लेखक परिचय

दीपक कुमार

दीपक कुमार

अमर उजाला में कार्यरत

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-दीपक कुमार- social

वैसे तो फेसबुक और​ ​ट्विटर जैसे सोशल साइट्स पर मेरी मौजूदगी बहुत कम ही रहती है, लेकिन इन दिनों जब भी मैं अपने ट्विटर या फेसबुक अकाउंट को साईन-इन करता हूं। चुनावी प्रचार के पोस्टरों की भरमार देखने को मिलती है, साथ ही कुछ दिलचस्प पॉलिटिकल जोक्स पॉलिटिकल वीडियो भी देखने को मिलती है, जिससे मुझे बार-बार अपने एकाउंट को ओपन करने का को साईन-इन करने का मन करता है। दरअसल, यह भीड़ चुनाव के तारीख घोषित होने के बाद से अचानक बढ़ गई है। इनके चक्कर में मेरे फ्रेंड-लिस्ट में मौजूद लोगों की बात या विचार हाशिए पर चली जाती है।

मेरे कहने का मतलब यह है कि 2014 के लोकसभा में पहली बार ऐसा होगा जब चुनावी सरगर्मी में मंच और माइक से ज्यादा सोशल साइट्स के इस्तेमाल और प्रभाव हो रहे हैं या होंगें। क्योंकि जिस रफ्तार से सोशल साइट्स के जरिए चुनाव प्रचार किया जा रहा है, उससे एक बात तो तय है कि यह हाइटेक भारत के दौर का आम-चुनाव बन चुका है। क्योंकि एक सच यह भी है कि 2009 लोकसभा चुनाव तक सोशल साइट्स का इतना महत्व नहीं था। लेकिन 2009 में जितने लोगों का वोट पाकर कांग्रेस ने सरकार बनाई थी, इस बार करीब-करीब उतनी ही संख्या भारत में सोशल मीडिया का उपयोग करने वालों की हो चुकी है। इस बार लोकसभा इलेक्शन में 80 करोड़ से ज्यादा वोटर्स हैं। खास बात यह है कि पहली बार वोट का अधिकार प्राप्त करने वालों की संख्या 10 करोड़ से अधिक है। देश में 9 करोड़ से कहीं ज्यादा लोग सोशल मीडिया पर एक्टिव हैं। ऐसे में यह क्यों न मान लिया जाए कि ये 9 करोड़ लोग इस इलेक्शन में बड़ा रोल निभा सकते हैं।

एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक 2009 लोकसभा इलेक्शन में कांग्रेस के खाते में गई 75 सीटें ऐसी हैं, जिनका फ्यूचर सोशल मीडिया के असर से अछूता नहीं रह सकता। इसी प्रकार से बीजेपी के कब्जे वाली 44 सीटें सोशल मीडिया की मुट्ठी में हैं। यह भी माना जा रहा है कि इलेक्शन से ठीक 48 घंटे पहले जब चुनाव प्रचार पर रोक लग जाएगी, तब सोशल मीडिया बड़ी भूमिका निभाएगा। यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा ने सोशल मीडिया के लिए भारी-भरकम टीम जुटा रखी है। मसलन, भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी खुद ट्विटर पर एक्टिव हैं और करीब 9 भाषाओं में ट्वीट करते हैं। इतना ही नहीं, कांग्रेस ने अधिक से अधिक युवाओं को पार्टी से जोड़ने के लिए सोशल मीडिया वेबसाइट्स पर ‘कट्टर सोच नहीं युवा जोश’ अभियान चलाया हुआ है। इस अभियान के जरिये पार्टी न सिर्फ अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी की छवि को चमकाने में लगी है, बल्कि भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी पर करारा कटाक्ष भी कर रही है। वहीं भारतीय जनता पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2014 के लिए देश भर में 272 से अधिक सीटें जीतने का लक्ष्य बना रखा है। इसके मद्देनजर वह सोशल मीडिया साइट्स पर जोरदार अभियान चला रही है। भाजपा से जुड़े लोग नरेंद्र मोदी को ‘नमो’ नाम से भी संबोधित करते हैं। इसलिए इस नाम से भी भाजपा का अभियान चल रहा है। इस अभियान के तहत नरेंद्र मोदी के गुजरात के विकास मॉडल को जनता को समझाया और बताया जा रहा है। वहीं ’आप’ के केजरीवाल भी अपनी नाकामीयों को छुपाने और प्रभुत्व बढ़ाने में लगे हैं।

हालांकि 2014 के चुनाव को लेकर सोशल मीडिया के बढ़ते उपयोग और इसके प्रभाव पर चुनाव आयोग भी अपनी नजर रखने का फैसला लिया है। आयोग के मुताबिक सोशल मीडिया पर होने वाला खर्च भी संबंधित राजनीतिक दलों के खर्च में जोड़ा जाएगा। जिसके लिए 2004 में आए अदालत के फैसलों को एक विस्तृत गाइड लाइन का आधार बनाया है, जिसमें यह सुनिश्चित करना भी शामिल है कि सोशल वेबसाइट के जरिये होने वाले खर्च को संबंधित राजनीतिक पार्टी के खर्च में शामिल किया जाए। इसके लिए चुनाव आयोग ने इन वेबसाइट्स पर निगरानी भी बढ़ा दी है। इसके लिए कुछ टीमें भी बनाई गई हैं, जो राजनीतिक दलों और इनके नेताओं की गतिविधियों पर नजर रखेंगी। यह फैसला एक खुलासे के बाद लिया गया है जिसमें यह दावा किया गया था कि गूगल हैंगआउट के जरिये हर पार्टी के नेता अपनी बात मतदाताओं तक पहुंचाने के साथ-साथ पार्टी के लिए फंड जुटाने में भी लगे हैं। सियासी दलों के कई नेता माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर पर भी मौजूद हैं और इसके जरिये भी वह अपनी बातें समय-समय पर लोगों तक पहुंचाते रहते हैं। यूट्यूब के माध्यम से भी राजनेता अधिक से अधिक मतदाताओं के करीब पहुंचने की कवायद में लगे रहते हैं।

दूसरी बात यह भी है कि सोशल साइट्स पर प्रचार प्रसार के बाद युवाओं के बीच चुनावों में सहभागिता या भागीदारी का क्रेज भी बढ़ा है। मतलब यह कि अगर यंगिस्तान बर्गर-पिज्जे और हंसी-मजाक से उपर उठकर चुनावों में दिलचस्पी दिखा रहा है तो उसका सीधा असर वोटिंग प्रतिशत पर भी पड़ेगा, जिसका उदाहरण हाल ही में पांच राज्यों में सम्पन्न हुए आम चुनाव हैं। यानि पहली बार युवा सोशल साइट्स के जरिए देश के मुद्दों को जानने या समझने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, वर्ना कुछ दिन पहले तक की स्थिति यह थी कि युवा या तो रोमांस में बिजी रहते थे, या फिर क्लब में।

तो क्यों न यह मान लिया जाए कि यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत है, क्योंकि एक सच यह भी है कि जब तक चुनावों में भागीदारी युवाओं की नहीं होगी, तब तक देश की जनता को सही सेवक नहीं मिल सकता है। यही वजह है कि पिछले कुछ सालों से फेसबुक और सोशल साइट्स के जरिए नरेंद्र मोदी का कद बढ़ा भी है या बढ़ाया भी गया है। वर्ना आज तक न तो भाजपा नरेंद्र मोदी के क्रेज को लेकर जनमत संग्रह करवाई है और न ही कराना उचित समझा भी। क्योंकि उन्हें पता था कि जिस रफ्तार से नरेंद्र मोदी सोशल साइट्स पर अपनी दखल बढ़ा रहे हैं उसका सीधा असर 2014 के लोकसभा चुनाव में होना ही है, और हुआ भी ऐसा ही।

वहीं दूसरी तरफ जब भाजपा के नरेंद्र मोदी का क्रेज बढ़ रहा था लगभग उसी दौरान कांग्रेस-सोनिया मनमोहन सरकार का क्रेज घटा भी। खासकर सोनिया के त्रिमुर्ति- कपिल सिब्बल, दिग्विजय सिंह, सलमान खुर्शीद की खूब छिछालेदर हो चुकी है। दरअसल, कांग्रेस यह मान चुकी थी कि आने वाले समय में सोशल साइट्स न तो कोई भूमिका निभाएगी और न ही हम इसको अपना हथियार बनाएंगे। लेकिन इसके इतर हुआ उल्टा, 2014 का चुनावी साल नजदीक आते-आते सोशल साइट्स ने भी अपनी उपस्थिति दर्ज करा दी है तभी तो कांग्रेस को भी सोशल साइट्स सुहाने लगे। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी जल्दी-जल्दी में अपनी सोशल साइट्स टीम तैयार करने लगे, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।

इसका मतलब यह नहीं कि सोशल साइट्स के जरिए ही नरेंद्र मोदी का क्रेज बना या जमा है, लेकिन इसका अधिकांश सच यही है। दरअसल, जिस दौर में सोशल साइट्स भारत में एक्टिव हो रहे थे, उस दौर में यानि 2010 के बाद कांग्रेस की यूपीए-2 करप्शन से सराबोर थी, लेकिन उसी दौरान ही नरेंद्र मोदी ने अपने विकास और गुजरात मॉडल के जरिए अपनी एक खास पहचान बनानी शुरू कर दी। उस वक्त सोशल साइट्स पर न तो कोई उनकी टक्कर देने के के लिए आसपास था और नही किसी को कोई दिलचस्पी थी। ऐसे में अगर कोई कहे कि नरेंद्र मोदी सोशल साइट्स के प्रधानमंत्री हैं तो उस बात को मजाक में लेने की गलती नहीं की जा सकती है।

इनमें अब अन्य राजनीतिक दलों और राजनेताओं ने भी दिलचस्पी दिखानी शुरू कर दी है। यानि की सोशल मीडिया राजनीतिक प्रचारों में अहम भूमिका अदा करने लगी हैं। ये भूमिका पहले से अधिक व्यापक होती जा रही है। मसलन, सोशल साइट्स पर चल रहे आधिकारिक विज्ञापन राजनीतिक पार्टियों की सकारात्मकता और उपलब्धियों पर तो केंद्रित होते ही हैं, साथ में उनमें जबरदस्त पॉलिटिकल व्यंग्य भी देखने को मिलता है। ये विज्ञापन डिजिटल मीडिया पर खूब लोकप्रियता बटोरते हैं और तेजी से विस्तार पाते हैं।

मसलन, इन दिनों कांग्रेस के ’हर हाथ शक्ति हर हाथ तरक्की’ के नारे को’ हर हाथ लॉलीपॉप हर हाथ रेवड़ी’जैसे बच्चों के व्यंगात्मक वीडियो पैरोडी को जारी किया गया है, वहीं अरविंद केजरीवाल पॉलिटिक्स की दुनिया में हिट होने के साथ-साथ वीडियो पैरोडी की दुनिया में भी हिट हो गए हैं। उनपर कई पैरोडी अबतक बन चुके हैं जो बेहद लोकप्रिय हुए। मसलन, ’यो-यो केजरीवाल..’ खॉसी-खुजली वाल’। अब इसी कड़ी में एक और नयी पैरोडी आयी है जो यूट्यूब पर आजकल खूब हिट्स बटोर रहा है। इस पैरोडी में दूरदर्शन स्टाइल में ख़बरें पढ़ते हुए अरविंद केजरीवाल की खबर ली गयी है। एंकर मरिया सुल्तान का दुःखदर्शन टीवी पर खबर पढ़ने का अंदाज, जिसमें अरविंद केजरीवाल की खूब खिल्ली उडाई गयी है।

यानि एक बात तो साफ है कि 2014 का चुनाव मनोरंजन के साथ-साथ रोमांचक भी होता जा रहा है। अगर अब तक आप सोशल साइट्स पर एक्टिव नहीं हैं तो अब हो जाईए। यकीन मानिए, यह चुनाव आपको फुल एंटरटेन करेगा।

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