लेखक परिचय

राघवेन्द्र कुमार 'राघव'

राघवेन्द्र कुमार 'राघव'

शिक्षा - बी. एससी. एल. एल. बी. (कानपुर विश्वविद्यालय) अध्ययनरत परास्नातक प्रसारण पत्रकारिता (माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय जनसंचार एवं पत्रकारिता विश्वविद्यालय) २००९ से २०११ तक मासिक पत्रिका ''थिंकिंग मैटर'' का संपादन विभिन्न पत्र/पत्रिकाओं में २००४ से लेखन सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में २००४ में 'अखिल भारतीय मानवाधिकार संघ' के साथ कार्य, २००६ में ''ह्यूमन वेलफेयर सोसाइटी'' का गठन , अध्यक्ष के रूप में ६ वर्षों से कार्य कर रहा हूँ , पर्यावरण की दृष्टि से ''सई नदी'' पर २०१० से कार्य रहा हूँ, भ्रष्टाचार अन्वेषण उन्मूलन परिषद् के साथ नक़ल , दहेज़ ,नशाखोरी के खिलाफ कई आन्दोलन , कवि के रूप में पहचान |

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-राघवेन्द्र कुमार “राघव”-   mulayam

गणतन्त्र दिवस के बहाने भारत में लोकतंत्र की स्थिति पर चर्चा आम है। लोकतंत्र भी ऐसे में खुश हो जाता है… यही सोचकर चलो मैं जिंदा तो हूं। लेकिन ये अपने ठलुए दार्शनिक हैं न, मानते ही नहीं, लोकतंत्र की निद्रा को चिरनिद्रा साबित करने के लिए वाद-प्रतिवाद में पड़े ही रहते हैं । खैर ! ये तो इनका काम ही है । अब हम अपने काम की बात करते हैं । लोकतंत्र के साथ ही एक और वैचारिक सत्ता जो इसे पुष्ट करती रही है “’समाजवाद”’ आज हाशिये पर है। प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत के साथ ही समतामूलक समाज की पैरोकार यह शक्ति अपने अंतिम पड़ाव पर है । जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया की इस राजनैतिक संपत्ति से अनेक लोगों का राजनैतिक चूल्हा गर्म होता है। इसी के बूते कई प्रदेशों में दल राजनैतिक रोटियां तोड़ रहे हैं । किन्तु यथार्थ में इस परिसंपत्ति का एक ही उत्तराधिकारी है “मुलायम सिंह यादव” मुलायम सिंह आज की राजनीति में अकेले दम पर ही समाजवाद को ढोते नजर आते हैं ।

आज समाजवाद का यह पुरोधा अपनों के ही जाल में उलझ रहा है । राजनैतिक ज़मीन को हथियाने के प्रयास में समाजवादी, सम्प्रदायवादी हुए जा रहे हैं । सादगी को ठेंगा दिखाते हुए धन की चमक में समाजवादी खो गए हैं । ऐसे में ये कथित समाजवादी ही समाजवाद को कब्र की ओर धकेल रहे हैं । आज के दौर में समाजवाद को पुनर्परिभाषित करने की जरुरत है । ऐसा कोई नया ही कर सकता है । प्रत्येक समाज समय के साथ अपनी मान्यताओं और विचारधाराओं में परिवर्तन लाता है और उन्हें नया करता है । यह परिवर्तन वांछनीय भी है। नवीनता आकर्षण लाती है और राजनीति में नीति का आकर्षक होना परम आवश्यक है। समाजवादियों को इस पर ध्यान देने की ज़रुरत है । विकल्प आसान तभी हैं जब बौद्धिक चातुर्य और वैचारिक सरसता स्वयं के लिए भी एक विकल्प की तरह हों। आज जब मुलायम सिंह यादव वैकल्पिक मोर्चे को मूर्त रूप देने की दिशा में बढ़ रहे हैं, रूढ़िगत राजनीति और धृतराष्ट्ररुपी मानसिकता गतिअवरोधक के रूप में सामने हैं । यदि उत्तर प्रदेश सरकार के पिछले बाईस महीने की विवेचना की जाए तो निष्कर्ष के रूप में समाजवाद की हत्या सामने आती है। युवा व स्वच्छ छवि के मुख्यमंत्री ने भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया है लेकिन प्रशासनिक स्तर पर वह पूरी तरह विफल रहे हैं । वैसे भी सत्ता जब बहुकेंद्रीय होती है तो संघर्ष का कारण बनती है। ऐसा ही कुछ उत्तर प्रदेश में भी दिखाई दे रहा है । आज प्रदेश भर में आम से खास सभी में समाजवाद को लेकर भ्रम उत्पन्न हो गया है । मौजूदा सरकार से मोह भंग हो गया है । मार्क्स का वर्ग संघर्ष ही समाजवाद की पहचान बन गया है । वर्तमान परिप्रेक्ष्य में यह जाति, सम्प्रदाय और वैयक्तिक संघर्ष के स्वरूप में सामने है।

समय की नज़ाकत को भांपते हुए मुलायम से लौहपथ पर आना आवश्यक हो गया है । जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम समुद्र मार्ग से लंका जाने के लिए सागर तट पर समुद्र से मार्ग देने की अनुनय विनय कर हार गए और अपनी उदारता व विनम्रता को समुद्र द्वारा कमजोरी समझा गया जाना तब वह कहते हैं –

विनय न मानति जलधि जड़, गए तीन दिन बीति ।

बोले राम सकोप तब, भय बिनु होइ न प्रीति ।

समाजवाद के समक्ष आज कुछ ऐसी ही परिस्थितियां मुंह बाए खड़ी हैं। देखना यह है की समाजवाद रासरंग में डूबकर मदहोश रहना चाहता है या सामाजिक मूल्यों की रक्षा के लिए लोहिया पथ पर बढ़ता है।

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1 Comment on "मुलायम से लोहिया"

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mahendra gupta
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उत्तरप्रदेश के इस समाजवाद का नाम मुलायमी समाजवाद कर देना चाहिए.क्योंकि इस का अवतार भारत के न तो किसी राज्य व या अन्य देश में होना है.जिसमें समाज को बाँटना दंगे व गुंडई राज मुख्य सिद्धांत है

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