लेखक परिचय

विपुल समाजदार

विपुल समाजदार

राम लाल आनंद कॉलेज, दिल्ली विश्व विद्यालय के हिन्दी पत्रकारिता के छात्र।

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photoसनातन धर्म की रक्षा व प्रसार-प्रचार का दायित्व संतों, धर्मगुरुओं, ब्राह्मणों का था और है भी। इन्होंने अपने दायित्व का निर्वाह क्यों नहीं किया?

आज हिन्दू धर्म (डाकू, चोर आदि) धर्म भारतीय कागजों में घुस गया। सनातन धर्म को खदेड़ कर जन-जन में प्रवेश कर रहा है। क्यों ? क्यों?? आखिर क्यों??? जबकि सनातन धर्म एक विशाल महाशास्त्र, महावृक्ष है, समस्त प्राणियों की रक्षा का धर्म है सनातन धर्म का प्रवर्तक , ओंम है। हिन्दू धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है। सरकारी तन्त्र एवं बौद्धिक तन्त्र, साहित्यकारों, देश के कर्णधारों, नेताओं ने स्वतन्त्रता के 65 वर्ष बाद भी गुलामी के शब्दों को क्यों फलीभूत होने दिया इसका जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं। इतने बड़े षड़यन्त्र का रहस्य क्या है? सर्वोच्च सत्ता, न्याय शक्ति इसकी जांच करें। यह सर्वविदित है कि सभी धर्मो का कोई न कोई प्रवर्तक है फिर भी पिता हीन, प्रवर्तक हीन, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों में क्यों घुसने दिया, इसके जिम्मेदार कौन है? कौन है?? कौन है??? जनता (आर्यन) जवाब मांग रही है। अतः हिन्द, हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान, हिन्दू धर्म को भारतीय पन्नों से तुरन्त प्रभाव से हटाया जाए। ऐसा करने से सही रूप में स्वतन्त्रता का आभास होगा और असीम शान्ति मिलेगी। करके देखो !

ब्रह्माण्डीय पर्यावरण सन्तुलन तो नितांत आवश्यक है सामाजिक सन्तुलन भी आवश्यक है।

‘‘व्यवस्था सोच-परिवर्तन चेतना महायज्ञ’’ का ‘‘जनजागृति अभियान’’

स्वतन्त्रता के 64 वर्ष बाद भी! गुलामी के शब्द! क्यों? क्यों?? क्यों??? जबकि शब्द से संस्कार बनते हैं!

सेवामें, ………………………………….हे मनीषी, महामानव आज सनातन धर्म खतरे में है। सनातन धर्म को विलुप्त करने का बहुत बड़ा षड़यन्त्र चल रहा है। हमें सनातन धर्म की रक्षा करनी है। अतः कृपया आप अपने पद की गरीमा को ध्यान में रखते हुए मौन का परित्याग कर हमारी रणनीति में सहयोग करने की कृपा करें ताकि सनातन धर्म को विलुप्त करने के षड़यंत्र को विफल कर सके। सनातन धर्म की पूजा एक साथ करने का समय भी निश्चित कर सकें।

हिन्द-हिन्दी-हिन्दू-हिन्दुस्थान – ये सब फारसी नाम !!!

‘हिन्दू’ शब्द को विदेशी मुसलमान, लूटेरांे, आक्रमणकारियों ने भारत के आर्यों पर सदियांे की गुलामी के समय जबरदस्ती थोपा था। हिन्दू का फारसी भाषा में अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरा, गुलाम, राहजन आदि यह ऐतिहासिक सत्य है।

‘हिन्द’- यानि गुलाम – जयहिन्द, ये गुलामी के पूर्व तक तो ‘जय गुलाम’ सही था। अब कैसा जय गुलाम। अब जय भारत बोलें। हिन्द ‘हिन्द भूमि’ यानि ‘गुलाम भूमि’ गुलामी तक तो सही थी अब ‘भारत भूमि’ आर्य भूमि आदि ही बोलें !

‘हिन्दी’- यानि संस्कृत की एक सरल भाषा परन्तु इसका नाम ‘हिन्दी’ फारसी शब्द है अतः इसका नाम होना चाहिए ‘आर्ष भाषा’ या देवनागरी भाषा !!

‘हिन्दू’- यानि चोर, डाकू, लूटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि आदि जो कि सदियो की गुलामी में तो ठीक था अब हमें अपने मूल रूप ‘आर्य’ में आना चाहिए। आओ हम आर्य बनें, एक बनें , श्रेष्ठ बनें !!!

‘हिन्दुस्थान’- यानि ‘गुलामस्थान’ को बदलकर आर्य स्थान बोलें । विश्व हिन्दू परिषद् की जगह विश्व आर्य परिषद् या विश्व सनातन परिषद् या विश्व भारत परिषद् आदि नवीन नामकरण संस्कार से असीम शांति मिलेगी। करके देखो !!!

इस प्रकार उपरोक्त सभी नामों को जिस प्रकार बम्बई से मुम्बई, मद्रास से चैन्नई, कलकत्ता से कोलकाता आदि कई जगहों के नाम को बदलकर मूल रूप में रखने से शांति मिली है वैसे ही इन हिन्द, हिन्दू आदि नामों को आर्य रूप में संसोधन से भी असीम शांति मिलेगी, करके देखो।

‘हिन्दू’ शब्द का फारसी भाषा में मूल अर्थ है- चोर, डाकू, लुटेरे, राहजन, काला, गुलाम आदि। यह ऐतिहासिक सत्य है।

प्रश्न: हिन्दू शब्द का अर्थ क्या है?

उत्तर: हिन्दू का अर्थ है-लाला लाजपत राय ने अपने परिचय में – महर्षि दयानन्द के लाहौर 1898 के परिचय के बारे में कहा: लेखक के अनुसार कुछ लोग कहते है कि हिन्दू है जो कि सिन्धु का बिगड़ा हुआ नाम है लेकिन यह गलत है। परन्तु सिन्धु एक नदी का नाम है। किसी समुदाय का नाम नहीं है । यह सही है कि यह नाम असली आर्यन जाति को दिया गया है जो कि इस क्षेत्र में मुस्लिम आक्रान्ताओं द्वारा अपमानित करने के लिए इस नाम से पुकारी जाती थी। फारस में लेखक हमारे लेखक कहते है इस शब्द का तात्पर्य ‘दास’ है और इस्लाम के अनुसार वो सारे लोग जिन्होंने इस्लाम को नहीं अपनाया था उनको दास बना दिया गया।

आगे ‘काला’ और ‘दास’ संकलन में फारसी और उर्दू भाषा के शब्द कोष यह वर्णन करते है कि यह अर्थहीन और घ्रणित ‘हिन्दू’ शब्द का अर्थ है- फारसी भाषा का शब्दकोष – ल्युजत-ए-किशवारी, लखनऊ 1964, चोर, डाकू, राहजन, गुलाम, दास। उर्दू फिरोजउल लजत-प्रथम भाग पृ. 615, तुर्की चोर, राहजन, लूटेरा: फारसी गुलाम, दास, बारदा (आज्ञाकारी नौकर), शियाकाम (काला) पेज 376 भार्गव शब्द कोष बारवां संकलन 1965 भी देखे)

परसियन – पंजाबी (डिक्सनरी) शब्द कोश (पंजाबी यूनिवर्सिटी, पटियाला) भारतीय उपमहाद्वीप के निवासी, डाकू, राहजन, चोर, दास, काला, आलसी।

(हिन्दुकुश – यानि भ्पदकन ज्ञपससमतए ैसंनहीजंतद्ध यहाँ असंख्य मौतें, मार-काट, हत्याएं हुई।

अब हमें चोर, डाकू, लूटेरे, गुलाम, राहजन नहीं रहना है। हमें श्रेष्ठ बनना है। हमें आर्य बनना है। आओ हम आर्य बनें।

राम और कृष्ण आर्य थे। गुरुनानक देव राम के वंशज है।

हस्तिनापुर के वंशज अन्तिम सम्राट श्री पृथ्वीराज चैहान तक हमारी पहचान आर्य थी। बाद में विदेशियों के अधीन हो गये। आर्यन पहचान ही खत्म हो गई। अब आर्य समाज की संस्थाएं है।

सिकन्दर ने भी हिन्दू शब्द को बोला था परन्तु प्रचलित 1000 ई. के बाद ही हुआ है। महमूद गजनवी ने 997 ई. से भारत में 27 डाके डाले। मोहम्मद गौरी ने पृथ्वीराज चैहान से कई लड़ाईयां लड़ी दोनों का अन्त हो गया। बाबर आक्रमणकारी था। फिर यहीं रहने का मन बनाया था आदि-आदि आक्रान्ताओं के साथ ही ‘हिन्दू’ शब्द आया।

विदेशी, लूटेरों, आक्रमणकारियों के अत्याचार से आर्य हिन्दू-मुस्लिम में बंट गये।

आओ हम आर्य बने, श्रेष्ठ बने, एक बने – हे श्रेष्ठ जनों, हे आर्यों, विदेशी इस्लामिक लूटेरों, आक्रमणकारियों ने भारतवर्ष में शान्तिमय जीवन यापन करने वाले त्यागी, तपस्वी, हमारे पूर्वजों को घोर यातनाएं देकर हिन्दू और मुस्लमान बना दिये।

अब आप स्वतन्त्र हो, आईये हम श्रेष्ठ बने! आर्य बने!! एक बने!!!

‘हिन्दू’ धर्म का कोई प्रवर्तक नहीं है यानि ‘हिन्दू धर्म’ नहीं है। यह झूठ प्रपंच का मनगढन्त नाम है।

आप मनीषी भी यह पढ़कर स्वयं ही प्रश्न पैदा करे या स्वयं ही उत्तर खोजे या देश में धर्म और सत्य सनातन के नाम के भ्रम का नाश कर अपने स्व कर्तव्य का पालन कर राष्ट्रभक्ति जागृत करें।

– हिन्दू धर्म के दस प्रश्न –

1. हिन्दू धर्म के प्रवर्तक कौन है? 2. हिन्दूधर्म के धर्म ग्रंथ कौन-से है? 3. हिन्दू धर्म का ईश्वर कौन है? 4. हिन्दू धर्म के उपास्य देव कौन-कौन से हैं? 5. हिन्दू धर्म किस समय से चला है समयावधि बताये? 6. हिन्दू धर्मानुसार सृष्टि कब वा कैसे बनी? 7. हिन्दू धर्मानुसार यह सृष्टि एकत्ववाद, द्वैतवाद या त्रैतवाद है?

8. हिन्दू धर्म की पूजा पद्धति क्या है? 9. हिन्दू धर्मानुयायी की जीवन व सामाजिक पद्धति क्या है? 10. हिन्दू शब्द किस भाषा की देन है?

सनातन धर्म के दस उत्तर

1. सनातन धर्म के प्रवर्तक परमपिता परमेश्वर है। जिसका मुख्य नाम ओ3म् है।

2. सनातन धर्म के धर्मग्रंथ चार वेद (ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद व अथर्ववेद) है तथा वेद प्रणीत चार उपवेद छः दर्शन शास्त्र, 11 उपनिषद व चार ब्राह्मण ग्रंथ व मनुस्मृति आदि भी मान्य ग्रंथ है।

3. सनातन धर्म के ईश्वर एक ओ3म् ही है जो सच्चिदानंद स्वरूप, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनंत, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वअन्तरयामी, अजर, अमर, अभय, नित्य पवित्र और सृष्टिकर्मा है।

4. सनातन धर्म के 33 कोटि जड़ देवता 5 चेतन देव या इन सब देवों का महादेव परमपिता परमेश्वर है। जड़ में 8 वसु अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश, सूर्य, चन्द्रमा एवं नक्षत्र 11 रुद्र पांच प्राण पांच उपप्राण दस वा ग्यारहवीं आत्मा 12 आदित्य वर्ष के बारह महीने जो हमारी आयु को लेता है। एक इन्द्र (ऐश्वर्यदाता) प्रजापति (यज्ञ), चेतनदेव माता, पिता, आचार्य, गुरु एवं पति के पत्नी और पत्नी के लिए पति देवता है।

5.सनातन धर्म सृष्टि के प्रारम्भ काल से ही चल रहा है जिसको 1960853112 वर्षों से चल रहा है। यह वर्तमान प्रचलन ब्रह्माण्ड गणित के आधार पर है।

6.सनातन धर्मानुसार परमपिता परमेश्वर अपने स्व शक्तिमान होने से प्रलय रूपी रात्री का फिर पल मास वर्ष आदि रचकर पूर्व कल्पनुसार सूर्य चन्द्रमा नक्षत्र आदि कि छः चतुर्युगी अमैथुनी सृष्टि और 994 चतुर्युगी मैथुनी सृष्टि चलती है कुल 1000 चतुर्युगी यानी 4,32,00,00,000 वर्षों तक रहती है व इतने समय ही सृष्टि प्रलय (सूक्ष्म रूप) में रहती है।

7. सनातन धर्मानुसार यह सृष्टि त्रेतवाद है (ईश्वर, जीव, प्रकृति)

(1) ईश्वर पूरे ब्रह्माण्ड का एक ही हैं। सच्चिदानन्दस्वरूप, कर्मफल प्रदाता सृष्टि का रचयिता पालनकर्ता एवं प्रलयकर्ता है।

(2) जीव- जो अनंत व सतचित्त हैं, अल्पज्ञ कर्मफलानुसार जन्म मरण के चक्र में पड़ते हुए श्रेष्ठ योनी मानव द्वारा मोक्ष की भी प्राप्त कर सकते हैं।

(3) प्रकृति – जो सत् है तीन गुणों (सत्व, रज, तम) से युक्त पंच तत्व स्वरूप में है।

8. सनातन धर्म, मानव धर्म, प्राणी धर्म के पंच महायज्ञ द्वारा चैतन्य एवं जड़ देवों की पूजा (यथायोग्य सत्कार एवं उपयोग) की जाती है।

(1) ब्रह्मयज्ञ – ईश्वर का ध्यान व वैदिक सत्य शास्त्रों का स्वाध्याय।

(2) देवयज्ञ – जड़ देवों का मुख अग्नि है सो गौ घृत एवं सुगन्धित, मिष्ठीकारक पुष्टिकारक वनस्पतियों द्वारा हवन करना। वायु को शुद्ध कर स्वास्थ्यवर्धक बनाना।

(3) पितृयज्ञ – जीवत माता, पिता, दादा, दादी, सास, ससुर आदि बड़ों को प्रातः स्नानकर नमस्ते कर उनकी इच्छानुसार भोजन आदि व्यवस्था करना उनकी आज्ञा का पालन करना एवं संतान को सुसंस्कारी बनाना।

(4) बलीवैश्व देव यज्ञ – गाय, कुत्ता, चींटी, पक्षी, विकलांग, विधवा आदि गृह पर आश्रितों की यथा शक्ति सेवा करना।

(5) अतिथियज्ञ – कोई वेदों के विद्वान् संन्यासी घर आये तो उनका हृदय से अभिवादन कर उनसे अपनी शंका का समाधान करना एवं उनकी आवश्यकतानुसार भोजन आदि देकर सेवा करना।

9. सनातन धर्मानुसार व्यक्ति चार वर्ण का चार आश्रमों का पालन करते हुए सोलह संस्कारों द्वारा आत्मोन्नत कर अष्टांग योग द्वारा धर्म अर्थ, काम व मोक्ष को प्राप्त करना।

छुआछूत रहित कर्मानुसार वर्णव्यवस्था, मृत्यु भोज, बाल विवाह, बहुविवाह आदि। वर्तमान सामाजिक कुरीतियों से रहित आदर्श, जीने दो और जीओ के आधार पर सामाजिक संरचना करना ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की कामना करना।

10. सनातन धर्मानुसार हम आर्यावर्त के निवासी होने के कारण आदिकाल से आर्य थे परन्तु 997 ईश्वी से विदेशी लूटेरों, आक्रमणकारियों ने हिन्दू शब्द जो फारसी भाषा में मुसलमानों द्वारा दिया गया हमारा अपमान जनित नाम है। जिसका अर्थ काला, चोर, डाकू, लूटेरा, गुलाम आदि बताया है। महाभारत काल तक हमारे महाराजे आर्य पुत्र, ऋषि, महर्षि संतान कहलाती थी परन्तु महाभारत के बाद भी किसी भी धर्मशास्त्र पुराणों में भी किसी महापुरुष या संत आदि को हिन्दू पुत्र नाम से सम्बोधन नहीं आया है तो हम इस अपनी संस्कृति आर्यावर्त देश की परम्परा के श्रेष्ठ नाम आर्य को छोड़ हिन्दू क्यों बोलने लगे या बोल रहे है, गाली ले रहे है। शब्द ब्रह्माण्ड का सार है। शब्द से संस्कार बनते है और इसी हिन्दू शब्द के गूढ़ अर्थ यानि चोर, डाकू, लुटेरा, राहजन आदि को न समझने के कारण त्याग, तपस्वी भारत भूमि के त्यागी तपस्वी संतगणों, विद्वानों ने भी हिन्दू पथ पर चलना शुरू कर दिया है। यहाँ तक कि किसान व मजदूर वर्ग भी संतों, विद्वानों व राज में उच्च पदासीनों को हिन्दू यानि चोर, डाकू, राहजन की ओर अग्रसर होते देख क्षुब्ध है और वे भी मौके की तलाश में है। यहाँ तक अध्यापकगण यानि गुरुजन भी ऐसी भयावनी स्थिति में है का गम्भीरता से चिंतन-मनन करें ।

इसका विचार कर ‘हिन्द’, ‘हिन्दी’, ‘हिन्दू’ और ‘हिन्दुस्तान’ शब्दों का परित्याग करें और इसकी जगह ‘हिन्द’ यानि भारत, ‘हिन्दी’ यानि आर्ष भाषा, देवनागरी, ‘हिन्दू’ यानि आर्य, ‘हिन्दुस्तान’ यानि आर्यस्थान बोलने का प्रचलन शुरू करें । सत्य को ग्रहण करे यही ईश्वर की कामना है।

इनके अलावा हमारी शोध के आधार पर निम्नलिखित 11 प्रश्न और है जो हमने अन्यों से पत्र-प्रेषित करके पूछे थे जिनका उत्तर आज तक नहीं आया। इन सभी का हम ही उत्तर दे सकते है फिर भी आप मनीषी भी इस पर चिंतन-मनन अवश्य करें। उत्तर देने का कष्ट करें।

1. सनातन धर्म प्राचीन होते हुवे भी सिमट कर रह गया क्यों? जबकि दूसरे धर्मों का विश्व में राज चलता है। 2. सभी धर्मों में शान्ति का उल्लेख है फिर आतंकवाद क्यों बढ़ रहा है? 3. आतंकवाद रूपी राक्षस की उत्पत्ति कैसे हुई? 4. सन्तों के प्रवचनों का असर क्यों नहीं पड़ रहा है जबकि करोड़ो रुपये सन्तों के प्रवचनों में खर्च होते है। देखने में ओर सुनने में आया है कि जो सन्तों के पास ज्यादा रहते है उनमें से अधिकांश घोटाला-घपलों में क्यों लिप्त है? 5. आज मनुष्य की गरिमा उसके चरित्र से न आंककर धन से आंककर धन के महत्त्व को बढ़ावा क्यों दिया जा रहा है? 6. अधिकांश की येन-केन प्रकरेण अनीति से धन संचय करने की प्रवृति क्यों बढ़ रही है? 7. वर्तमान में वाहन दुर्घटनाएं क्यों बढ़ रही है? (वाशिंगटन, कैलिफोर्निया, यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने कहा कि ध्वनि प्रदूषण, संगीत से वाहन दुर्घटनाएं आदि होते हैं। (28 जून-2011 के दैनिक अखबार में प्रकाशित) जबकि खेजड़ा एक्सप्रेस के प्रजापति ने शोध करके पाँच वर्ष पहले पता कर लिया था कि ध्वनि प्रदूषण, गीतों से वाहन दुर्घटनाएं, बहरापन आदि होती है जो कि 24 अप्रैल 2008 के अंक में प्रकाशित, 20 अप्रैल को प्रकृति शक्तिपीठ खेजड़ा के कार्यालय में प्रजापति ने शोध पत्र पढ़ा था जिसमें ध्वनि प्रदूषण से वाहन दुर्घटनाएं व अर्द्ध विक्षुप्ता, बहरापन आदि विस्तार से बताया है तथा दुर्घटनाओं के बारे में ओर भी गूढ़ जानकारी की है। सरकार को भी पत्र लिखें। न ही सरकार ने ध्यान दिया और न ही मीडिया ने, जबकि अब अमेरिका केे मनोवैज्ञानिकों की शोध को प्रचारित-प्रसारित कर रहे है।) 8. बच्चों व युवाओं में भी नशे की प्रवृति क्यों बढ़ रही है?

9. अनेक सन्त दुष्आचरण में लिप्त क्यों होते जा रहे हैं? 10. अकाल क्यों पड़ते हैं? एवं 11. कमजोर मानसून में अच्छी वर्षा कैसे ली जा सकती है? आदि आदि अनेकानेक शोध जिसमें विशेष तुलसी, यज्ञ, योग, वनौषधियों से रोगों का उपचार आदि। अकाल पर शोध में लगभग 30 वर्ष लगे है।

हमारा धर्म ‘सनातन धर्म’ है जिसका प्रवर्तक ?, ओ3म्, ओं है। आईये इस ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ के जनजागृति अभियान में शामिल होईये और अनेकानेक गूढ जानकारियों के साथ भारत को विश्व की अग्रणी शक्ति बनाने में अपना योगदान दीजिये।

ओं-शान्ति-शान्ति-शान्ति।

अतः जो भारतीय हैं, आर्य है और ‘व्यवस्था सोच परिवर्तन चेतना महायज्ञ’ में विश्वास रखने वाले है सभी मुख्य कार्यालय ‘पाक्षिक खेजड़ा एक्सप्रेस, प्रकृति शक्ति पीठ, बीकानेर -4 से सम्पर्क करें और अधिक जानकारी के लिए खेजड़ा एक्सप्रेस पढ़े।

 

नोट: विदेशी महमूद गजनवी ने भारत को 27 डाकों से लूटा, लूट के माल से गजनी को सजाया। गौरी आक्रमण कारियों ने गजनी को जलाकर राख कर दिया। आज भारत को अपने ही लूट कर विदेशों में धन जमा कर रहे है। जब ये लूटेरे मरेंगे तो इनका विदेशों में धन भी जलकर राख हो जायेगा।

 

यह पत्र आपके उज्ज्वल भविष्य की ईश्वर से प्रार्थना करता है। प्राणियों का कल्याण हो। एक बात ओर- हे महामानव आप आर्य है, आप श्रेष्ठ है।

 

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7 Comments on "सनातम धर्म और हमारी शोध"

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sugyan
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अपने अपने धर्म को सभी सनातन एवं सही मानते हैं| जबकि सत्य ये है कि हिंदू मुस्लिम,ईसाई बौद्ध या जैन ये सभी धर्मों के नाम है| इनका सनातन होना कोई सिद्ध नहीं कर सकता , इश्वर का होना कोई सिद्ध नहीं कर सकता , होना अगर मान भी लें तो उसका ब्रह्माण्ड के किसी भी कार्य या क्रिया में लिप्त होना मानना उसके इश्वर होने में संदेह पैदा करता है| इसलिए अवधारणा ऐसी होनी चाहिये जो सर्व मान्य व प्रामाणिक हो सके| जैसे महावीर के दिए हुए सिद्धांत जो कि प्रामाणिक भी है और उनका किसी व्यक्ति, इश्वर, देश, काल… Read more »
ampeemehta
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भारत का सर्वप्रमुख धर्म हिन्दू धर्म है, जिसे इसकी प्राचीनता एवं विशालता के कारण ‘सनातन धर्म’ भी कहा जाता है। ईसाई, इस्लाम, बौद्ध, जैन आदि धर्मों के समान हिन्दू धर्म किसी पैगम्बर या व्यक्ति विशेष द्वारा स्थापित धर्म नहीं है, बल्कि यह प्राचीन काल से चले आ रहे विभिन्न धर्मों, मतमतांतरों, आस्थाओं एवं विश्वासों का समुच्चय है। एक विकासशील धर्म होने के कारण विभिन्न कालों में इसमें नये-नये आयाम जुड़ते गये। वास्तव में हिन्दू धर्म इतने विशाल परिदृश्य वाला धर्म है कि उसमें आदिम ग्राम देवताओं, भूत-पिशाची, स्थानीय देवी-देवताओं, झाड़-फूँक, तंत्र-मत्र से लेकर त्रिदेव एवं अन्य देवताओं तथा निराकार ब्रह्म… Read more »
सुज्ञान
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सुज्ञान

नमस्कार,
कृपया बताएं , इश्वर है या नहीं? इश्वर का संसार में हस्तक्षेप होता है या नहीं? और अगर होता है तो किस आधार पर? हमारे जीवन में इश्वर महत्तवपूर्ण या कर्म?
धन्यवाद

आर. सिंह
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आप केवल एक बात का उत्तर दें. क्या इस लेख में हिंदू और हिंदुत्व का जो अर्थ दिया गया है वह ग़लत है?

बीनू भटनागर
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बीनू भटनागर

संसकृतियों का आपस मे समन्वय ,भाषा मे विभिन्न भाषाओं के शब्दों का विलय होता रहा है, होता रहेगा। उर्दू के कई शब्द हमारी भाषा का हिस्सा बन चुके है, बहुत सालों से प्रचिलित चीज़ो को हटाने की जगह देश की समस्याओं और निराकरण पर ध्यान देना ज़्यादा ज़रूरी है।

gulzar markam
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इस लेख से पता चलता है की आर्य ही इस देश के मूलनिवासी है बाकि सब विदेशी रहे है आर्यावर्त का छोटा सा राज्य बनाकर आर्य सरे देश के मूलनिवासियो को आर्य बनाने में लगे है जो गलत है अर्यो के आगमन के पहले यहाँ मूलनिवासियो का सनातन प्रक्रति धर्म रहा है वर्ण व्यवस्था विहीन समाज जो किसी ब्राह्मण को नहीं जनता था इस देश की मूल द्रविनियन भाषा समूह में इस शब्द का उल्लेख नहीं है !तथा आज भी मूलनिवासी समाज अपनी धर्म संस्क्रती को जंगलो में बचा कर रखा है ब्राह्मण व्यवस्था के लिए वहा कोई जगह नहीं… Read more »
आर. सिंह
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हिंदू और हिंदुत्व के बारे में गहन विचार करने वालों से इस आलेख में उठाए प्रश्नो के उत्तर की अपेक्षा है.

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