्तिगत व भावनात्मक स्तर पर जुडी रहती है जिससे सामाजिक एकात्मकता और समरसता का भाव भी उत्पन्न होता है.

इन छोटी दुकानों और गुमटियों के प्रति यदि हमारा सभ्य समाज संवेदना पूर्ण आचरण रखता है तो यह उनके प्रति दया भाव से कम एवं आवश्यकता भाव से अधिक रहता है किन्तु इस बात को अधिसंख्य अवसरों पर हमारा तथाकथित विकसित समाज और थोड़ी कम संवेदना रखने वाला प्रशासन समझ नहीं पाता है.

हम हमारी निम्न वर्गीय, निम्न माध्यम वर्गीय व उच्च माध्यम वर्गीय दैनिक आवश्यकताओं और उनकी पूर्ति की ओर देखेंगे तो पाएंगे कि अधिकांश आबादी और मोहल्लो में उनकी दैनिक जरूरतों कि पूर्ति इन अतिक्रामकों द्वारा ही की जाती है.नाई ,टेलर,सब्जी,किराना,स्टेशनरी,धोबी,आदि अनेक सेकडो जरूरतों को ये दुकाने ही पूरा करती है.हमारे ध्यान में अक्सर यह आता है की जैसे ही किसी मोहल्ले या नगरीय उपनगरीय क्षेत्र में अतिक्रमण हटाया जाता है तब हम जिन दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये पैदल चले जाते थे उसके लिये दो पांच या सात किमी गाड़ी चलाकर जाते है और पेट्रोल और समय दोनों ही अधिक खर्च करते है. अब प्रश्न यह है की यदि ये छोटी छोटी दुकाने या गुमटियां इतनी ही आवश्यक है तो प्रशासन ने इनके लिये व्यवस्थाएं आवासीय क्षेत्रों में क्यों नहीं की और यदि नहीं की है तो वह इन अतिक्रामकों को कुछ उदार शर्तों किन्तु व्यवस्थित बसने की अनुमति देकर दुकानदार और आम जनता दोनों की ही सुविधाओं में विस्तार क्यों नहीं करता? नगरीय प्रशासन को यह भी समझना होगा की अतिक्रमण की दुकान को हटाने से वह उस दूकानदार व उसमे काम कर रहे एक या दो कर्मचारियों के परिवार को बेरोजगार कर वह एक नई समस्या को जन्म भी दे रहा है.

यहाँ यह आवश्यक रूप से ध्यान देने योग्य और हैरत अंगेज आकड़ा है की इन छोटी गुमटियों में लगभग चालीस हजार करोड़ रुपयों का व्यवसाय होता है जिसको देखकर कई अन्तराष्ट्रीय खुदरा व्यापार कंपनियों के मुंह में लार टपकने लगती है. ये गुमटियां न सिर्फ एक बड़ा आर्थिक तंत्र चलाए हुए है बल्कि इन दुकानों से लगभग दस करोड़ लोग प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े हुए है. किसी छोटे मोटे अफ़्रीकी देश की कुल अर्थ और मानव व्यवस्था के बराबर है यह गुमटी का कारोबार!! इतने बड़े व्यवसाय और इतनी विशाल श्रम शक्ति को विनियोजित करने वाले इस अदभुत गुमटी उपक्रम या व्यापार के प्रति हमारे समाज,प्रशासन,राजनीति और न्याय व्यवस्था और सबसे बड़ी बात मीडिया को ध्यान देना ही होगा. और यदि हम इस ध्यान नहीं देते है या द्रष्टिकोण में आवश्यक परिवर्तन नहीं लाते है तो निश्चित तौर पर हम परिस्थितियों का आकलन नहीं कर रहे है या जान बूझकर आँखें बंद किये हुए है.

नगरीय प्रशासन नई बसने वाली बसाहटों में इस ओर ध्यान दे रहा है यद्दपि इसमें और सुधार की प्रयाप्त संभावनाएं है. किन्तु जो पुरानी बसाहटें है वे स्वाभाविक रूप से अधिक घनी है और एक बड़ी जनसँख्या को संधारित करती है, वहां यह समस्या विकराल है. खरीददार अधिक होते है औ दुकाने कम होती है जिससे स्वस्थ प्रतिस्पर्धात्मक व्यवसाय नहीं होता है और माध्यम वर्गीय व्यक्ति अपनी दैनिक आवश्यकताओं कि वस्तुओ को महँगी दर पर खरीदने को मजबूर हो जाता है. मुश्किल इन घनी बस्तियों में तब और अधिक भयंकर हो जाती है जब इन दुकानों को अतिक्रमण के नाम हटा दिया जाता है. प्रश्न यह है की इन दुकानों को हटाने के बाद ये पुनः उस स्थान पर दो तीन माह वैसी ही बस जाती है तब इन गुमटियों को नगरीय प्रशासन बस्तियों ,मोहल्लो के आकार के अनुरूप बसाने का प्रयास एक बार में ही क्यों नहीं कर लेता . ऐसा करके नगरीय प्रशासन इनसे नियमित किराया लेकर अपनी आय भी बढ़ा सकता है. आज तेज और भागमभाग के युग में ये गुमटियां मध्यम वर्ग के जीवन का अभिन्न अंग हो गई है तब प्रशासन को भी चाहिए की वह सिर्फ अतिक्रमण को हटाने पर नहीं बल्कि उन्हें पुनः बसने पर भी ध्यान दे. उत्तम होगा यदि प्रशासन इन छोटी गुमटियों या दुकानों को हटाने के पहले या अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाने के पहले इनकी पुनर्वास योजना को भी बना ले और साथ साथ हटाने और बसाने का चरणबद्ध कार्यक्रम चलाकर इन दुकानदारों को बेरोजगार होने से बचाये. यदि ऐसा होता है तो निश्चित ही हमारा समाज और प्रशासन संवेदनशील होने के साथ साथ तार्किकता पूर्ण व्यस्था की ओर अग्रसर होग . .

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