लेखक परिचय

अनूप आकाश वर्मा

अनूप आकाश वर्मा

लेखक स्व तंत्र टिप्प णीकार व ब्लॉगर हैं।

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 अनूप आकाश वर्मा

बात, पिछले वर्ष की है जब दिल्ली विश्वविद्यालय की एक दलित छात्रा ने अपने ही विभाग के विभागाध्यक्ष पर ये आरोप लगा कर खलबली मचा दी थी कि वो उसे इसलिए ज्योतिषशास्त्र नहीं पढ़ने देना चाहते क्योंकि वह दलित है| इसलिए बड़ा सीधा सवाल है, यदि कोई ब्राह्मण पुत्र व्यापारी जीवन व्यतीत करता है तो उसे किस नज़रिए से ब्राह्मण कहा जाये? जब उसे तथाकथित कर्मकांडो, वेद, गीता, पुराण आदि का ज्ञान ही नहीं है तो क्या उसे ब्राहमण माना जा सकता है? अच्छा! क्या उसे पंडित जी कहना न्यायोचित है? सवाल एक और है कि यदि कोई दलित वेदों-कर्मकांडों आदि का पूर्ण ज्ञान रखता है तो उसे क्या कहा जाए? चाणक्य ने भी कहा है की ब्राह्मणों का बल है विद्या, राजाओं का बल है सेना, वैश्यों का बल है धन और शूद्रों का बल है सेवा…आखिर यही तो भारतीय जाति व्यवस्था के चार स्तम्भ रहे हैं जिसने सदियों से लेकर अब तक भी भारत को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखने में कोई कोर-कसर नहीं छोडी है| धर्म परिवर्तन से जूझने का भी कहीं न कहीं एक बड़ा कारण यही रहा है| ये ठीक है कि अब ये बातें हमारे समाज में कोई विशेष महत्तव नहीं रखतीं| मगर समाज इनसे आज भी अछूता नहीं है| बल्कि इसी में घटते-बढ़ते चार और बुराईयों ने अपनी जगह बना ली है| अंतरजातीय विवाह से उपजी समस्याएं भी इन्ही में से एक हैं| जबकि अंतरजातीय स्वयं कई सामाजिक समस्याओं का निदान है। जाती प्रथा को तोड़ने में अन्तर्जातीय विवाह का कोई सानी नहीं है। अंतरजातीय विवाह,चूंकि प्रेम विवाह के पर्याय स्वरुप उभर कर वर्तमान में सामने आ रहा है, सो दहेज़ प्रथा के उन्मूलन में भी हम अंतरजातीय विवाह को एक मजबूत पहल कह सकते हैं। मगर मूंछों की अकड में क़ानून का माखौल उड़ाती खाप स्त्रियों के सन्दर्भ में आज भी उसी तरह कठोर है जैसे पहले थी। प्रेम की परिभाषा तो खाप ने कभी नहीं समझी है। इसलिए अंतरजातीय विवाह के मूल्यों को समझ पाना भी उसके लिए आसान नहीं है। मगर उसे ये आसान लगता है कि लड़कियों को मोबाईल मत दो, जींस न पहनने दो, दूर पढ़ने मत भेजो, शादी जल्दी कर दो वगैरह,वगैरह…। तस्वीर खापों से इतर भी कम भयावह नहीं है।ऐसे अनेकों किस्से हैं, जहाँ अनेकों प्रेमी युगल अपने ही लोगों द्वारा मौत के घाट उतारे जा रहे हैं। इसलिए जब ऐसे वाकये आए दिन सामने आते हैं तो अब आश्चर्य भले नहीं होता मगर एक टीस तो होती ही है, इस समूची व्यवस्था से जिसे समाज ने अपनी ही सुविधा के अनुसार बनाया है। सभी रीति-रिवाज अपनी ही सुविधानुसार तो बनाए गए हैं। ये तो इसका सामाजिक पक्ष है जिसके आगे सब कुछ इतना विवश लगता है मगर इसका कानूनी पक्ष देखें तो हमारे कानून में हिन्दू विवाह एक्ट १९५५ के तहत अंतरजातीय विवाह को स्वीकृति दी गयी है परन्तु आज के परिदृश्य को देखकर लगता है कि हमारा समाज कानून से बड़ा है। अब ज़रा समूची समस्या को लेकर शहरी जीवन की वास्तविकता को पटल पर रख एक सटीक आंकलन का प्रयास करते हैं। जहाँ खाप पंचायत से इतर एक अलग तरह की सोच समाज को गुमराह करती नज़र आती है। इसमें तो कोई दो राय नहीं है कि हमने पाश्चात्य जीवन शैली अपना ही ली है| मॉल कल्चर अपना लिया है। परम्परा की दुहाई देने वाले परिवार भी नीचे बैठकर खाने की भारतीय परम्परा को भूलकर पाश्चात्य तरीके से टेबल-कुर्सी और कांटे को तरजीह देने लगे हैं। अत्याधुनिकता की ऐसी होड़ मची है जिसकी काली आंधी ने खासकर लड़कियों को मानों हद से अधिक आजादी दे दी है। शायद इसलिए भी लड़कियों से अब यह नहीं पूछा जाता कि उन्होंने भारतीय लिबास को छोड़कर टाइट जींस और स्लीवलेस टॉप क्यों पहनना शुरु कर दिया है। मगर समस्या लिबास भी नहीं है, ये तो खापों की सुनी -सुनाई और बनी-बनाई बाते हैं। फिर भी कुछ समस्याएं यदि गौर करें तो इसी बेवजह की अत्याधुनिकता से ही शुरू होती हैं| सामाजिक हालात ऐसे हैं कि यदि किसी को समझाने की कोशिश करो तो वे आपको एकदम से रुढ़िवादी और दकियानूसी विचारधारा का ठहरा देंगे। कमाल है! मगर तय मानिए हम आज ऐसे गैर ज़िम्मेदार शहरी का जीवन जी रहे हैं जहां हम अपने बच्चों की हर छोटी-बड़ी हरकत को नज़र-अंदाज़ करने में ज़रा भी वक्त नहीं लगाते, हम इसे स्वतन्त्रता का हनन कह खुद को न जाने कौन सी अत्याधुनिकता में धकेल देते है जबकि हमें इस बात की ज़रा भी फ़िक्र नहीं हमारे बच्चे किससे घंटों-घंटों बतियाते रहते है। उनके पास आखिर महंगे कपड़े और गैजट कहां से आते हैं| ये बातें बहुत छोटी मालूम होती हैं, मगर मोटी बाते हैं। इन सभी छोटी-छोटी बातों पर भी गौर किया जाना चाहिए| जो समय पर नहीं किया जाता मगर जब इन्हीं मां-बाप को एक दिन पता चलता है कि उनके बच्चे ख़ासकर लड़की किसी से प्रेम करती है और वह भी दूसरे धर्म या जाति के लडके से तो फिर परिजनों की मूंछों का ताव देखिये| ये बात गाँवों और शहरों दोनों जगहों पर है| ये है कि गाँवों में थोड़ा ज्यादा है और शहरों के बस किस्से थोड़े अलग हैं| इसलिए भी सवाल ये आता है कि लड़कियों को सब तरह की आजादी देने वाले लोग लड़कियों को अपनी मर्जी से शादी करने की आजादी क्यों नहीं देना चाहते हैं ? क्यो प्रेम और विवाह के मामले में घोर परम्परावादी और पक्के भारतीय संस्कृति के रखवाले बन कर सामने आ जाते हैं ? और पक्की भारतीय संस्कृति कबसे प्रेम विवाह या अंतरजातीय विवाह में बाधा बनाने लगी। पौराणिक और इतिहास दोनों में प्रेम विवाह का वर्णन है। कानून भी यही कहता है कि व्यस्क युवक-युवतियों को अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार है। मां-बाप राजी नहीं होते हैं तो कानून अपनी मर्जी से शादी करने की इजाजत देता है।

यह इक्कसवीं सदी चल रही है। इस सदी में वह सब कुछ हो रहा है, जिसकी कभी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। भारत में मल्टीनेशनल कम्पनियों की बाढ़ आयी हुई है, जिनमें सभी जातियों और धर्मो की लड़कियां और लड़के कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। सहशिक्षा ले रहे हैं। इस बीच अन्तरधार्मिक, अन्तरजातीय और एक गोत्र के होते हुए भी प्रेम होना अस्वाभाविक नहीं है। प्रेम होगा तो शादियां भी होंगी। समाज और परिवार से बगावत करके भी होंगी। गैर जाति या धर्म में शादी करने पर लड़कियों को मार देना बहुत ही घिनौना कृत्य है। सवाल यह भी है कि परिवार या समाज की गाज लड़कियों पर ही क्यों गिरती है ? किसी लड़के का गैर जाति में शादी करने पर परिवार की इज्जत क्यों नहीं जाती है ? क्या परिवार की इज्जत का ख्याल रखना सिर्फ लड़कियों की जिम्मेदारी होती है ? ऐसे कई मामले सामने आते हैं जिसमे परिवार लडके के प्रेम को तो स्वीकार कर लेते हैं मगर लड़की के माँ-बाप इसे स्वीकार नहीं कर पाते| और इसमें दोष सिर्फ उन माँ-बापों को दे देने भर से भी कुछ नहीं हो जाएगा समस्या हमारी सोच में है,समाज के दकियानूसी रीति-रिवाजों में है| याद किजिए क्या कभी किसी परिवार ने सिर्फ अपने उस लड़के की जान ली है, जिसने दूसरी जाति या एक ही गोत्र में शादी की है ? बहुत अजीब लगता है कि लड़कियां सशक्त तो होंगी मगर कागजों में..हम ज़मीनी तौर पर उनके आत्मनिर्भर होने को, उनके सशक्त होने को क्यों नहीं स्वीकार पाते? जमाना तेजी के साथ बदल रहा है। लड़कियां शिक्षित और आत्मनिर्भर हुईं हैं तो उन्हें अपने अधिकार भी पता चले हैं। वक्त बदल रहा है। सभी को वक्त के साथ बदलना ही पड़ेगा। हर व्यक्ति अपने बारे में सोचने के लिए स्वतंत्र है। समाज उस पर कुछ थोप तो नहीं सकता।

दरअसल दिक्कत यह है कि हमारा समाज झूठी आधुनिकता ओढ़े हुए हैं। लाइफ स्टाईल बदलने को ही उसने अपनी प्रगतिशीलता मान लिया है जबकि दिल और दिमाग से वह उतने ही रुढ़ीवादी है, जितना की तालिबान। ठन्डे दिमाग से सोचिये कि अगर दो लोग शादी करके शांति से अपना जीवन यापन करना चाहते हैं तो इसमें हर्ज़ ही क्या है? इसमें जाति का क्या मुद्दा है भाई? समझना होगा की वो दोनों ना तो अपने धर्म या जाति की अवहेलना कर रहे हैं और ना ही समाज को किसी तरह दूषित कर रहे हैं.. अपितु ये एकता की ओर एक बहुत खूबसूरत कदम है. वेसे तो हम महत्मा गाँधी ओर भगत सिंह के सपनो के भारत की कल्पना करते हैं.. जहाँ सब एक साथ प्रेम से रहते हैं, अन्ना के आन्दोलन में अपनी जात पात भूलकर खुद को “अन्ना” कहते हैं. भ्रष्टाचार हटाने की बात जोर जोर से करते हैं पर अपने अन्दर से जातिवाद की भ्रष्टता को मिटाने की कोशिश का गला काट देते हैं। अंतरजातीय विवाह एक कोशिश ही है।इसमें कोई दो राय नहीं है कि जब देश में बड़ी संख्या में अंतरजातीय शादियां होने लगेंगी तो जाहिर है कि जाति के आधार पर भेदभाव का अंत हो जाएगा| इसलिए अगर समाज की इन कुरीतियों को रोकना है तो हमें अपने आप को बदलना होगा, रूढ़िवादिता के चंगुल से स्वयं को और समाज को छुड़ाना होगा, जातिवाद के दलदल से बाहर आकर, ऊँच-नीच के भेद-भाव को ख़त्म करना होगा, और सबसे बड़ी बात तो यह है कि उन परिवारों को भरोसा देना होगा कि अगर तुम्हारे बच्चे अपनी जाति-धर्म से बाहर निकल कर शादी करते हैं तो ये एक बदलाव है जिसे स्वीकारा जाना चाहिए| परिवार के दूसरे बच्चे के विवाह को लेकर सजातीय बहिष्कार जैसी बातें न हों|

हमारे बुजुर्ग इस बात पर विचार क्यों नहीं करते कि दो संस्कृतियों का मेल इज्ज़त पर कलंक कैसे हो सकता है? जाति-धर्म भगवान ने नहीं बनाए जिसकी ऐसे मौकों पर दुहाई दी जाती है| जातियां कर्मों के आधार पर बनी हैं और कोई भी काम छोटा नहीं होता तो कोई जाति कैसे छोटी हो सकती है| ऑनर किलिंग समस्या का एक बड़ा कारण राजनैतिक भी हो सकता है मगर असल समस्या तो सामाजिक सोच को लेकर ही है। अपने वोट बैंक को मजबूत करने के खातिर राजनैतिक पार्टियों और राजनेताओं द्वारा देश में जातिवाद को बढ़ावा दिया जा रहा है । इस सन्दर्भ में इसे भी समझने की ज़रुरत है। इसलिए स्त्रियों को कमजोर समझाने वाले इस बात को कंठस्थ कर लें कि स्त्रियाँ किसी भी काल में कमजोर नहीं रही और हर सामाजिक बदलाव में उनकी भूमिका संस्थापकों में रही है। अंतरजातीय विवाह में भी महिलाओं ने ही ‘कड़े’ कदम उठाये हैं, अंबेडकर से लेकर उनके अनुनायियों तक सभी का खाका खींचो तो तस्वीर उभर आती है। कितने सवर्ण समाजी पुरुष हैं जिन्होंने ऐसा दम दिखाया है?

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