लेखक परिचय

डा. राधेश्याम द्विवेदी

डा. राधेश्याम द्विवेदी

Library & Information Officer A.S.I. Agra

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डा.राधेश्याम द्विवेदी
स्मारक किसे कहते हैं:- कोई वस्तु या रचना जो किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति या घटना की स्मृति को बनाए रखने के लिए हो, स्मारक कहलाता है, जैसे- शहीद स्मारक, मकबरा, समाधि, स्तूप और निशानीय स्मृति चिह्न आदि। राष्ट्रीय स्मारक एक एसा स्मारक होता है जिसे उस देश के इतिहास, राजनीति या उसके लोगों के अनुकूल किसी अति महत्वपूर्ण घटना की स्मृति में निर्मित किया जाता है। यह उस देश की संस्कृति, सम्मान एवं विचारधारा का प्रतीक एवं राष्ट्रीय-पहचान का अभिन्न अंग माना जाता है। स्मरण कराने वाला, याद दिलाने वाला, यादगार, मेमोरियल आदि भी स्मारक की श्रेणी में आते हैं। पुरातत्व अधिनियम के अंतर्गत राष्ट्रीय-महत्व का घोषित किया गया स्मारक संरक्षित स्मारक कहलाता है। एसे सारे पुरा स्मारक और एतिहासिक स्मारक, जो प्राचीन एवं एतिहासिक स्मारक तथा पुरातत्व स्थल व पुरावशेष (राष्ट्रीय महत्व उद्घोषणा) अधिनियम, 1958 या राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 126 के अंतर्गत राष्ट्रीय महत्व के घोषित किये गए हैं- इन अधिनियमों के अंतर्गत संरक्षित स्मारक हैं। बहुत सारे और प्रभावशाली कानूनों के होते हुए भी पुरा संपदा की चोरी,अवैध कब्जा, स्मारक के निषिद्ध तथा प्रतिनिषिद्ध क्षेत्र में नव निर्माण करना, अवैध हस्तानान्तरण और किसी न किसी तरह जनता द्वारा इनका विरूपण और क्षतिग्रस्त किया जाना दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है।
कैग की रिपोर्ट :- भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा 2014 में सौंपी गई एक रिपोर्ट में इस बात को उजागर किया गया है कि भारतीय पुरात्तव सर्वेक्षण देश के संग्रहालयों और स्मारकों की रक्षा करने में पूरी तरह से असमर्थ रहा है। कैग की जांच में पता चला है कि 1655 स्मारक जो कि एएसआई संरक्षित स्मारक थे, उनमें से 92 के नमूने पूरी तरह से अनुसरणीय थे। ये सभी बिनी किसी अपनी पहचान को छोड़े गये थे जो अब गायब ही हो चुके हैं। केन्द्र द्वारा निरीक्षण में 1,655 संरक्षित स्मारकों में 546 स्मारकों में कैग ने अतक्रिमण पाया, जबकि एएसआई ने उसे 249 स्मारकों में ही अतक्रिमण की रिपोर्ट दी थी। 3,886 में से सिर्फ 116 स्मारक ऐसे हैं, जहां पर टिकट काउंटर बने हुए हैं, पिछले पांच सालों में 125 करोड़ रूपये की राशि ही उत्पन्न की जा सकी है। औसतन ये राशि हर साल 25 करोड़ रूपये की होती है।
वाह्य परिदृश्य बदल जाते हैं :- अंग्रेजों के जमाने में राष्ट्रीय सम्पत्ति को कोई हाथ नहीं लगाता था। जब से आवासीय समस्यायें वलवती हुई लोगों में सरकारी सम्पत्ति को कब्जाने की प्रबृत्ति वढ़ने लगी। सरकारी सम्पत्ति का रख रखाव में लगे लोग अपनी जिम्मेदारियों से मुख मोड़ते देखे गये हैं । वे अप्रत्यक्ष रुप से इस काम को बढ़ावा देने लगे हैं। कहीं कही तो अज्ञानता बस सरकारी सम्पत्ति पर अतिक्रमण होने लगे, तो ज्यादातर लोग जानबूझकर सरकारी सम्पत्ति को हथियाने लगे। राजनीतिक और प्रभावशाली लोग इसको ज्यादा नुकसान पहुंचाने लगे। जिन पर इसके रक्षा की जिम्मदारी है वही उसके व्यक्तिगत प्रयोग का रास्ता दिखाने लगे। एक समय एसा भी आ जाता है कि स्मारक का वाह्य परिदृश्य तक बदल जाता है। कुछ भाग पर अनियमित कब्जा तक हो जाता है। एक तरफ हम उन्हें सरकारी जिम्मेदारी की नोटिस देते हैं और थोडे से प्रलोभन में हम वह सम्पत्ति का स्वरुप बदलने से उसे रोकने मे असमर्थ हो जाते है।
अपराधिक केस दायर नही होते :- कानूनन मनाही होने के बावजूद व्यवहारिक धरातल पर हम इन अतिक्रमणों को रोक पाने में सक्षम नहीं हो पाते हैं। पुरातत्व सर्वेक्षण अपने मण्डलों व उपमंडलों के माध्यम से इनकी रक्षा तथा संरक्षा का प्रयास करती है। पूरे देश में 3886 स्मारक हैं। हर स्मारक की देखरेख के लिए कर्मचारी नहीं उपलब्ध हो पाता है। इसका लाभ अतिक्रमणकारी उठा लेता है। यदि कहीं पुरातत्व अधिनियम का उलंघन होता हैं तो उसक्षेत्र का सम्पत्ति अधिकारी / अधीक्षण पुरातत्वविद् सम्बन्धित व्यक्ति को पुरातत्व के 2010 के संशोधित अधिनियम के खण्ड 20 (क) उपधारा 2, 3 व 4 के उलंघन पर कारण बताओं नोटिस जारी करता है। इसकी प्रति पुलिस, जिला प्रशासन तथा आयुक्त को भी सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु भेजी जाती है। इस नोटिस के परिपालन हेतु वाद दायर नहीं किया जाता ना ही अधिकारियों से व्यक्तिगत सम्पर्क कर कार्यवाही करने के लिए दखल किया जाता है। परिणामतः हम अपने लक्ष्य को पाने में विफल रह जाते हैं।
सक्षम अधिकारी कर्तव्य पालन से विमुख :- भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय के अन्तर्गत राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण का गठन प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष (संशोधन एवं विधिमान्यकरण) अधिनियम 2010 के द्वारा किया गया जो मार्च 2010 में प्रभावी हुआ। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण को संरक्षित स्मारकों एवं पुरास्थलों की सुरक्षा एवं संरक्षा से संबंधित विभिन्न कार्यों के अनुपालन की जिम्मेदारी प्रतिषिद्ध क्षेत्र एवं विनियमित क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य में सौंपी गयी है। नगरीकरण के विकास एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण संरक्षित स्मारकों के आसपास स्थित भूखंडो पर लगातार बढ़ते दबाव के कारण स्मारकों एवं पुरास्थलों के ऊपर प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। नगरीकरण के विकास एवं जनसंख्या वृद्धि के कारण संरक्षित स्मारकों के आसपास स्थित भूखंडो पर लगातार बढ़ते दबाव के कारण स्मारकों एवं पुरास्थलों के ऊपर प्रतिकूल प्रभाव हो रहा है। ऐसी स्थिति में यह आवश्यक है कि स्मारकों के सरंक्षण एवं व्यक्तिगत आवश्यकताओं, विकास कार्यो के बीच समन्वय स्थापित किया जाए।
प्रतिरोधक क्षेत्र अधिसूचित :- इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण ने आरंभिक उपाय के रूप में स्मारक के चारों तरफ के क्षेत्र भूखंडो को ‘प्रतिरोधक क्षेत्र’ के रूप में अधिसूचित किया। यह अधिसूचना 1992 में जारी की गयी, जिसके अनुसार स्मारक के संरक्षित क्षेत्र के सभी दिशाओं में 100 मी॰ की दूरी को प्रतिषिद्ध क्षेत्र एवं इस सीमा के परे 200 मी॰ की दूरी में स्थित क्षेत्र को विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया। 2010 में किये गये संशोधन के पहले ऐसी व्यवस्था थी कि कोई भी व्यक्ति यदि इन प्रतिषिद्ध क्षेत्र विनियमित क्षेत्र में निर्माण मरम्मत या खनन कार्य करना चाहता था तो उसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त करना होता था। 2006 में इस प्रक्रिया को सुदृढ़ करने हेतु एक विेशेषज्ञ समिति गठित की गयी, जिसका मुख्य कार्य प्रतिषिद्ध क्षेत्र से संबंधित अनापत्ति प्रमाण पत्र हेतु आवेदन के संबंध में महानिदेशक, भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण को परामर्श देना था। 2010 में इन प्रावधानों में भी बदलाव किया गया जो प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल एवं अवशेष (संशोधन एवं विधिमान्यकरण) अधिनियम 2010 के रूप में अस्तित्व में आया। इसके अन्तर्गत राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण एवं सक्षम प्राधिकारी का गठन किया गया। वर्तमान में प्रतिषिद्ध क्षेत्र एवं विनियमित क्षेत्र में निर्माण मरम्मत कार्य से संबंधित सभी आवेदन पत्र उस क्षेत्र के सक्षम प्राधिकारी के पास जमा किये जाते हैं और वहॉ से अग्रसारित होकर विचार के लिए राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण को भेजा जाता है। पुरातत्व अधिनियम में निषिद्ध क्षेत्र और विनियमित क्षेत्र का दायरा बनाया गया है। स्मारक के पास निषिद्ध क्षेत्र और विनियमित क्षेत्र घोषित किया गया। यह क्षेत्र विना किसी परिवर्तन का रहे । इस पर कोई नव निर्माण ना हो इसके लिए कानून बनाये गये। बहुत आवश्यक होने पर सक्षम अधिकारी की अनुमति से ही इस पर नव निर्माण की अनुमति दी जाने लगी। सरकारी राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्र सरकार है जो एक संरक्षित स्मारक सटे अर्थ है, खनन कार्य या निर्माण या दोनों के प्रयोजनों के लिए एक निषिद्ध क्षेत्र घोषित किया है। केन्द्र सरकार खनन संचालन और निर्माण दोनों के प्रयोजनों के लिए इस क्षेत्र को निषिद्ध किया है। सभी संरक्षित स्मारकों की रक्षा की सीमा से 100 मीटर की दूरी के लिए क्षेत्रों की घोषणा की गई है। केन्द्रीय सरकार को खनन संचालन और निर्माण दोनों के प्रयोजनों के लिए क्षेत्र विनियमित किया जा करने के लिए 200 मीटर तक के क्षेत्र और भविष्य में इसे और परे निषिद्ध होने की रक्षा की सीमा से 100 मीटर की दूरी तक की घोषणा कर रखी है।
एनओएपीएस पोर्टल :- एनओएपीएस पोर्टल एनआईसी द्वारा तैयार किया गया है। इस पोर्टल के निर्माण में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की तकनीक एवं विशेषज्ञता का उपयोग किया गया है। संगठन देश में मौजूद सभी 3,886 एएसआई संरक्षित स्मारकों के मानचित्रण का कार्य कर रहा है। राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। इस अधिनियम के द्वारा कुछ अन्य महत्वपूर्ण बदलाव भी किए गये जिनमें प्रमुख हैं-प्रतिषिद्ध एवं विनियमित क्षेत्र हेतु वैधानिक प्रावधान। प्रतिषिद्ध क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण कार्य (सार्वजनिक परियोजना सहित) पर पूर्णतः रोक है । निर्माण कार्य, मरम्मत, पुनरूद्वार कार्य के अनुमति हेतु आवेदन पत्रों के लिए वैधानिक प्रक्रियाओं का प्रावधान है। प्राधिकरण , विरासत उपनिधियो मे आवश्यक समीक्षा करेगा ओर आम जनता से प्राप्त सलाहो एवं आपत्ति को ध्यान में रखते हुए इसे अनुमोदित करेगा।
निष्ठा तथा पारदर्शिता जरुरी :- इन सरकारी प्राविधानों का पालन कहीं कही तो हो जाता हैं जहां राज्य सरकार के पुरातत्व अधिकारी यह मामला देखते हैं वे प्रायः सभी औपचारिकता पूरा करते देखे गये हैं। जहां तहसील तथा कलेक्टरी के अधिकारी इस काम को देखते हैं वहां पारदर्शिता नहीं दिखा पाते और यह मिशन आधा अधूरा सा दिखने लगता है। आयुक्त कार्यालय में पुरातत्व के नार्म को समझने वाले नहीं होते वहां तहसील तथा कलेक्टरी के अधिकारी उसी तरह की मानसिकता के साथ बैठे पाये जाते हैं जो छोटे से छोटे प्रलोभन में आकर अवैध कब्जाधरियों से अवैध धन की उगाही करते देखे तथा सुने जाते हैं। इन स्टाफ का काम निषिद्ध और प्रतिनिषिद्ध क्षेत्रों में निर्माण की अनुमति तथा अनापत्ति देने का दिया गया है। अधिनियम में यह स्पष्ट प्रावधान है कि सक्षम प्राधिकारी का स्तर राज्य सरकार में आयुक्त या पुरातत्व निदेशालय के निदेशक या केन्द्रीय सरकार में निदेशक के समकक्ष होना चाहिए इसके नीचे के स्तर का नहीं। सक्षम प्राधिकारियों की नियुक्ति राज्य सरकार की सहमति एवं परामर्श से की जाएगी। वर्तमान में 34 सक्षम प्राधिकारियों की नियुक्ति की जा चुकी है। संस्कृति मंत्रालय के अंतर्गत आने वाला राष्ट्रीय स्मारक प्राधिकरण (एनएमए), केन्द्रीय संरक्षित स्मारकों के आसपास निषिद्ध और विनियमित क्षेत्र के प्रबंधन के माध्यम से स्मारकों और स्थलों के संरक्षण के लिए जिम्मेदार है। स्मारकों के सुरक्षा के लिए वास्तविक धरातल पर वहुत कुछ किया जाना चाहिए। इसको पूरी निष्ठा तथा पारदर्शिता से निभाया जाना चाहिए। जब तक हमारे मानव मूल्यों में आमूल परिवर्तन नहीं आयेगा और हम इसे अपने जमीर से जोड़कर नहीं देखेगे, इसमें वास्तविक परिवर्तन हो पाना मुश्किल है। इसके लिए निष्ठावान तथा समर्पित व्यक्तित्व की आवश्यकता है। इसी से हम अपने स्मारको की सही सुरक्षा तथा संरक्षा कर सकते हैं।

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