लेखक परिचय

सतीश सिंह

सतीश सिंह

श्री सतीश सिंह वर्तमान में स्टेट बैंक समूह में एक अधिकारी के रुप में दिल्ली में कार्यरत हैं और विगत दो वर्षों से स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 1995 से जून 2000 तक मुख्यधारा की पत्रकारिता में भी इनकी सक्रिय भागीदारी रही है। श्री सिंह दैनिक हिन्दुस्तान, हिन्दुस्तान टाइम्स, दैनिक जागरण इत्यादि अख़बारों के लिए काम कर चुके हैं।

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सतीश सिंह
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना (मनरेगा) के तहत लटेरी तहसील के मुरवास गाँव में उजड़े जंगल को फिर से आबाद करने के लिए पेड़ लगाने का कार्य जोरशोर से चल रहा है। नाटू मियाँ, हलीम खान, वीरेन्द्र जैन, अखिलेश कुशवाहा जैसे भूमिहीन खेतिहर मजदूरों के घरों में खुशी का माहौल है। आखिर उनको अपने गाँव में ही काम मिल गया है। अब वे 100 दिनों तक रोटी की चिंता से मुक्त हैं। ज्ञातव्य है कि मनरेगा 100 दिनों तक के लिए रोजगार की गांरटी देता है।
सभी मजदूर रोज जमकर अपना पसीना बहा रहे हैं। उनके दिल में इस बात की तसल्ली है कि इस बार बैंक के द्वारा मजदूरी दी जाएगी। नो फ्रिल खाता भी खुल गया है। जरुर इस दफा सरपंच, सचिव और शासकीय कर्मचारी मिलकर घपला करने के अपने मनसूबे में कामयाब नहीं हो पायेंगे।
पर अफसोस, इस बार भी हर बार की तरह उनका सपना एक झटके में टूट जाता है। जब वे अपनी मजदूरी लेने के लिए बैंक पहुँचते हैं तो उनको बताया जाता है कि उनके खातों में मजदूरी का पैसा जमा ही नहीं हुआ है। यह कैसे हुआ उनके समझ से बाहर था? आखिर उनकी मजदूरी का पैसा गया कहाँ ?
यह कहानी सिर्फ मध्यप्रदेश की नहीं है। देश के हर राज्य में मनरेगा भ्रष्टाचार का जबर्दस्त जरिया बन चुका है। काम मजदूरों से जरुर करवाया जा रहा है, परन्तु उनके मेहनत की गाढ़ी
कमाई कोई और हजम कर रहा है। कोरे कागजों पर अंगूठा लगवाकर मजदूरों को धोखा देने का खेल जमकर खेला जा रहा है।
इस खेल का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि मनरेगा के अंतर्गत काम अधिकांशतः कागजों पर होता है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो करोडों रुपयों के बंदरबांट का पर्याय बन चुका है आज मनरेगा। बावजूद इसके कहा जाता है कि यूपीए सरकार की दूसरी पारी के पीछे मनरेगा योजना का योगदान सबसे अधिक है। इस तर्क का मूल आधार है अनेकानेक खामियों से युक्त होने के बाद भी इस योजना का कल्याणकारी स्वरुप। नि:संदेह भ्रष्टाचार मुक्त करने के बाद इस योजना का लाभ ग्रामीण क्षेत्र के एक बड़े तबके को मिलेगा। सरकार फिलवक्त इस योजना पर जीडीपी का 1 फीसदी खर्च कर रही है। इधर हाल के वर्षों में झारखंड और उड़ीसा में मनरेगा के लिए आवंटित राशि का बेरहमी से दुरुपयोग किया गया है। अब सवाल उठता है कि लाभार्थी चपरासी, बाबू, अफसर या नेता को माना जाए या फिर मजदूर को।
चारों तरफ से भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरी कांग्रेसनीत सरकार के लिए अब मनरेगा के अंदर पारदिशर्ता लाने की बात करना लाजिमी हो गया है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार बहुत ही जल्द सरकार मनरेगा के आलोक में सामाजिक अंकेक्षण करवाने वाली है। वस्तुतः अक्टूबर, 2009 में राजस्थान के भीलवाड़ा में सामाजिक अंकेक्षण के दरम्यान मनरेगा में चल रहे भ्रष्टाचार का खुलासा हुआ था। तभी से इस तरह के ऑडिट को करवाने के लिए सरकार सोच रही थी।
सामाजिक अंकेक्षण आंध्रप्रदेश में हो रहे सामाजिक अंकेक्षण की संरचना के आधार पर करवाने का प्रस्ताव है। दरअसल सरकार की योजना हर राज्य में सामाजिक अंकेक्षण के लिए स्वतंत्र इकाई स्थापित करने की है। इस इकाई को डायरेक्टरेट ऑफ स्टेट के नाम से जाना जाएगा तथा इसके अध्यक्ष नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक होंगे। उल्लेखनीय है कि इस बॉडी में राज्य सरकार के प्रतिनिधियों के अलावा चार्टर्ड एकाउंटेंट्स, तहसील स्तर के अधिकारी एवं गैर सरकारी संगठनों में कार्य करने वाले समाजसेवियों का भी दखल होगा। इस पूरे कवायद को अंजाम देने के लिए फंड देने का काम केन्द्र सरकार करेगी।
विदित हो कि इस संकल्पना को अमलीजामा पहनाने के बाद सामाजिक अंकेक्षण के संदर्भ में ग्राम सभाओं को दिया गये विशोषाधिकार से उन्हें वंचित कर दिया जाएगा। घ्यातव्य है कि पूर्व में सामाजिक अंकेक्षण का काम ग्राम सभा के सरपंच करते थे। इस व्यवस्था के पीछे यह अवधारणा थी कि मनरेगा से संबंधित विवादों का निपटारा गाँव व तहसील के स्तर पर ही हो जाए। किन्तु सामाजिक अंकेक्षण के परिप्रेक्ष्य में पूर्व में स्थापित नियम व कानून को बदलने का प्रस्ताव है। इसके लिए मनरेगा के अनुच्छेद 1 के पैरा 13 बी को हटाया जाएगा। इसका आशय यह है कि अब सामाजिक अंकेक्षण के मामले में गांव के स्तर के अधिकारियों के साथसाथ दूसरे संस्थानों व अधिकारियों की भी भूमिका रहेगी।
ग्रामीण विकास मंत्रालय चाहता है कि हर राज्य सामाजिक अंकेक्षण का कार्य राज्य स्तर पर पूरा करके उसकी रिर्पोट मंत्रालय को छह महीने के अंतराल पर भेजता रहे। ताकि मंत्रालय मनरेगा की हर गतिविधि पर अपनी नजर रख सके और लाभार्थी अपनी शिकायत भी दर्ज करवा सकें। गौरतलब है सर्वोच्च न्यायलय का रुख इस मुद्दे पर पहले से ही सख्त रहा है।
इस में दो राय नहीं है कि मनरेगा एक कल्याणकारी योजना है। इस योजना के माध्यम से हम ग्रामीण भारत की तस्वीर अवश्य बदल सकते हैं। पर यह तभी संभव हो सकता है जब इस योजना को सही तरीके से अमल में लाया जाए।
बिहार में मजदूरों के पलायन को रोकने में इस योजना का बहुत बड़ा हाथ है और उससे भी बड़ा हाथ सुशासन बाबू के सुशासन का है। लिहाजा इस बाबत लब्बोलुबाव के रुप में कहा जा सकता है कि इस दिशा में सामाजिक अंकेक्षण की सहायता से यदि हम थोड़ा भी सुशासन लाने में कामयाब होते हैं तो उसकी सहायता से मनरेगा का शुद्धीकरण जरुर हो पायेगा।

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