लेखक परिचय

डा.राज सक्सेना

डा.राज सक्सेना

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women 1डा.राज सक्सेना

मधुमय-मधुर कमल पांखों का, परिपूरित आगार हो |

संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो |

कज्जलकूट केश, कोमलतम्,

गहन-बरौनी, अविरलभंगिम |

मृगछौने सम, नयन सलोने,

नहीं ठहरते, चंचल अग्रिम |

तीव्र नासिका, अधर अछूते,  अमृत-मयी   बहार हो |

संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो |

ग्रीवा स्वर्ण-सुराही, शोभित,

स्वर्णमयी भुजवल्लरि रोहित |

बेलवृक्ष के फलद्वै-कुच ज्यों,

कटि-कुंचित शोभामयसंचित |

स्वर्ण-कमल की नालपूर्णपद,  जल-गत पद्मविहार हो |

संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो |

पग-पंकज परिपूर्ण, दिव्यतम्,

अनुपमशोभित पायल छमछम |

धरती पर पग धरते ही ज्यों,-

सप्त- स्वरों में बजती सरगम |

मधुशाला सी देह से मन पर, करती तप्त  प्रहार हो |

संरचना  सुन्दर  संविद  की , श्रुत – संगत उपहार हो |

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