लेखक परिचय

संजय सक्‍सेना

संजय सक्‍सेना

मूल रूप से उत्तर प्रदेश के लखनऊ निवासी संजय कुमार सक्सेना ने पत्रकारिता में परास्नातक की डिग्री हासिल करने के बाद मिशन के रूप में पत्रकारिता की शुरूआत 1990 में लखनऊ से ही प्रकाशित हिन्दी समाचार पत्र 'नवजीवन' से की।यह सफर आगे बढ़ा तो 'दैनिक जागरण' बरेली और मुरादाबाद में बतौर उप-संपादक/रिपोर्टर अगले पड़ाव पर पहुंचा। इसके पश्चात एक बार फिर लेखक को अपनी जन्मस्थली लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र 'स्वतंत्र चेतना' और 'राष्ट्रीय स्वरूप' में काम करने का मौका मिला। इस दौरान विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं जैसे दैनिक 'आज' 'पंजाब केसरी' 'मिलाप' 'सहारा समय' ' इंडिया न्यूज''नई सदी' 'प्रवक्ता' आदि में समय-समय पर राजनीतिक लेखों के अलावा क्राइम रिपोर्ट पर आधारित पत्रिकाओं 'सत्यकथा ' 'मनोहर कहानियां' 'महानगर कहानियां' में भी स्वतंत्र लेखन का कार्य करता रहा तो ई न्यूज पोर्टल 'प्रभासाक्षी' से जुड़ने का अवसर भी मिला।

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संजय सक्सेना

अगले दो-तीन साल भारतीय राजनीति के लिए काफी महत्वपूर्ण होंगे। इस दौरान कई राज्यों में विधान सभा चुनाव के अलावा 2014 में आम चुनाव भी होने हैं।सबसे अहम चुनाव देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के माने जा रहे हैं, जो छह माह के भीतर सम्पन्न हो जाएगें। यूपी के चुनावों पर हमेशा ही देश भर के राजनेताओं और जनता की नजर लगी रहती है।यहां मिली जीत-हार का प्रभाव केन्द्र तक पर पड़ता है। यही वजह है सभी राजनैतिक दलों ने यूपी के चुनावो से काफी पहले ही रण के लिए बिगुल बजा दिया था। छोटे-बड़े सभी दलों ने अपने-अपने महारथियों को चुनावी दंगल में दमखम के साथ उतार रखा है।कांग्रेस और भाजपा ने अपने दिग्गजों को मैदान में उतार रखा है तो बसपा सत्ता का भरपूर फायदा उठा रही है।बसपा सुप्रीमो ने एक बार फिर अपनी पार्टी को सत्ता में लाने के लिए मोर्चा संभाल रखा है।

बसपा के बाद सत्ता की सबसे बड़ी दावेदार समाजवादी पार्टी को माना जा रहा है। सपा और खासकर 73 वर्षीय मुलायम सिंह के लिए आगामी विधान सभा और 2014 में होने वाले आम चुनाव उम्र के हिसाब से काफी मायने रखते हैं।कुछ राजनैतिक पंडित तो यहां तक भविष्यवाणी कर रहें हैं कि उक्त चुनाव मुलायम के नेतृत्व में लड़े जाने वाले आखिरी चुनाव हो सकते हैं। इसके बाद सपा को कोई न कोई नया कर्णधार चाहिए ही होगा।यह नया कर्णधार कौन होगा,यह प्रश्न भविष्य के गर्भ में छिपा है।,लेकिन उम्मीद यही जताई जा रही है कि मुलायम अपने बाद भी सपा की बागडोर अपने परिवार में ही रखना चाहेंगे।सपा का नया कर्णधार मुलायम का बड़ा बेटा अखिलेश यादव भी हो सकता हैं छोटा बेटा प्रतीक भी।कर्णधार के रूप में प्रतीक का नाम लिए जाने पर काफी लोगों को अटपटा लग सकता है,क्योंकि वह अभी राजनीति से दूर है।उसने राजनीति का कखहरा भी नहीं पढ़ा है,लेकिन कम लोग ही जानते होंगे कि प्रतीक मैनेजमैंट में मास्टर है तो पत्नी अपर्णा राजनीति शास्त्र में मास्टर। दोनों ने ही लंदन से मास्टर की डिग्री हासिल की है।कहा जा सकता है कि प्रतीक भले ही राजनीति से दूर हो लेकिन राजनीतिक दांव-पेंचों से वह अंजान नहीं होगा।वह यही सब देखते हुए पला-बड़ा है।बात यहीं तक सीमित नहीं है।अखिलेश यादव भी मुलायम के लिए चिंता का विषय बने हैं।अखिलेश सपा को आगे ले जाने में पूरी ताकत लगाए हैं लेकिन उनमें नेताजी वाली बात नहीं आ रही है।दूसरी पत्नी साधना गुप्ता का दबाव भी इसी लिए बढता जा रहा है।

प्रतीक राजनीति में आएगा? यह प्रश्न किसी को अबुझ पहेली लगे,लेकिन यह हकीकत है।पिता मुलायम सिंह को उसके लिए भी ठीक वैसे ही रास्ता बनाना होगा, जैसा उन्होंने अखिलेश के लिए तैयार किया है।संभावना इस बात की जताई जा रही है कि प्रतीक 2014 के आम चुनाव(लोकसभा)में समाजवादी पार्टी की ओर से साइिकल की सवारी कर सकते हैं।उन्हें मुलायम अपने वर्चस्व वाली किसी संसदीय सीट से अपना प्रत्याशी बना सकते हैं।यह सीट संभल,बदायूं या बेहद उम्मीद है कि इटावा की भी हो सकती है।संभल संसदीय सीट इस समय बसपा के पास है,लेकिन मुलायम की यहां अच्छी पकड़ है।इस सीट पर सपा भी अपनी जीत दर्ज करा चुकी है।इटावा संसदीय सीट पर सपा के प्रेमदास कठेरिया विराजमान हैं,वह मौका पड़ने पर प्रतीक के लिए अपनी दावेदारी से पीछे भी हट जाएंगे।बदायूं की संसदीय सीट भी सपा के खाते में है लेकिन इस सीट पर मुलायम के पारिवारिक सदस्य(भतीजा) धमेन्द्र का कब्जा है।

फिलहाल तो प्रतीक घूमने-फिरने मे मस्त हैं,लेकिन यह मस्ती टूटते ही वह अपने भविष्य के प्रति चिंतित हो जाएंगे।हो सकता है कि विधान सभा चुनाव के समय वह सपा के मंच पर दिखें।कुछ राजनैतिक पंडितों का कहना है कि मुलायम सिंह प्रतीक को लेकर काफी गंभीर हैं। वह पत्नी साधना के स्वभाव से भी अंजान नहीं हैं। यही सब वजह है जो प्रतीक के राजनीति में आने की अटकले लगाईं जा रही हैं। कहा यह भी जा रहा है कि नेताजी प्रतीक को देर-सबेर राजनीति में लाएगें तो जरूर लेकिन इस बात का विशेष ध्यान रखा जाएगा कि उसकी राह में कोई रोड़ा नहीं आए।जीत सुनिश्चित होने के बाद ही मुलायम बेटे प्रतीक को मैदान में उतारेगें।वह बड़ी बहू डिंपल जैसा हश्र अपने बेटे का नहीं चाहेगें।ंडिंपल को लोकसभा के उप-चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा था।तमाम दावों के बीच वह फिरोजाबाद संसदीय सीट से कांग्रेस के उम्मीदवार राज बब्बर से बुरी तरह से हार गईं थीं,जिससे नेताजी कि काफी फजीहत हुई थी।लोकसभा में प्रतीक को नहीं भेजा जा सका तो उनके लिए राज्यसभा का मार्ग भी प्रशस्त किया जा सकता है।

खैर,रात गई बात गई।बात मुलायम पर ही केन्द्रित की जाए तो इस बार मुलायम में काफी बदलाव नजर आ रहा है। सपा सुप्रीमों मुलायम जो पिछले चुनावों तक अपने दम पर दबंगई से फैसले लेकर और चुनौतियां स्वीकार करके चुनावी संग्राम फतेह कर देते थे,अबकी उनको दबाव में काम करना पड़ रहा है।पूरे राजनैतिक जीवन में अपने फैसलों और निणर्यो पर अटल रहने वाले मुलायम अबकी बार किसी भी फैसले पर ‘अटल’ नहीं दिख रहे हैं। मुलायम में जुझारूपन, द्रढ़ इच्छाशक्ति, तत्काल वे अटूट निर्णय लेने की क्षमता घटी हैं।अब वह सबके साथ सामान्य रूप से व्यवहार करने वाले,जमीन से जुड़े नेताओं/पराधिकारियों को स्नेह देने वाले नेता नहीं रहे।यह सब बदलाव उनमें तब से दिखाई दे रहे थे जबसे अमर सिंह सपा में आए थे,लेकिन अब अमर को सपा से बाहर गए जमाना हो गया है,लेकिन मुलायम ने एक बार जो ढर्रा पकड़ लिया उसे फिर नहीं बदला। बढ़ती उम्र ने इसे और बढ़ावा दिया।उनका धोबी पाट अब नहीं दिखता,जिससे सामने वाला चारो खाने चित हो जाया करता था।

उम्र के साथ मुलायम की हनक और धमक भी कम हो गई है। अब नेता जी पर दबाव डालकर उनका निर्णय बदलवा लिया जाता है।जैसा कि हाल में जिला सुलतानपुर के लम्हुआ विधान सभा क्षेत्र में देखने को मिला।छह माह में वहां छह प्रत्याशी बदल गए।2002 में यहां से सपा उम्मीदवार अनिल पांडेय जीते थे,लेकिन 2007 के चुनाव में पार्टी ने उन्हें मौका नहीं दिया।उनकी जगह मनोज पांडेय को उतारा गया लेकिन उन्हें हार का मुंह देखना पड़ा। बसपा के विनोद सिंह यहां से मनोज के खिलाफ चुनाव जीत गए। माया ने उन्हें मंत्री भी बना दिया।सपा की पहली सूची में संतोष पांडेयको टिकट दिया गया।अनिल ने इसका विरोध किया तो संतोष का टिकट काट कर अनिल पांडेय को दे दिया गया।अनिल चुनावी तैयारी कर ही रहे थे तभी पार्टी आलाकमान को अपनी गलती का अहसास हुआ और एक बार फिर संतोष को उम्मीदवार घोषित कर दिया गया।संतोष को टिकट मिलते ही चर्चा इस बात की तेज हो गई कि संतोष अंत समय तक टिक नहीं पाएंगे।तभी एक और नाम चर्चा में आया इंद्र प्रकाश मिश्र का,लेकिन विरोध के कारण वह भी टिक नहीं पाए। इसके बाद फिर बदलाव करते हुए शिवपाल की पसंद की प्रत्याशी सुरभि शुक्ला को टिकट दे दिया गया।बात यही नहीं रूकी एक बार फिर संतोष को प्रत्याशी घोषित कर दिया गया।फिलहाल संतोष मैदान में है।

सपा प्रमुख को करीब से जानने वालो का कहना है कि नेताजी बात के धनी हुआ करते थे,उनकी बात पत्थर की लकीर होती थी,इसकी वजह से उन्हें कई बार नुकसान भी उठाना पड़ा,लेकिन उन्होंने कभी इसकी चिंता नहीं की। यह बात अम नेताजी में नहीं रही।इसी का फायदा उनका परिवार उठा रहा है। दबाव के कारण ही उन्होंने चालीस प्रत्याशियों के टिकट बांटने के बाद काट लिए। जबकि पहले ऐसा कभी नहीं हुआ।मुलायम को कुछ फैसले परिवार के दबाव में लेने पड़ रहे हैं तो कई फैसले पारिवारिक दवाब के बदलने।पत्नी साधना सिंह की चचेरी बहन मधु गुप्ता को मुलायम लखनऊ का मेयर बनाने और सांसद बनाने की कोशिश भी कर चुके हैं।मधु गुप्ता के डाक्टर पति अशोक कुमार गुप्ता भ मुलायम की मेहरबानी से सूचना आयुक्त के पद पर विराजमान रह चुके हैं।परिवार वालों की महत्वाकांक्षा ने उन्हें बुरी बेबस कर रखा है,इसकी ताजा मिसाल है उनको अपने साढ़ू प्रमोद गुप्ता (पत्नी साधना के बहनोई)को टिकट देना पड़ा। कालांतर में उन्हें दूसरे बेटे प्रतीक को भी पहले बेटे की ही तरह सांसद बनाने की जिम्मेदारी है। प्रमोद को औरेया जिले की विधुना सीट से कई नेताओं की दावेदारी खारिज करके सपा प्रत्याशी बनाया गया है।इसी के बाद यह उम्मीद जताई जाने लगी है कि अब वह प्रतीक और अपनी दूसरी बहू अर्पणा के लिए राजनीति में कोई न कोई राह जरूर तैयार करेगें।

मुलायम के तौर-तरीकों में बदलाव ने ही उन्हें तन्हा कर दिया है।सपा के खाटू (समर्पित)नेता उनसे अलग हो चुके हैं।बेनी प्रसाद वर्मा,राज बब्बर जैसे नेताओं की बेरूखी ने मुलायम को कहीं का नहीं छोड़ा।जो नेता गए उसमें से आजम को छोड़कर किसी ने दोबारा पार्टी की तरफ रूख करने की नहीं सोची।आजम की दूसरी पारी भी कोई खास कमाल नहीं कर पा रही है।उनके विवादस्पद बयानों से मुसलमान खुश तो नहीं हो रहा है,लेकिन हिन्दू वोटर सपा से नाराज जरूर होता जा रहा है।आजम सपा के लिए कितने अहम हैं,इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनकी विधान सभा चुनाव प्रचार के लिए कहीं से मांग नहीं हो रही है।लोग मुलायम और अखिलेश के अलावा किसी नेता को प्रचार के लिए ज्यादा तवज्जो नहीं दे रहे हैं,उसमें चाहे शिवपाल यादव हों या फिर मोहन सिंह जैसे दिग्गज नेता।अखिलेश की तेजी और आजम की वापसी के बीच शिवापाल यादव अलग-थलग पड़ गए हैं।आजम की वापसी और पार्टी में जगह-जगह की जा रही दखलंदाजी ने रशीद मसूद जैसे नेताओं को बागी बना दिया है।मुलायम के लिए सब कुछ कुर्बान कर देने की बात करने वाले रशीद मसूद अब सपा को सबक सिखाने की कसम खाने लगे हैं।वह राष्ट्रीय लोकदल के चौधरी अजित सिंह के साथ मिलकर सपा की जड़ों में मट्ठा डालने की तैयारी में हैं।रशीद मसूद योंहि नाराज नहीं हो गए थे,असल में आजम ने मसूद के गढ़ सहारनपुर में मसूद के चहेते इमरान का टिकट कटवा कर अपने प्रत्याशी फिरोज को टिकट दिला दिला था,यह बात मसूद को काफी नागवार गुजरी।यही बात झगड़े की वजह भी बन गई।फिरोज और मसूद के बीच छत्तीस का आंकड़ा था।

नाराज रशीद मसूद पिछले दिनों आगरा में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में दिखे थे।वह मुलायम के साथ मंच पर मौजूद थे।मसूद नेताजी के सामने अपना दर्द बयां करना चाहते थे,लेकिन उनके हाथ में माइक नहीं आया।आजम खॉ को बोलने का मौका मिलता देख मसूद की त्योरियां चढ़ गईं, लेकिन उन्होंने मुंह से कुछ नहीं कहा।आजम खॉ ने अपनी शैली मे व्यंग्य बाण छोड़ना शुरू किए तो मंच पर बैठे रसीद मसूद को भी निशाने पर लेने से नहीं चूके।आजम बोले,पार्टी में रहकर पार्टी का विरोध करने वालों को पार्टी में रहने का कोई हक नहीं है।यह बात सुनकर मसूद मंच से उठ कर चले गए।मुलायम ने उन्हें एक बार भी नहीं रोका।इसके बाद मसूद पूरी तरह से बागी हो गए।मुसलमानों को खुश करने के लिए आजम खां पर नेताजी का अत्याधिक विश्वास कहीं सपा की लुटिया न डुबो दे इस बात भी पार्टी के अंदर बहस होने लगी है। आजम के कारण ही अहमद पटेल जैसे कद्दावर नेताओं ने अपने आप को किनारे कर लिया है।

मुलायम चौतरफा परेशानियों से घिर रहे हैं।कल्याण के कारण मुसलमाना उनसे नाराज हैं तो छोटे भाई अमर सिंह की ‘बेवफाई’ के बाद पार्टी धन संकट से भी जूझ रही है।पैसे की कमी के कारण प्रचार-प्रसार का काम ठप पड़ा है।आर्थिक तंगी से जूझ रही समाजवादी पार्टी को अपने खर्चो में कटौती करना पड़ रही है।बसपा के विज्ञापन प्रिंट से लेर इलेक्ट्रानिक मीडिया तक में छाए हुए हैं,लेकिन सपा के पास विज्ञापन के लिए पैसा ही नहीं है।अमर के रहते सपा को कभी आर्थिक मोर्चे पर परेशानी का सामना नहीं करना पड़ता था।

समाजवाद के लम्बरदार मुलायम की दुश्वारियां और बदलती सोच ने उन्हें अविश्वसनीय बना दिया है।कभी अंग्रेजी के कट्टर विरोधी रहे नेताजी आजकल अंग्रेजी के मोह में इतना फंस गए हैं कि उन्होंने अपनी वैब साइट ही अंग्रेजी में लांच कर दी।पिछड़ों की लड़ाई लड़ने वाले नेता जी की सोच में बदलाव को लेकर सवाल पूछने पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष सूर्य प्रताप शाही कहते हैं कि यह बदलाव स्वभाविक है। उनके घर में कान्वेंट स्कूलों में पढ़े बच्चों की संख्या बढ़ रही है तो मुलायम इससे कैसे अलग रह सकते हैं।उनका कहना था सपा प्रमुख भले ही अपने को पिछड़ों का नेता कहते हों लेकिन जब उनके परिवार में कोई रिश्ता जुड़ता है तो इतिफाक से वह ऊंची जाति वालों से ही जुड़ता है।वह घर से लेकर बाहर तक अगड़ों से घिरे हैं तो पिछड़ों का दर्द वह कैसे बांट और समझ सकते हैं।

उत्तर प्रदेश कांग्रेस की अध्यक्षा रीता बहुगुणा जोशी भी मुलायम की कथनी और करनी में अंतर से खुश नहीं हैं।उनका साफ-साफ कहना था,’ मुलायम प्रदेश की जनता खासकर मुसलमानों को काफी समय तक धोखे में रखकर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंकते रहे,अब उनका फरेब चहले वाला नहीं है।वह पूरी तरह से एक्सपोस हो चुके हैं।अगले दो-ढाई साल में सपा का सूरज पूरी तरह से अस्त हो जाएगा।पार्टी रसातल की तरफ जाने लगी है।हालात को समझने वाले कई नेताओं ने इसी लिए सपा से किनारा करना शुरू कर दिया है।बसपा प्रवक्ता ने सपा और सपा प्रमुख को घेरते हुए कहा कि सपा की ‘राजनैतिक हांडी’ बार-बार नहीं चढ़ने वाली है।सपा में कोई दम नहीं रह गया है।वह बाप-बेटों और भाइयों की पार्टी बनकर रह गई है।पूर्व मुख्यमंत्री और जनक्रांति पार्टी के अध्यक्ष कल्याण सिंह भी मुलायम से काफी आहत दिखे।उन्होंने कहा मुलायम मौकापरस्ती की राजनीति करते हैं,उनके अगल-बगल बैठे लोगों ने मुलामय को कठपुतली बना कर रख दिया है।इसी लिए वह बार-बार अपने फैसले बदलते रहते हैं।मुलायम को प्रदेश की जनता से अधिक अपने परिवार की चिंता है।इसी चिंता में वह अपना सब कुछ खोते जा रहे हैं।लोग यह कहते नहीं चूकते कि मुलायम का समाजवाद परिवार तक सिमटता जा रहा है।

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1 Comment on "धूमिल होता धरती पुत्र का समाजवाद"

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इक़बाल हिंदुस्तानी
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मुलायम दुसरे लालू साबित होने जा रहे हैं.

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