लेखक परिचय

शैलेन्द्र कुमार सिंह

शैलेन्द्र कुमार सिंह

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womanभारतीय समाज व्यवस्था में स्त्री के स्वतंत्र व्यक्तित्व की राह में बाधाएं’

इस पृथ्वी पर सबसे बुद्धिमान प्राणी मनुष्य ही हैl प्रकृति की संरचना में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं हैl दोनों अपनी मूल संरचना में स्वतंत्र होते हुए एक-दूसरे के पूरक हैं और समान रूप से सहभागी भीl लेकिन मानव जैसे-जैसे विकास करते गया उसने एक शक्ति को बढ़ावा दिया और इसी प्रक्रिया में पुरुषवादी शक्ति(सत्ता) का उदय होता है तथा स्त्री को सामाजिक, शैक्षिक, आर्थिक और राजनीतिक आदि स्तरों पर विभेदित कर दिया जाता हैl प्रकृति की संरचना से पुरुषवादी छेड़छाड़ यहीं से आरम्भ होता है और मानव द्वारा निर्मित समाज व्यवस्था में स्त्री के सम्मान,स्वतंत्रता और समानता का अधिकार जैसे प्राकृतिक अधिकारों पर अंकुश लगा दिया जाता हैl यहीं से स्त्री को उसके स्वतंत्र व्यक्तित्व को पाने में पुरुषवादी समाज तमाम बाधाएं उत्पन्न करना आरम्भ कर देता हैl

शुरू करते हैं वैदिक कालीन संस्कृति से; वैदिक काल स्त्रियों के लिए कुछ अच्छा माना जाता है जहाँ मातृसत्ता के रूप में स्त्रियों को महत्ता प्राप्त थी(मातृदेवो भवः) जो की उत्तरवैदिक काल तक बनी रही(पतितः पिता परित्याज्यो माता तु न पतितः)l लेकिन यह तो समाज में उनका माता के रूप में स्थान है,जब बात आती है व्यक्तित्व की तो स्त्रियों को यही व्यवस्था उन्हें ‘स्त्रिया अशास्यम् मनः’ कहकर उन्हें मित्रता के लिए अयोग्य घोषित कर देती है (स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति सलावृकाणं मनः)l उपनिषद्काल और सूत्रकाल में स्त्रियों की स्थिति और ज्यादा सीमित कर दी जाती है लेकिन ‘मैत्रेयी और गार्गी’ जैसी विदुषियां निकलकर आती हैं जो स्त्री के मजबूत व्यक्तित्व की वकालत करती हैंl इसके बाद मनुवादी व्यवस्था में उन्हें सैद्धांतिक रूप से समाज में सम्मान का स्थान दिया जाता है(यत्र नार्यस्तु पूज्यते रमन्ते तत्र देवता) और उसकी विभिन्न अवस्थाओं में सुरक्षा की दृष्टि से ‘मनुस्मृति’ में कहा गया है-

‘पिता रक्षति कौमारेभर्त्ता रक्षति यौवनेl /रक्षन्ति स्थविरे पुत्राः न स्त्री स्वातंत्र्यमर्हतिll’

यहाँ स्पष्ट है कि सुरक्षा की दृष्टि से स्त्रियों की स्वतंत्रताहड़पी जा रही हैl तत्कालीन मनुवादी व्यवस्था और स्वातंत्र्योत्तर भारत के लोकतान्त्रिक व्यवस्था में कुछ खास अंतर नहीं आया है, आज भी जब औरतों पर अत्याचार(शारीरिक एवं मानसिक) होता है तो स्त्रियों के स्वतंत्र विचरण और स्वतंत्र मानसिकता पर ही दोष मढ़ा जाता हैl यह हमारे समाज की बहुत बड़ी विडम्बना है कि हमेशा शोषित को ही दोषी नज़रों केसाथ देखा जाता है क्योंकि यह समाज व्यवस्था एक शक्ति के द्वारा निर्मित हैl खैर यह मनुवादी व्यवस्था आज बदलकर तथाकथित ब्राह्मण धर्म और संस्कृति(अब यह हिन्दू धर्म और संस्कृतिके नाम से जाना जाता है) के संरक्षण केनाम पर स्त्रियों को घर के चाहरदिवारियों में कैद करके रखना चाहती है,चाहे वो खाब पंचायतें हों या फिर यह समाज! मध्यकालीन समाज से स्त्री को तमाम सामाजिक बन्धनों और कुरीतियों में जकड़ दिया जाता है और उनका अस्तित्व लगभग नगण्य हो जाता है तथा शोषण का स्तर बढ़ जाता हैl ऐसी स्थिति में स्त्री क स्वतन्त्र व्यक्तित्व का तो सवाल ही नहीं उठता हैl लेकिन समय एक जैसा नहीं होता वह करवट जरुर बदलता है, आधुनिकता के आते ही स्त्री खुलकर अपने अधिकार और व्यक्तित्व के लिए उठ खड़ी होती है, उसके लिए इस पुरुष समाज में दबकर रहना मुश्किल थाl

ऐसा नहीं है कि स्त्रियों ने पुरुषवादी समाज से अपनी जंग जीत ली है, अभी भी लड़ाई बाकीहै और यह तबतक जारी रहेगी जबतक की वे पूरी तरह से अपने को पुरुष की अधीनस्थता से मुक्त नहीं कर लेती हैंl एक लोकतान्त्रिक समाज में हर किसी का अपना निजी व्यक्तित्व होता है जो की अधीनता नहीं स्वीकार सकतीl आज के समाज ने अगर उन्हें जो आजादी दी है उसमे भी इस पुरुषवादी समाज ने सेंध लगाने की कोशिश की है;यह समाज स्त्रियों को खुले आसमान में उड़ने की आजादी तो देता है लेकिन शर्त रख देता है कि पंख कटे होने चाहिए,उन्हें इस धरा पर कहीं भी घूमने की आजादी तो देता है लेकिन एक निश्चित दूरी की बेड़ियाँ उनके पैरों में डाल देता है जिससे अफनायी स्त्री कह उठती है-

‘जरा सी ताजी हवा पाने को / मैंने तोड़ दी दीवारें और छत’-(मणिका मोहिनी)

हमारे समाज की व्यवस्था ऐसी है कि स्त्री को हमेशा से उसके सामाजिक संरचना और शारीरिक बनावट के आधार पर ही देखा गया है,उसने स्त्री को कभी भी एक व्यक्ति के तौर पर महत्ता नहीं दी हैl समाज की रूढ़िगत व्यवस्था ने स्त्री की जो भूमिका तय कर दी है उसके बाहर स्त्री को देखने की कोशिश भी नहीं की जाती है! दरअसल जब बात व्यक्ति मात्र के अस्मिता की होती है तो वहाँ स्वतंत्रता अपने आप समाहित हो जाती है और उसके अस्तित्व को सहर्ष स्वीकार किया जाता है, इसीलिए पुरुष समाज स्त्री को व्यक्ति के तौर पर नहीं देखता क्योंकि इससे उसके अधीन रहने वाली स्त्री स्वतंत्र हो जाएगीl इसके पीछे दो मूल कारण हैं; एक-अशिक्षा और दूसरा-अर्थ की कमीl जैसे ही स्त्री ने शिक्षा का अधिकार पाया खुद के अधिकारों क लिए लड़ाईयां लड़ी और अपने को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनाने की तरफ कदम बढ़ा दिएl लेकिन पुरुष स्त्री के हाथ से अर्थ को छीन लेता और प्रत्यक्षतः आर्थिक रूप से सक्षम दिख रही स्त्री को अक्षम बनाकर उसकी आत्मनिर्भरता को अपने अधीन कर लेता हैl

स्त्री विमर्श के तमाम आंदोलनों व स्वयं स्त्री के संघर्षों के फलस्वरूप आज स्त्री ने संवैधानिक तौर पर स्वतंत्रता और समानता का अधिकार पाते हुए व्यक्ति की अस्मिता की तरफ मजबूती से कदम बढ़ाए हैंl लेकिन कागजी अधिकारों को व्यावहारिक रूप देने में यही पुरुष समाज व्यवस्था बाधा बन रही है जहाँ इन अधिकारों को वह अपने हाथ में लेकर एक अंश हीस्त्री को देता हैl अभी हमारे समाज में जो पीढ़ी है कम से कम उससे तो हम व्यक्ति की अस्मिता को पूर्णतः स्वीकार करने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं; चाहे वे शिक्षित ही क्यों न हों, क्योंकि उनकी वर्षों पुरानी मानसिकता को नहीं बदला जा सकता है जो कि पुरुषसत्तात्मक समाज में गढ़ी गयी हैl उदाहरण के तौर पर निर्भया कांड के वकील(दोषियों के) ए.पी.सिंह को हम रख सकते हैं जो की उच्चतर शिक्षा पाने के बाद भी लड़कियों को सूरज ढलते ही घर की चाहरदिवारियों में कैद करना चाहते हैं और हॉनर किलिंग की बात करते हैं!

आधुनिक युग में भी स्त्री को किन-किन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है इससे हम अंजान नहीं हैंl देश के कर्त्ता-धर्त्ताओं(नेतागण;तथाकथित जनता के प्रतिनिधि) के स्त्री जाति पर रह-रहकर विवादित बयान आतें रहते हैं जो लोकतान्त्रिक व्यवस्था में प्राप्त स्त्री के सम्मान के साथ खिलवाड़ को स्पष्टतः उजागर करती हैlहम अपनी समाज व्यवस्था में स्त्रियों को कौन सा स्थान, सम्मान, अधिकार और स्वतंत्रता देने की बात कर रहे हैं या देना भी चाहते हैं या नहीं? क्या इसके लिए हम और हमारा समाज मानसिक रूप से तैयार है? क्या हम स्त्रियों का मानसिक और शारीरिक शोषण ख़त्म करने को तैयार हैं?क्या उनके मस्तिष्क में बोये गए पुरुषवादी मानसिकता के बीज को नष्ट करने को तैयार हैं? या फिर हम उसे व्यक्ति की स्वतंत्रता देने को तैयार हैं? ये सारे सवाल वर्तमान समाज में स्त्री के अस्तित्व से जुड़े हैं जिस पर सवालिया निशान हमारे समाज ने लगाए हैंl

स्त्री को व्यक्ति के रूप में स्वीकृति नयी पीढ़ी ही दे सकती है, यह भी तब संभव है जब हम उस पीढ़ी की मानसिकता में पुरुषवादी बीज न पड़ने दें और स्त्री पुरुष की समानता व्यक्ति मात्र के तौर पर उसे समझाएं! वास्तव में अब इसकी जरूरत है की स्त्री को पूरकता के नजरिए से अलग हटकर उसे व्यक्ति के तौर पर सम्मान दें तभी हमारे समाज का वास्तविक विकास हो सकेगा और एक स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा; क्योंकि आधी अबदिको नकार कर यह समाज आगे नहीं बढ़ सकता हैl

-शैलेन्द्र कुमार सिंह

 

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