लेखक परिचय

प्रवक्ता.कॉम ब्यूरो

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गुलशन गुप्ता 

भारत के ह्रदय में भरा सागर से भी गहरा ‘दया और प्रेम का गागर’ वह पूँजी है, जिसका संग्रह किसी के पास नहीं है | न प्राचीन से प्राचीन किसी दूसरी सभ्यता के पास और न आधुनिकता के कारखाने में लिपटी आज की तथाकथित सभ्यता के पास |

जहाँ तक्षशिला-नालंदा जैसे विश्वविद्यालय, द्रोण-चाणक्य जैसे शिक्षक, अर्जुन और चन्द्रगुप्त जैसे योद्धा, राम और खारवेल जैसे चक्रवर्ती शासक रहे हों उस सांस्कृतिक पूँजी पर काल की कुदृष्टि पड़ना स्वभाविक था, शक-हूण-कुषाण-मुग़ल-पुर्तगाली-अँगरेज़ आदि आक्रमणकारी इसका प्रमाण हैं |

पर ऐसा नहीं है कि अपने समय में भारत में ही सभ्यता का बीज उपजा | चीन-रोम-अफ्रीका-अरब ऐसे देश हैं जहाँ पर लोग अपनी संस्कृति का डंका पीटते थे | यही कारण है कि सिकंदर यूनान से चलकर दुनिया को जीतने निकला था, हिटलर दुनिया को सभ्य बनाना चाहता था | लेकिन आज वह सारी संस्कृतियाँ कहाँ हैं?

सनातन संस्कृति को छोड़कर कोई दूसरी संस्कृति आज अस्तित्व में नहीं है | इसका एकमात्र कारण है- जहाँ संस्कृतियों का जन्म हुआ उसके आगे वाली पीढ़ी ने उसे उसी रूप में अपना लिया, समय अनुसार किसी ने भी उस रेखा के आगे उससे बड़ी रेखा खींचने का प्रयास नहीं किया, इससे उस संस्कृति के अध्याय को पूर्ण विराम लग गया और पूर्ण विराम का अर्थ होता है- बस इतना ही, इससे आगे कुछ नहीं, वहीँ उसकी मृत्यु हो जाती है |

ऐसे में ये पंक्तियाँ सार्थक हो जाती हैं-

|| यूनान मिस्त्र रोमां, सब मिट गए जहाँ से

कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी ||

लेकिन भारत की संस्कृति के संदर्भ मे एक तथ्य उजागर करना बाकी है | मुग़ल आये उन्होंने लगभग 700 सालों तक शासन किया, हिन्दुओं को ही मुस्लिम बनाया | आज भारत में सभी मुस्लिम वही हिन्दू है, जिन्होंने डर से या लोभ से धर्म परिवर्तन कर लिया था |

अँगरेज़ आये 200 वर्षों तक राज किया | हमारा पहनावा, खान-पान, रहन-सहन, बोल-चाल, रिश्ते-नाते, तीज-त्यौहार, कैलेंडर-वर्ष और न जाने क्या-क्या बदल दिया | संक्षिप्त में कहूँ, आज हम खून से भी अंग्रेजी होते जा रहे हैं, कहीं DNA न भी बदल जाये |

लेकिन आज दुनियाभर में भारतीय हैं | ऊँचे पदों पर हैं, सबसे धनी हैं, नामी हैं , लेकिन किसी ने भी ये कभी नहीं किया कि किसी को जाकर धर्म के विरुद्ध भड़काया हो, किसी का धर्म भंग कराकर जबरदस्ती हिन्दू बनाया हो,कोई मिशनरी चलायी हो (लोग यहाँ RSS का नाम ले सकते हैं, लेकिन जब उसका इतिहास जानेंगे तो सच्चाई समझ आ जाएगी), किसी ने कभी किसी को सताया नहीं ,कुछ नहीं |

बस अपनी मौन धारणा से, जो भारतीयों में खून से ही है, सबको एक ही सन्देश दिया :

|| सर्वे भवन्तु सुखिन:, सर्वे सन्तु निरामया

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, माँ कश्चिद् दुःख भाग भवेत् ||

यही कारण है कि भारतीय संस्कृति आज भी जीवित है, सजीव है, सभी को प्रेरणा दे रही है |

 

 

महादेवी वर्मा के शब्दों में–

” संस्कृति एक प्रवाहमान नदी की तरह है, जो अपना रास्ता भी खुद बनाती है और अपनी मर्यादा भी खुद ही बांधती है |”

 

नमन है भारत भू को, जिसने ऋषियों को अपनी गोदी में खिलाकर चिरंतन संकृति की गंगा बहाई | उसी का पुण्य प्रताप हम पा रहे हैं कि कलयुग में इतने राक्षसों के होते हुए भी कोई इसका (सनातन संस्कृति) और हमारा (भारतीयों) नख मात्र भी अहित नहीं कर सका |

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