लेखक परिचय

नीरज कुमार दुबे

नीरज कुमार दुबे

नीरज जी लोकप्रिय हिन्दी समाचार पोर्टल प्रभासाक्षी डॉट कॉम में बतौर सहयोगी संपादक कार्यरत हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नातक की शिक्षा हासिल करने के बाद आपने एक निजी संस्थान से टीवी जर्नलिज्म में डिप्लोमा हासिल कीं और उसके बाद मुंबई चले गए। वहां कम्प्यूटर जगत की मशहूर पत्रिका 'चिप' के अलावा मुंबई स्थित टीवी चैनल ईटीसी में कार्य किया। आप नवभारत टाइम्स मुंबई के लिए भी पूर्व में लिखता रहे हैं। वर्तमान में सन 2000 से प्रभासाक्षी डॉट कॉम में कार्यरत हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


-नीरज कुमार दुबे

मुंबई में आतंकवादी हमलों के दोषी और मामले की सरकारी वकील उज्ज्वल निकम की ओर से ‘मौत की मशीन’ करार दिये गये अजमल आमिर कसाब को मौत की सजा सुनाया जाना भी कमतर प्रतीत होता है। दरअसल यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जोकि इस हमले की साजिश में शामिल था, यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जो भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। यह सजा हर उस शख्स को दी जानी चाहिए जो सीमा पार स्थित आतंकी प्रशिक्षण शिविरों में भारत विरोध के लिए जान लड़ा देने की कसमें खा रहा है।

वैसे कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है उससे एक बात तो साफ हो गई है कि भारत विरोधी कार्रवाइयों को अंजाम देने वालों का यही हश्र होगा। अब यह सरकार पर है कि वह इस सजा को जल्द से जल्द अमल में लाए, यह मामला संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की तरह राजनीतिक कारणों से लटकना नहीं चाहिए, नहीं तो देश के खिलाफ साजिश करने वालों के हौसले बुलंद होंगे। कसाब किसी भी लिहाज से दया का पात्र नहीं है क्योंकि जैसा कि उज्ज्वल निकम ने कसाब का इकबालिया बयान पढ़ते हुए अदालत में कहा कि ‘‘वह खून का प्यासा है, जो यह देख कर दुःखी हुआ कि छत्रपति शिवाजी टर्मिनस पर मारने के लिए ज्यादा लोग नहीं हैं।’’ मुंबई में हमले का शिकार बने ज्यादातर लोग निहत्थे थे और उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था। कसाब ने बेरहमी से उन पर गोलियां चलाईं। कसाब और उसके साथी अबू इस्माइल ने अपनी एके 47 राइफल और दो टैक्सियों में बम लगा कर 72 लोगों को सीधे तौर पर मारा। कसाब मनुष्य के रूप में राक्षस है, जिसे लोगों की हत्या करने में मजा आता है। यह दो मीडियाकर्मियों द्वारा खीचीं गई उसकी दो तस्वीरों में उसके चेहरे से स्पष्ट दिखता है।

इस पूरे मामले में विशेष अदालत ने न्याय के सिद्धांत का पूरी तरह पालन करते हुए यह दिखा दिया है कि भारत में न्यायपालिका स्वतंत्र है और यहां की न्यायिक प्रक्रिया कम से कम राजनीतिक तथा भावनात्मक कारणों से प्रभावित नहीं होती। नहीं तो जब कसाब को गिरफ्तार किया गया था उस समय देश में भावनाओं का जो ज्वार उमड़ रहा था उसको देखते हुए उसे जनता ही नहीं पुलिस ही मार डालती, खुद मुंबई हमले के दौरान शहर पुलिस की अपराध शाखा के मुखिया रहे राकेश मारिया ने यह कहा भी है कि हमें कसाब की कई मोर्चों पर रक्षा करनी पड़ी जिसमें बाहरी तत्वों के साथ ही पुलिस विभाग के लोग भी थे क्योंकि उनमें अपने कई वरिष्ठ अधिकारियों के मारे जाने को लेकर काफी रोष था, लेकिन भारत कोई ईरान अथवा पाकिस्तान नहीं है जहां न्यायिक प्रक्रिया का मात्र दिखावा किया जाता है। अब जब कसाब को सजा हो गई है तो उसके पास उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय जाने का विकल्प खुला हुआ है लेकिन अदालतों को चाहिए कि वह यदि अपने इस अधिकार का उपयोग करता भी है तो भी जल्द से जल्द मामले को निपटाया जाना चाहिए। फिलहाल तो मुंबई हमला मामलों की सुनवाई कर रही विशेष अदालत ने एक वर्ष के समय में इस सबसे बड़े आतंकवादी हमले के मामले को निपटाकर रिकार्ड बना ही दिया है।

कसाब की सुरक्षा पर जो रोजाना लगभग दो लाख रुपए खर्च हो रहे हैं वह यदि देश के जरूरतमंद इलाकों में लगाया जाए तो अच्छा रहेगा इसके लिए जरूरी है कि कसाब की सजा पर जल्द से जल्द अमल किया जाए। पाकिस्तान को भी कसाब को सजा दिए जाने पर शायद ही ऐतराज हो जोकि भारत से संबंध अच्छे बनाने को कथित रूप से आतुर है। हालांकि कसाब को सजा पर अमल किये जाने पर पाकिस्तान एक बहाना यह मार सकता है कि उसके यहां मुंबई हमला मामलों के जो केस चल रहे हैं वह अब कमजोर हो गये हैं।

यह बड़ी हैरानगी वाली बात ही है कि मुंबई हमला मामलों में पाकिस्तान अब तक भारत से ठोस सबूत नहीं मिलने की बात कह रहा है लेकिन अमेरिका में टाइम्स स्कवायर पर आतंकी हमले की साजिश करने वाले फैजल शहजाद मामले में उसने बड़ी तत्परता दिखाई और चैबीस घंटे के अंदर आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को गिरतार कर लिया। पाकिस्तान खुद के आतंकवाद से पीड़ित होने का दावा करता है लेकिन इसका जनक भी तो वह खुद ही है। हेडली, राणा, फैजल शहजाद, आफिया सिद्दीकी जैसे कुछ नाम तो मात्र उदाहरण हैं। असली आका तो चेहरे पर लोकतंत्र का मुखौटा लगाकर सारा खेल रच रहे हैं। जिन्हें बेनकाब किए बिना आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अधूरी ही रहेगी।

आतंकवाद मुद्दे पर हमें अमेरिका से यह सीख लेनी चाहिए कि वहां 9/11 के बाद कोई आतंकवादी हमला नहीं हुआ। भले वहां की गुप्तचर एजेंसियों अथवा अन्य प्रशासनिक एजेंसियों की नाकामी के चलते पिछले वर्ष क्रिसमस के दौरान डेट्रायट में अमेरिकी विमान को उड़ाने का प्रयास किया गया हो और अब टाइम्स स्कवायर पर धमाके की साजिश रची गई हो, लेकिन अमेरिकी जनता की सतर्कता के कारण दोनों मामलों में क्रमशः अब्दुलमुतालब और फैजल शहजाद को सिर्फ 24 घंटे के अंदर ही कानूनी शिंकजे में ले लिया गया। हेडली और राणा का उदाहरण भी सबके सामने है। हालांकि इस मामले में अमेरिका ने जो खेल खेला, वह भी सभी जानते हैं।

कसाब मामले में जो सजा सुनाई गई है, उसका हर भारतीय स्वागत कर रहा है। आज हम इस हमले के दौरान शहीद हुए पुलिसकर्मियों, एनएसजी जवानों और सुरक्षा गार्डों को कोटि-कोटि नमन करते हैं और शपथ लेते हैं कि वह अपने पीछे अदम्य साहस और देशभक्ति की जो विरासत छोड़ कर गये हैं, उसे हम आगे बढ़ाएंगे साथ ही हमले के दौरन शिकार बनी मासूम जनता को अपनी श्रद्धांजलि देते हुए यह शपथ भी लेते हैं कि आतंकवाद का नामोनिशां मिटा कर रहेंगे, भारत के खिलाफ उठने वाला हर कदम किसी भी सूरत में सफल नहीं होने दिया जाएगा।

इस मौके पर यह कवि श्यामलाल गुप्ता की इस कविता के माध्यम से अपनी भावनाएं व्यक्त करना चाहता हूं-

विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

सदा शक्ति बरसाने वाला,

प्रेम सुधा सरसाने वाला

वीरों को हरषाने वाला

मातृभूमि का तन-मन सारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

स्वतंत्रता के भीषण रण में,

लखकर जोश बढ़े क्षण-क्षण में,

काँपे शत्रु देखकर मन में,

मिट जावे भय संकट सारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

इस झंडे के नीचे निर्भय,

हो स्वराज जनता का निश्चय,

बोलो भारत माता की जय,

स्वतंत्रता ही ध्येय हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

आओ प्यारे वीरों आओ,

देश-जाति पर बलि-बलि जाओ,

एक साथ सब मिलकर गाओ,

प्यारा भारत देश हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

इसकी शान न जाने पावे,

चाहे जान भले ही जावे,

विश्व-विजय करके दिखलावे,

तब होवे प्रण-पूर्ण हमारा,

झंडा ऊँचा रहे हमारा।

भारत माता की जय

Leave a Reply

1 Comment on "सजा सुना तो दी, हश्र अफजल गुरु जैसा न हो"

Notify of
avatar
Sort by:   newest | oldest | most voted
पंकज झा
Guest

हाल में एक कार्टून देखा था इस सन्दर्भ में……पत्रकार पूछ रहे हैं सरकारी अधिकारी से फैसले के बारे में कि “कितने साल के फांसी की सज़ा मिली है”? वास्तव में अफजल साहब की तरह ही जीवन भर इस देश को कसाब साहब के भी मेहमान-नवाजी का मौका मिले.

wpDiscuz