लेखक परिचय

गौतम चौधरी

गौतम चौधरी

लेखक युवा पत्रकार हैं एवं एक समाचार एजेंसी से जुडे हुए हैं।

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गौतम चौधरी

विगत कुछ दिनों से खुर्राट समाजवादी और बिहार के मुख्यमंत्री नितिश कुमार कुछ ज्यादा ही मुखर हो गये हैं। बिहार में सुशासन का दावा करने वाले कुमार और कुमारी कुनबां अब यह साबित करने के प्रयास में है कि जनता दल (यूनाइटेड) में नितिश कुमार से बडा कोई नेता नहीं है। हालांकि कुछ मीडिया समूह नितिश कुमार को अगले प्रधानमंत्री के रूप में भी प्रस्तुत करना प्रारम्भ कर दिया है, लेकिन इस मामले में कुमार खुद खुलकर ताल ठोकने से परहेज कर रहे हैं। इससे इस कयास को बल मिलने लगा है कि कुमार और कुमार के समर्थक अब नई राजनीति भूमिका की तलाश में हैं। इन तमाम राजनीति उठापटक के बीच बिहार और बिहार में विकास तथा सुशासन का नारा जो खुद नितिश कुमार ने दिया था वह पीछे छुटता जा रहा है और बिहार एक बार फिर लालू प्रसाद यादव की पुनरावृत्ति के लिए तैयार हो रहा है। जिसका सबसे बडा उदाहरण रणवीर सेना के संस्थापक ब्रह्मेश्वनर मुखिया की हत्या और उसके बाद बिहार में मचाया गया उत्पात है।

जानकार ही नहीं आंकडे बताते हैं कि बिहार में जो विकास दिख रहा है वह केन्द्र के पैसे और केन्द्र के दबाव के कारण दिख रहा है, गोया नितिश कुमार का प्रशासन उतना ही भ्रष्ट है जितना लालू यादव का प्रशासन भ्रष्ट था। जहां तक सुशासन की बात है तो लालू प्रसाद यादव से ज्यादा माफिया आज नितिश कुमार के साथ हैं। हां सरकार ने प्रदेश के थानों को एक मौखिक आदेश जरूर दे रखा है कि वे अपराध की प्राथमिकि दर्ज न करें, इससे अपराध का ग्राफ स्वतः कम दिखेगा। ऐसी बात नही है कि बिहार में अपराध नहीं हो रहा हैं। अपराध पूर्ववर्ती सरकार से ज्यादा हो रहा है, लेकिल उस अपराध की सूचि कम कर दिखाई जा रही है, इसलिए नितिश कहते है कि प्रदेश अपराध-मुक्त हो गया है।

लाख कोशिश करने के बाद भी बिहार निवेशकों को आकर्षित नहीं कर पा रहा है। इस मामले में बिहार सरकार के इमानदार अधिकारियों का कहना है कि सरकार के पास निवेशकों के लिए कोई ठोस नीति ही नहीं है। हां बिहार में विकास के नाम पर पुल और पुलिया निर्माण, सडक और तालाब की खुदाई-भडाई लगातार जारी हैं क्योंकि इन कामों में लगभग 50 प्रतिशत का घोटाला संभव है। नितिश सरकार ने बडे काम हाथ में लिये ही नही। बिहार में लगभग 12 करोड़ लोग रहते हैं। आज बिहार की सबसे बडी सतस्या बाढ और सुखा है। नितिश सरकार ने इस समस्या के लिए ठोस पहल करने के बदले लगातर केन्द्र सरकार के खिलाफ बिहारियों को उक्साने में लगे हैं, जिसके कारण बिहार में नये दौर कर राजनीतिक संकट खडा होने का डर है। जहां तक रोजगार की बात है तो विदेषी दान वाले पैसों से प्रदेश में शिक्षकों की बहाली की गयी है। इन शिक्षकों का भविष्य क्या होगा, नितिश सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं है। बावजूद अपने को समाजवादी कहने वाले नितिश अपनी तुलना गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी से करते हैं। नरेन्द्र मोदी की चर्चा यहां करना उपयुक्त नहीं होगा और मोदी के विकास पर लगभग प्रतिदिन चर्चा होती है। इसलिए नितिश को मोदी का सिर्फ आईना दिखाना ही ठीक रहेगा। एक और गंभीर बात जो नितिश लगातार छुपा कर रखते हैं, वह है नितिश का वैचारिक और जातीय पूर्वग्रह। हालांकि यह पूर्वाग्रह लालू में तो है, ही भाजपा के वरिष्ठ नेता और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी में भी है।

लालू,, नितिश और सुषील कुमार मोदी इकट्ठे छात्र राजनीति में सक्रिय थे। हालांकि उस समय इनसे कद-काठी से बडे और कई छात्र नेता थे लेकिन वो लोग राजनीति में आना ठीक नहीं समझे और समाज के अन्य क्षेत्र में सक्रिय हो गये। छात्र राजनीति के समय ही पटना विष्व विद्यालय में कथित सवर्णों को परास्त करने और कांग्रेस पार्टी को कमजोर करने के लिए कुछ समाजवादी चिंतकों के इशारों पर इन तीनो छात्र नेताओं ने छात्र राजनीति में जातीय समीकरण बनाया। उसमें यादव, कुर्मी और मारवाडी बनिया एक मंच पर आये। कालक्रम में यह राजनीतिक समीकरण बिहार की राजनीति में भी सफल रहा। जब लालू यादव पहली बार मुख्यमंत्री हुए तो इसी समीकरण को बिहार में लागू किया गया। लेकिन लालू की महत्वकांक्षा ने उनको अपने पुराने साथियों से अलग कर दिया। लालू सत्ता को सभी पिछडों में विभाजित करना चाहते थे लेकिन नितिश कुर्मियों को सत्ता में साझीदार बनाने के पक्षधर थे। इधर भाजपा जो लालू को बाहर से समर्थन दे रही थी उसके अपने अलग पूर्वाग्रह थे। उस दौर में लालू-नितिश के जातिगत महत्वकांक्षा से खफा होकर समाजवादी नेता नवल किशोर शाही ने सरकार से पहले त्यागपत्र दे दिया था। लालू सरकार के पहले महत्वपूर्ण मंत्री शाही थे जिन्होंने समाजवाद को जातिवाद से अलग करने को कहा और नहीं करने पर सरकार से अलग हो गये। राम मंदिर के नाम पर भाजपाा ने समाजवादियों से अपना नाता तोड लिया। बिहार में भी भाजपा समाजवादी अलग हो गये। अब लालू नितिश जैसे समाजवादियों को बिहार की सत्ता पा काबीज रहने का एक मात्र रास्ता दिखाई दिया वह बिहार की बहुसंख्या जनता को सवर्णों का भय दिखाना। इस सिद्धांन के असल प्रणेता नितिश है, लेकिन जातिगत महत्वकांक्षा ने नितिश को लालू से अलग कर दिया। अब नितिश और सुषील मोदी सत्ता प्राप्ति की येाजना बनाने लगे। इसी बीच मोदी के खाय सहयोगी के0 एन0 गोविन्दाचार्य भाजपा के राष्ट्रीइय संगठन महामंत्री बनाये गये। गोविंदाचार्य ने रणनीति बनाई जिसमें तमाम लालू विरोधियों को एक मंच पर आने का न्योता दिया गया। यहां तक कि माकपा माले को भी साथ लेने की योजना बनी, लेकिन अन्य वामपंथी दलों की तरह माले ने इस महाजोट का समर्थन नही किया। वामपंथियों के दोनों समूह लालू के साथ जाने में अपनी भलाई समझी। कांग्रेस भी धर्मनिपेक्षता के नाम पर लालू के साथ हो गयी। लालू ने माई यानि मुस्लिम यादव का नारा दिया और निष्कंटक राज्य करने लगे। यह अलग बात है कि लालू के साथ जो दल गया उसका जनाधार बिहार से जाता रहा। इधर समता पार्टी का गठन किया गया। जार्ज साहब समाजवाद को जीवित रखना चाहते थे और नितिश कुमार को पढा-लिखा समझदार समझकर उन्होंने कुमार को आगे कर दिया। बिहार में लालू प्रसाद यादव से त्रस्त लोग नितिश को बिना जाने परखे उसके साथ जुडने लगे। आधार बढा और नितिश सत्ता पर काबीज हो गये। नितिश कुमार ने योजनाबद्ध तरीके से सारे ईमानदार समाजवादियों को एक एक कर पार्टी से बाहर कर दिया और जो गिरोह लालू के साथ था उसको लेकर समाजवाद का नया समिकरण बाने लगे। नितिश ने मजबूरी में पहली सरकार को समाजवाद के सिद्धांत पर चलाया और बढिया चलाया लेकिन नितिश-2 में लालू का सम्पूर्ण गिरोह नितिश के साथ आ गया। नितिश में समाजवाद से कही ज्यादा प्रभावशाली जातिवाद रहा है जो अब खुलकर सामने आने लगा है। अब बिहार में विकास नितिश का एजेंडा नहीं रहा। नितिश सरकार ने न केवल माओवादिओं के साथ समझौता किया अपितु घुर विरोधी रणवीर सेेना को भी नितिश ने सह दिया है। वर्तमान में नितिश लालू यादव की रणनीति पर काम कर रहे हैं और ऐसा संभव है कि आने वाले समय में वे राजग से अपना नात तोड प्रगतिषील गठबंधन के साथ हो जाएं। नितिश कुमार को यह लगने लगा है कि बिहार में वे अब बिना भाजपा के सत्ता पर काबीज हो सकते हैं। इसलिए नितिश की आवाज बदल गयी है। वे धर्मनिपेक्षता के नाम पर कांग्रेस के साथ जाएंगे। इस पाखंड को सही ठहराने के लिए वे बिहार की जनता को विकास के नाम पर बडगलाएंगे। इधर संप्रग को अगली बार कुछ सांसदों की कमी पडेगी जिसे ऐसा संभव है कि नितिश और मुलायम जैसे समाजवादी पूरा करें।

इस सिद्धांत को लालू प्रसाद यादव और रामविलास पासवान आजमा चुके हैं। कुल मिलाकर देखें तो नितिश की लोकप्रियता का ग्राफ इन दिनों बडी तेजी से घट रहा है। अब बिहार की जनता एक बार फिर अपने को ठगा हुआ महसूस कर रही है। इस परिस्थिति में नितिश को सत्ता बचाये रखने के लिए बिहार की जनता को भूमिहारों का भय दिखाना और धर्मनिरपेक्ष पाखंड को प्रचारित करने के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं दिख रहा है। यह रास्ता लालू प्रसाद यादव के द्वारा दिखाया गया रास्ता है और इसी रास्ते पर चलकर लालू कई वर्षों तक सत्ता का सुख भोग चुके हैं। इन दोनों रणनीति को नितिश के समर्थक सफल करने में लगे हैं। भूमिहारों का डर तो उन्होंने जनता को दिखा दिया। विगत दिनों ब्रह्मेश्व र मुखिया की हत्या और उसके बाद का उत्पात सरकार द्वरा प्रयोजित नहीं तो क्या है? पहले 75 वर्षीय मुखिया की हत्या कराई गयी और बाद में सरकार द्वारा उत्पात को प्रयोजित किया गया। इससे बिहार की जनता को संदेश दिया गया कि भूमिहार आज भी बिहार के कमजोर वर्ग का दुष्मन है। यह नाटक सरकार द्वारा विगत दिनो सफल ढंग से मंचित किया गया। पहले रणवीर सेना संस्थापक बर्मेष्वर मुखिया की हत्या कराई गर्इ्र। उसके बाद सत्ता के सह पर भूमिहारों से उत्पात मचवाया गया। हालांकि मुखिया की हत्या किसने की यह अभी भविष्य के गर्भ में है लेकिन इस मामले मे नितिश के खास करीबी विधायक का नाम सामने आया है। ओवरऑल पूरे प्रकरण पर सरसरी नजर दौराये तो साफ लगता है के यह मामला सरकार और सत्ता के द्वारा प्रायोजित था। अब बिहार की पुलिस बस खाना पूर्ति कर रही है। हां इस पूरे नाटक की खास बात यह है कि लालू यादव का हथियार कुछ अलग था लेकिन नितिश कुमार ने बडी चतुराई से इस कार्य के लिए भूमिहारों को ही हथियार बना लिया है कुल मिलाकर अपनी गिनती लोकप्रियता को बनाये रखने के लिए नितिश प्रदेश की जनता को भूमिहारों का डर दिखाना चाहते थे जिससें वे सफल रहे।

अब वे दुसरे मिशन पर काम करने लगे है। अब केन्द्र के राजनीति मे हस्तक्षेप करने की योजना बना रहे है वे। नितिश भारतीय जनता पार्टी से अपना पिंड छुडाना चाहते है और निहायत कमजोर सोनिया नेतृत्व वाले प्रगतिशील गठबंधन का घटक बनाना चाहते हैं। नितिश की वर्तमान गतिविधि फिलहाल तो यही वया कर रही है। हां नितिश को यह भी लगने लगा है कि अब वे अकेले बिहार में सरकार बना सकते है। इधर के दिनों में कांग्रेस के तरफ से भी उनको कुछ शह मिल रही है। हालांकि इस मामले मे वे बिहार की जनता को प्रगति के नाम पर बडगलाएंगे लेकिन क्या बिहार की जनता इस समाजवादी पांखड को सह पायेगी?

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1 Comment on "नितिश का जातिवादी चेहरा एवं समाजवादी पाखण्ड"

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dr dhanakar thakur
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लेख अच्छा है नितिश कुमार लालू प्रसाद यादव रामविलास ,मुलायम की तरह समाजवादी है जो
समाजवादी पहले भी कांग्रेस से समझता करते रहे हैं – लोहियाजी का ६० आरक्षण की बात ने जातिवाद को बढ़ाया
बिहार की सबसे बडी समस्या बाढ और सुखा है। जिसके लिए मिथिला राज्य का निर्माण अवश्यक है
नितिश का वैचारिक और जातीय पूर्वग्रह ठीक नहीं है

भूमिहारों का डर दिखाना ठीक नहीं है पर उन्हें भी किसी सेना को अपना नहीं समझना चाहिए.

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